जनता ने बरकरार रखा 33 साल का ट्रेंड, वापस नहीं लौट पाई कोई सरकार
नई दिल्ली। दक्षिण के सबसे महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक में भाजपा एक बार फिर सत्ता पर काबिज होने की तैयारी में है, पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ राज्य में वापसी करती दिख रही है। वहीं देश के बाकी राज्यों की तरह कांग्रेस के दुर्दिन कर्नाटक में भी जारी रहे और पार्टी को राज्य में शर्मनाक हार झेलनी पड़ी है। कर्नाटक में भाजपा की बड़ी जीत के पीछे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की सटीक रणनीति और मुख्यमंत्री उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा की लोकप्रिय छवि के अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व को प्रमुख श्रेय दिया जा रहा है। वहीं हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर निशाने पर हैं। लेकिन भाजपा की इस बड़ी जीत और कांग्रेस की हार के पीछे राज्य की जनता का वो मिजाज भी है जो हर साल एक पार्टी को सत्ता से हटाकर दूसरी को कुर्सी पर बिठा देता है। बीते 33 सालों में ये ट्रेंड कभी नहीं बदला, तमाम लहर और मुद्दे इससे अछूते रहे।

1985 में रामकृष्ण हेगड़े ही कर पाए थे दोबारा सत्ता में वापसी
साल 1985 में जनता दल के रामकृष्ण हेगड़े ही वो अकेले मुख्यमंत्री थे जो 1983 में मिली अपनी पार्टी की जीत को दोबारा दोहराने में सफल रहे थे। 1985 में आठवीं विधानसभा के लिए हुए चुनावों में जनता दल ने हेगड़े के नेतृत्व में अपनी सरकार बनाई, इसी कार्यकाल में हेगड़े के बाद एसआर बोम्मई भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। इसके बाद 1989 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने बाजी पलटी और 178 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई। जनता दल को इन चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के कारण मात्र 24 सीटों से संतोष करना पड़ा। राज्य में अपने पैर पसारने का प्रयास कर रही भाजपा को उस समय मात्र 4 सीटें मिली थीं। कांग्रेस के वीरेन्द्र पाटिल मुख्यमंत्री बनाए गए, हालांकि वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके और एस बंगारप्पा से होते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी वीरप्पा मोइली तक पहुंची।

1994 में हुए चुनावों में भाजपा ने दर्ज कराई जोरदार उपस्थिति
दसवीं विधानसभा के लिए 1994 में हुए चुनावों में जनता दल ने फिर एक बार जोरदार वापसी की और 115 सीटें जीतकर सरकार बनाई। बुजुर्ग नेता एचडी देवगौडा को राज्य की कमान सौंपी गई। लेकिन एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में देवगौडा के देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी जेएच पाटिल को मिल गई। इन चुनावों में भाजपा ने बड़ी छलांग लगाई और पार्टी 4 सीटों से एकदम 40 पर पहुंच गई। 1999 में 11वीं विधानसभा के लिए हुए चुनावों में कांग्रेस ने फिर बाजी पलटी और 132 सीटों पर जीत दर्ज कर एसएम कृष्णा के नेतृत्व में सरकार बनाई। इस बार हैरतअंगेज रूप से भाजपा अचानक 44 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई। जबकि कुछ दिन पहले तक सत्ता में रही जनता दल दोफाड होकर जनता दल सेक्यूलर और जनता दल यूनाइटेड में बंट गई। देवगौडा के नेतृत्व वाली जेडीएस को मात्र दस सीटें जबकि नीतीश कुमार और शरद यादव वाले जेडीयू को 18 सीटें मिलीं।

2004 के चुनावों में जनता ने किसी के हाथ में नहीं दी सत्ता की चाभी
2004 के विधानसभा चुनावों में राज्य की राजनीतिक परिस्थिति पूरी तरह पलट गई, इस बार जनता ने किसी एक पार्टी पर भरोसा न कर तीनों पार्टियों को लगभग बराबरी पर ला खड़ा किया। भाजपा सबसे ज्यादा 79 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस को 65 और जनता दल को 58 सीटें मिलीं। हालांकि भाजपा की यह बड़ी कामयाबी उसके काम नहीं आई और कांग्रेस-जेडीएस ने गठबंधन कर राज्य में अपनी सरकार बना ली। कांग्रेस के धर्म सिंह ने मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की कमान संभाली, लेकिन सत्ता की लालसा में ज्यादा दिन तक जेडीएस उनके साथ न रह सकी और सालभर बाद ही समर्थन वापस ले लिया। जिसके बाद भाजपा के सहयोग से देवगौडा के बेटे एचडी कुमार स्वामी 50-50 के फार्मूले से राज्य के मुख्यमंत्री बने। दोनों पार्टियों में इस बात पर समझौता हुआ था की बचे कार्यकाल के लिए आधे-आधे समय तक दोनों पार्टियों के मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे। कुमारस्वामी का कार्यकाल पूरा होने के बाद भाजपा के येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी ही गई थी कि कुमारस्वामी पलटी मार गए। उन्होंने भाजपा को समर्थन देने से इंकार कर दिया। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

2008 में भाजपा ने पलटी बाजी, दक्षिण में पहली बार बनाई सरकार
साल 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने इस बार सारी बाजी पलटते हुए येदियुरप्पा के नेतृत्व में अकेले दम सरकार बनाई। भाजपा को 110 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस को 80 और जेडीएस को मात्र 28 सीट। हालांकि भाजपा के लिए राज्य में सत्ता चलाना इतना आसान नहीं रहा, उसके मुख्यमंत्री येदियुरप्पा भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में फंसे और उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी, जिसके बाद सदनांद गौडा को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन येदियुरप्पा के विरोध के बाद उन्हें भी कुर्सी छोड़नी पड़ी और जगदीश शेट्टार राज्य के अगले मुख्यमंत्री बने। भाजपा ने जैसे तैसे ये कार्यकाल पूरा किया। साल 2013 में राज्य की जनता का पुराना रुख बरकरार रहा और सत्ता में मौजूद भाजपा को बेदखल होना पड़ा और कुछ साल पहले ही जेडीएस से आए नए नेता सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री के रूप में कांग्रेस की ओर से शपथ ली। इसी बीच येदियुरप्पा ने एक बार फिर भाजपा में वापसी की जिसके बाद राज्य के समीकरण तेजी से बदलने शुरू हो गए। नए समीकरणों के साथ भाजपा एक बार फिर राज्य में सत्ता की चौखट पर है, जिसका श्रेय येदियुरप्पा से लेकर प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तक को दिया जा रहा है लेकिन असली रोल उसी जनता का है जो हर चुनाव में सत्तारूढ़ दल को कुर्सी से उतारकर उसे उसकी हैसियत का एहसास करा देती है।












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