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'रेप के ज़ख़्म ऐसे हैं कि अब हाथ मिलाने से भी डरती हूँ'

By Bbc Hindi
यौन हिंसा, बचपन, अपराध
AFP
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"मैं आज भी किसी अनजान आदमी से हाथ तक मिलाने में घबराती हूं. लोग मेरी किताब के बारे में बधाई देने आते हैं तो मैं हाथ जोड़ कर बधाई स्वीकार कर लेती हूँ."

ये कहना है बचपन में यौन उत्पीड़न झेल चुकी लेखिका पिंकी विरानी का. पिंकी विरानी ने बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध पर 'बिटर चॉकलेट' नाम की किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने ऐसे ही 100 से ज़्यादा लोगों के भयावह अनुभवों को शामिल किया है.

पिंकी अपने अनुभवों के बारे में खुलकर बात करती हैं, लेकिन ऐसा करने वाले लोग बहुत कम हैं.

दिल्ली में गुरुवार को जारी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2016 में बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध के 1,06,958 मामले सामने आए हैं, जबकि 2015 में कुल 94,172 मामले सामने आए थे. तीन साल से लगातार इस तरह के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है.

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बचपन की घटना का बड़े होने पर क्या होता है असर?

पिंकी विरानी बताती हैं कि बचपन में इस तरह से शारीरिक हिंसा या यौन हिंसा के शिकार लोग ताउम्र इस घटना को भूल नहीं पाते.

ऐसी ही एक लड़के ने नाम न लेने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "आज भी वो दिन याद करके रात को मैं बिस्तर गीला कर देता हूं. पहली बार मेरी बीवी को पता चला तो पूरी घटना बताते हुए मुझे झिझक हुई, लेकिन अब सब सामान्य है."

ऐसे लोगों के मानसिक अनुभव पर पिंकी विरानी कहतीं हैं, "कुछ लोग इस तरह की हिंसा का शिकार होने के बाद वेश्यावृत्ति में चले जाते हैं, कुछ ड्रग्स लेने लगते हैं और कुछ बड़े होकर दूसरों के साथ वही करते हैं जो उन्होंने खुद झेला है."

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पिंकी के मुताबिक़, "कुछ पर इस घटना का इतना बुरा असर पड़ता है कि वो यौन संबंधों को लेकर कर हमेशा शंका में रहते है इसलिए वो अपने लाइफ़ पार्टनर के साथ न्याय नहीं कर पाते हैं."

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक़ बच्चों के साथ होने वाली शारीरिक हिंसा या यौन हिंसा के मामले में सभी राज्यों में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है. इन मामलों में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का स्थान दूसरा और तीसरा है.

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क्या कहता है क़ानून?

बच्चों को ऐसे हमलों से बचाने की ज़िम्मेदारी किसकी है- राज्य सरकार की या फिर केंद्र सरकार की? इस सवाल पर पिंकी कहती हैं, "ऐसे अपराध रोकने के लिए हमारे पास पोक्सो (पीओसीएसओ) नाम का क़ानून है और ये क़ानून सख़्त भी है लेकिन कमी है इसके इस्तेमाल में."

हाल ही में दिल्ली के प्राइवेट स्कूल में एक चार साल की बच्ची के साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए पिंकी कहती हैं, "पोक्सो क़ानून के मुताबिक़ इस मामले के सामने आने के बाद पुलिस को अभियुक्त के घर जाकर उनके माता-पिता से बात करनी चाहिए थी. माता-पिता के उनके बच्चों के साथ के व्यवहार पर काउंसलर के साथ बात होनी चाहिए थी. ये सब क़ानून का हिस्सा है लेकिन ऐसा हुआ नहीं."

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RAUL ARBOLEDA/AFP/Getty Images
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अगर 18 साल से कम उम्र वाले बच्चे के साथ किसी तरह का शारीरिक या यौन हिंसा का मामा सामने आता है तो पुलिस मामले को पोक्सो एक्ट के तहत ही दर्ज करती है. एनसीआरबी के आंकड़े बताते है कि पोक्सो एक्ट के तहत केवल 34.4 फीसदी मामले ही रिपोर्ट किए जा रहे हैं.

लेकिन क्या वाकई में क़ानून के इस्तेमाल में कोई दिक्कत है? इस पर बीबीसी ने दिल्ली के राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष स्तुति कक्कड़ से बात की.

स्तुति के मुताबिक़, "ऐसे अपराध होने के बाद ये पीड़ित पर निर्भर करता है कि वो अपराध पर रिपोर्ट दर्ज कराना चाहता है या नहीं. लेकिन इतना ज़रूर है कि पोक्सो एक्ट के तहत सज़ा को और बढ़ाने की ज़रूरत है, साथ ही काउंसेलर की संख्या भी बढ़ाई जानी चाहिए."

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कैसे होता है यौन शोषण के शिकार का इलाज?

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अपनी किताब 'बिटर चॉकलेट' में पिंकी विरानी ने विस्तार से शारीरिक हिंसा या यौन हिंसा जैसे अपराध के शिकार लोगों के इलाज़ पर बात की है. पिंकी के मुताबिक़, "बचपन में ऐसे लोगों का इलाज तीन स्तर पर होता है. पहला पीड़ित के तौर पर, फिर सर्वाइवर के तौर पर और अंत में आता है एक्जिट स्टेज."

पिंकी विरानी के मुताबिक़ सबसे पहले अभिभावकों को अपने बच्चों को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए. बच्चों को घर में और घर के बाहर भी ऐसे लोगों से बचा कर रखना चाहिए. उसके बाद भी अगर ऐसा हो जाए तो काउंसेलर की मदद लेनी चाहिए.

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स्तुति कक्कड़ के मुताबिक़ देश में इस तरह के मामलों में काउंसलरों की बहुत कमी है. बच्चों के ख़िलाफ़ बढ़ते मामलों के मद्देनज़र काउंसलर की ज़रूरत स्कूल, कोर्ट और पुलिस स्टेशन में है. लेकिन इतनी संख्या में काउंसेलर उपलब्ध नहीं हैं.

अगर काउंसलर से काम न बने तो मनोचिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए. किसी भी सूरत में ज़रूरत इस बात की होती है कि इस तरह के शिकार लोग तीनों स्टेज से गुज़रें.

मतलब ये कि एक पीड़ित के तौर पर इलाज़ शुरु हो तो इलाज ख़त्म होने पर वो एक्जिट स्टेज से बाहर आकर समाज में अपने नाम और अपने काम से अपनी नई और अलग पहचान बना पाएं.

BBC Hindi
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English summary
The wounds of the rape are such that now I am afraid to join hands

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