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CAA-Delhi violence: मोदी सरकार का विरोध करने पर इस मुस्लिम समुदाय में दो फाड़

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नई दिल्ली- नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश का ज्यादातर मुसलमान मोदी सरकार का विरोध कर रहा है। लेकिन, आमतौर पर भाजपा का समर्थन करने वाला एक मुस्लिम समाज इस बार सीएए से लेकर दिल्ली हिंसा तक को लेकर बंटा हुआ नजर आ रहा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी में शिया मुसलमानों का काफी प्रभाव है और अटल बिहारी के जमाने से उसे भाजपा का समर्थक माना जाता रहा है। लेकिन, पहले सीएए का विरोध और फिर उससे पैदा हुई दिल्ली हिंसा को लेकर यह समुदाय आपस में ही बंटा हुआ नजर आ रहा है। कुछ शिया मुसलमानों का भाजपा सरकार से मोहभंग होता जा रहा है तो कुछ पूरी तरह से मोदी सरकार के समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। इन दोनों वर्गों के बीच ही कुछ ऐसे शिया भी हैं, जो बीजेपी के कुछ खास नेताओं से ही मायूस नजर आ रहे हैं, लेकिन पीएम मोदी के साथ डटकर खड़े दिख रहे हैं।

सीएए-दिल्ली हिंसा पर शियाओं में मतभेद

सीएए-दिल्ली हिंसा पर शियाओं में मतभेद

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शिया मुसलमानों को अनाधिकारिक तौर पर भाजपा का समर्थक समझा जाता है। पिछले कई लोकसभा चुनावों में शिया मुसलमानों ने अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर राजनाथ सिंह तक को खुलकर समर्थन किया है। लेकिन, सीएए-एनआरसी से लेकर दिल्ली हिंसा तक के मुद्दों ने बीजेपी को समर्थन देने को लेकर शिआओं के बीच में ही मतभेद पैदा कर दिए हैं। आज की स्थिति ये है कि शिया मुसलमान नागरिकता संशोधन कानून और दिल्ली हिंसा को लेकर पूरी तरह बंटा हुआ नजर आ रहा है। कुछ खुलकर सीएए की मुखालफत कर रहे हैं और दिल्ली हिंसा को 'राज्य प्रायोजित' बता रहे हैं तो कुछ पूरी तरह से मोदी सरकार के साथ डटे नजर आ रहे हैं। हालांकि, कुछ शिया ऐसे भी हैं, जो सीएए के मुद्दे पर भाजपा के कुछ खास नेताओं से ही नाराज नजर आ रहे हैं और उनका मानना है कि ऐसे नेता राष्ट्रीय नेतृत्व की छवि बिगाड़ना चाह रहे हैं।

(ऊपर की तस्वीर प्रतीकात्मक)

'उपद्रवी' पोस्टर ने किया कुछ शिया नेताओं को नाराज

'उपद्रवी' पोस्टर ने किया कुछ शिया नेताओं को नाराज

शियाओं के एक वर्ग में खासकर प्रदेश की बीजेपी सरकार से नाराजगी उस समय और बढ़ गई जब योगी आदित्यनाथ सरकार ने पिछले शुक्रवार को लखनऊ के चौराहों पर सीएए-विरोधी हिंसा में शामिल उपद्रवियों की तस्वीरों वाला बैनर टंगवा दिया है। बताया जा रहा है कि खासकर उन तस्वीरों में शिया धर्मगुरु और मशहूर शिया नेता मौलाना कल्बे सादिक के बेटे मौलान सैफ अब्बास की तस्वीर की मौजूदगी ने शियाओं को योगी सरकार से और खफा कर दिया है। इकोनॉमिक्स टाइम्स से बातचीत में सैफ अब्बास ने दावा किया है कि उन्हें गलत तरीके से हिंसा में फंसाया गया है। साथ ही उन्होंने ये भी कहा है कि 'सरकार चीजों को निजी तौर पर ले रही है और लोगों को नजरअंदाज किया जा रहा है और इसके परिणाम ठीक नहीं होंगे।' गौरतलब है कि पूरे देश में शियाओं के सम्मानित नेता बुजुर्ग कल्बे सादिक ने लखनऊ के हुसैनाबाद स्थित घंटाघर पर सीएए-विरोधी प्रदर्शन में शामिल होकर इस कानून का विरोध करने वालों का समर्थन किया था। उस रैली में उन्होंने गृहमंत्री अमित शाह के उस बयान की निंदा भी की थी, जिसमें उन्होंने किसी भी कीमत पर इसे वापस लेने की संभावनाओं को पूरी तरह से खारिज कर दिया था।

दिल्ली हिंसा ने भी किया शियाओं को नाखुश

दिल्ली हिंसा ने भी किया शियाओं को नाखुश

दरअसल, शियाओं के एक वर्ग में सीएए से लेकर शुरू हुआ भाजपा सरकार के विरोध का दायरा और बढ़ गया है। मसलन शियाओं के एक संगठन मजलिस-ए-उलेमा-हिंद के नेशनल सेक्रेटरी मौला कल्बे जवाद ने हाल ही में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगा-प्रभावित इलाकों का दौरान किया और उसे 'राज्य प्रायोजित' बता दिया। उन्होंने कहा है कि सरकार को कुछ पुलिस वालों के खिलाफ उच्च-स्तरीय जांच करानी चाहिए। उनका आरोप है कि कुछ विडियो में पुलिस वालों को भीड़ का साथ देते देखा जा रहा है। हालांकि, जवाद या कोई भी शिया धर्मगुरु ने पहले कभी भी किसी राजनीतिक दल का खुलकर समर्थन नहीं किया है, लेकिन इन्हें राजनाथ सिंह का भी नजदीका माना जाता है। जब जवाद से पूछा गया कि क्या 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में शिया भाजपा को समर्थन देंगे तो उन्होंने कहा है कि है, 'अगर मुसलमानों पर अत्याचार जारी रहा तो यह मुश्किल होगा।' इसके साथ ही उन्होंने दूसरे प्रभावी शिया नेताओं के साथ ये भी कहा है कि पार्टी में कुछ लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ काम कर रहे हैं।

सरकार को बदनाम करने की साजिश- वसीम रिजवी

सरकार को बदनाम करने की साजिश- वसीम रिजवी

लेकिन, यूपी सेंट्रल शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी का नजरिया बाकी शिया नेताओं और धर्मगुरुओं से पूरी तरह अलग है। चाहे सीएए हो या दिल्ली हिंसा में पुलिस का रोल वो दोनों मामलों में भाजपा सरकार का बचाव कर चुके हैं। इतना ही नहीं दिल्ली दंगों को लेकर अनावश्यक टिप्पणी के लिए वे ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खामेनेई के बयान को भी गैरजिम्मेदारीना ठहरा चुके हैं। रिजवी का कहना है कि, 'जानकारी के अभाव में कुछ मुसलमानों ने सीएए को लेकर पूरी तरह से भ्रम फैलाने का काम किया है, जबकि किसी भी मुसलमान की नागरिकता नहीं जा रही है। अभी देश में जो कुछ भी हो रहा है वह कट्टर संगठनों की ओर से सरकार को बदनाम करने की एक साजिश है।' शियाओं के कुछ ऐसे प्रतिनिधि भी हैं, जो अपना नाम तो जाहिर नहीं होने देना चाहते, लेकिन वो चाहते हैं कि लोगों (शियाओं) में भरोसा कायम करने के लिए राजनाथ जैसे नेताओं को आगे आना चाहिए।

देश की आबादी में 4-5 फीसदी हैं शिया मुसलमान

देश की आबादी में 4-5 फीसदी हैं शिया मुसलमान

बता दें कि देश के मुसलमानों में भी शिया समुदाय अपने आप में एक अल्पसंख्यक है। देश की कुल आबादी में शियाओं की जनसंख्या 4-5 फीसदी है और वे माना जाता है कि उन्हें भाजपा सरकारों में ज्यादा अहमियत मिलती रही है। खासकर उत्तर प्रदेश में वे इसीलिए भाजपा के करीब होते चले गए, क्योंकि समाजवादी पार्टी जैसी सरकारों में उन्हें आमतौर पर साइडलाइन ही रखा गया, क्योंकि उस सरकार में सुन्नी मुसलमानों का वर्चस्व देखा जाता रहा है। माना जा रहा है कि अयातुल्ला खामेनेई का दिल्ली हिंसा को लेकर आया बयान भी शियाओं में मची इसी खलबली का नतीजा है।

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English summary
Differences emerged in the Shia community over CAA and Delhi riots, some with the government and some opposed
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