कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी के सामने होंगी ये 5 बड़ी चुनौतियां
नई दिल्ली। राहुल गांधी ने आज देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस की कमान संभाल ली। मोदी और शाह के दौर में अध्यक्ष के तौर पर उनके सामने ढेरों चुनौतियां खड़ी हैं। पार्टी के सिकुड़ते जनाधार के बीच राहुल को न सिर्फ संगठन को मजबूत बनाना है, बल्कि चुनावी राजनीति में भी लगातार मिल रही नाकामियों के सिलसिले को भी तोड़ना होगा। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद सभी के मन में उनको लेकर कई सवाल चल रहे हैं। जैसे- कांग्रेस को राहुल के नेतृत्व का कितना फायदा होगा, उनकी अगुआई में संगठन कितना मजबूत होगा? और वह किस तरह मोदी का मुकाबला कर पाएंगे? ऐसी ही कुछ चुनौतियां राहुल गांधी के सामने हैं।

पार्टी का घटता जनाधार
कभी लगभग पूरे देश पर राज करने वाली पार्टी आज सिर्फ 5 राज्यों तक सिमट कर रह गई है। कई बड़े राज्य ऐसे भी हैं जहां पार्टी को सत्ता से दूर हुए एक-दो दशक से ज्यादा का वक्त हो चुका है। लगातार हार के चलते कार्यकर्ताओं में हताशा है। इसके लिए राहुल को संगठन में फिर से जान भरनी होगी। कर्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए राहुल को संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव करने होंगे इसके साथ ही उन्हें लोगों का नेता बनना होगा। गुजरात में वो 3-4 महीनों से लगातार काम करते रहे थे लेकिन बीच बीच में वो अचानक गायब हो जाते थे। जैसे मध्य प्रदेश में किसानों का विरोध चल रहा था वो देश से बहार गए हुए थे। उन्हें हमेशा उपलब्ध रहने वाला नेता बनना होगा।

पार्टी में गुटबाजी को खत्म करना होगा
कई राज्यों में कांग्रेस पार्टी के अंदर की गुटबाजी के चलते सत्ता में नहीं आ सकी। इसका सबसे अच्छा उदहारण छत्तीसगढ़ है। जहां पार्टी एक दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर है। कांग्रेस के अंदर कई राज्यों में गुटबाजी इस वक्त चरम पर है और पार्टी नेता एक दूसरे की जड़ें काटने में जुटे हैं। कुछ राज्यों में तो शीर्ष नेताओं में गुटबाजी इस हद तक कि वे एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में पार्टी का साख ताक पर रख देते हैं। पार्टी के अंदर चल रही इस गुटबाजी से निपटना राहुल के लिए एक बड़ी चुनौती है।

संगठन में बदलाव-
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी युवा हैं। उनकी कोशिश होगी कि वे पार्टी में युवाओं को तरजीह दे। ऐसे में कांग्रेस के उम्रदराज नेताओं की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बीजेपी में भी 75 साल से ज्यादा उम्र के नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जाती है। माना जा रहा है कि राहुल गांधी भी ऐसा ही प्लान पार्टी में ला सकते हैं, जिसमें उम्रदराज नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी से बचा जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो मोतीलाल बोरा, अहमद पटेल, अमरिंदर सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं को राजनीति से संन्यास लेना पड़ेगा। लेकिन राहुल अपनी टीम में पी चिदंबरम, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल जैसे लोगों को रखना चाहेंगे।

दूसरे पार्टियों के साथ गठबंधन की संभावनाएं भी तलाशनी होंगी
कांग्रेस कई राज्यों में सालों से सत्ता से बाहर है। अगर पार्टी को सत्ता में वापस लौटना है तो राहुल गांधी को क्षेत्रीय दलों के साथ फिर से तालमेल बैठाने होंगे। ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव, शरद पवार सभी वरिष्ठ नेता हैं। सोनिया गांधी की बात वो मानते हैं लेकिन राहुल गांधी की बात वो मानेंगे यह अभी सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। अगले साल कई राज्यों में चुनाव होने हैं। उनमें से कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। पार्टी अभी जमीनी स्तर पर काफी कमजोर दिख रही है। अगर कांग्रेस को वहां फिर से सत्ता में वापसी करनी है तो राहुल गांधी को कार्यकर्ताओं में फिर से उत्साह फूंकना होगा।

लोगों के बीच इमेज बदलना
अध्यक्ष के तौर पर राहुल का सीधा मुकाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से है। दोनों ही नेता आक्रमक छवि के माने जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ राहुल की लोगों के बीच नरम छवि के नेता की है। इसके लिए राहुल को कुछ कड़े फैसले लेने होगें साथ ही आक्रमक तेवर भी दिखाने होंगे। आपको बता दें कि पार्टी का जिक्र होते ही लोग मन में कांग्रेस को लेकर भ्रष्टाचार, वंशवाद, हिंदू-विरोध छवि सामने आ जाती है। राहुल को इस छवि को तोड़ना होगा।












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