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इसलिए हैदराबाद गैंगरेप और मर्डर के आरोपियों के एनकाउंटर से खुश हैं लोग!

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बेंगलुरू। हैदराबाद रेप-मर्डर केस के आरोपियों के पुलिस एनकाउंटर को मिल रहे समर्थन से भारतीय न्याय व्यवस्था की कार्य प्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है। कहते हैं देर से मिला न्याय लगभग अन्याय के बराबर होता है। इसका ताजा उदाहरण उन्नाव रेप पीड़िता की मौत से लगाया जा सकता है, जिसे न्यायालय द्वारा रिहा किए पांच आरोपियों ने जिंदा जला दिया था।

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हैदराबाद वेटनरी डाक्टर दिशा रेड्डी के गैंगरेप और मर्डर के चारों आरोपियों के एनकाउंटर पर कई लोगों द्वारा भले ही सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन जिस तरह से पूरे देश में हैदराबाद पुलिस को जन समर्थन मिल रहा है, वो सीधे-सीधे भारतीय न्याय व्यवस्था और उसकी कार्य प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है। लोगों को हैदराबाद गैंगरेप केस में मिली तुरत न्याय से खुशी मिली, जिसे जाहिर करने में लोगों ने देर नहीं की।

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गौरतलब है हैदराबाद में डाक्टर से गैंगरेप और मर्डर की खबरों के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों से आईं समान खबरों ने पूरे देश को पूरी तरह से झकझोर दिया था। लोगों में आक्रोश भरा हुआ था और ऐसे में जब लोगों को हैदराबाद गैंगरेप केस के चारों आरोपियों को एनकाउंटर में मारने की खबर आई तो लोग बेहद खुश हुए।

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हैदराबाद गैंगरेप और मर्डर के आरोपियों की पुलिस एनकाउंटर में मौत के बाद लोगों ने खुशी त्वरित न्याय के लिए मनाई थी। यह खुशी एनकाउंटर के तरीकों और उसके सही और गलत से परे था। हैदराबाद पुलिस को उनका समर्थन इसलिए था, क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया से दिल्ली के निर्भया केस में दोषी ठहराए चारों अपराधी 7 वर्ष बाद भी फांसी के फंदे से दूर हैं। यही नहीं, सजा से बचने के लिए निर्भया के दोषी अब नए-नए तरीके खोज कर रहे हैं। इनमें एक दया याचिका है, जिसे एक दोषी ने अभी राष्ट्रपति के पास भेजा है।

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ज्यादातर लोगों के हैदराबाद पुलिस के एनकाउंटर के पक्ष में खड़े होने के पीछे भारतीय न्यायालय की कार्य प्रणाली के प्रति नाराजगी थी। इसके पीछे न्यायपालिका के प्रति भरोसा उठना बिल्कुल नहीं है। चूंकि पिछले कुछ सालों के रेप और गैंगरेप से जुड़ी घटनाओं से आम जनता में भय घुस चुका है।

जनता ऐसे आरोपियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई चाहती है और दोषी पाए जाने पर उन्हें तुरंत फांसी पर लटकना देखना चाहती है, लेकिन न्याय प्रक्रिया देरी और दोषी ठहराए जा चुके लोगों को भी फांसी के फंदे पर लटकाने में देरी से लोगों का संयम डगमगा दिया है। इसलिए जनता ने हैदराबाद पुलिस के एनकाउंटर में मारे गए आरोपियों की मौत पर जश्न मनाने को मजबूर हुई कि चलों कहीं भी, कैसे भी न्याय मिला।

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दरअसल, हैदराबाद गैंगरेप और मर्डर के आरोपियों ने जिस नृशंसता से घटना को अंजाम दिया था उससे लोगों में आक्रोश भर गया था और सभी आरोपियों पर तुरंत कार्रवाई चाहते थे और जब हैदराबाद पुलिस एनकाउंटर में आरोपियों की मौत की खबर मिली तो लोगों को जैसे अंधकार में रोशनी मिल गई।

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जनता तरीकों और सही-गलत में नहीं पड़ते हुए सिर्फ आरोपियों के मौत पर जश्न मनाना चाहती थी। यह जनता में दिल में दबा हुआ दर्द था जो हैदराबाद पुलिस द्वारा किए एनकाउंटर के बाद जश्न बनकर निकल रहा था। क्योंकि आंकड़े की मानें तो ऐसे मामलों में आरोपियों को न्यायालय से दोषी साबित होने की संख्या बेहद कम है और जिन्हें न्यायालय की लंबी प्रक्रिया के बाद फांसी की सजा दे दी गई वो अपराधी पिछले 7 वर्षों से जेल में मौज कर रहे हैं, जो दोषी करार हैं।

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उल्लेखनीय है वर्ष 2014 से 2017 तक के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अब तक रेप और गैंगरेप केस रजिस्टर हुए केसों में महज 30 फीसदी आरोपियों को सजा मिल पाई है जबकि अकेले वर्ष 2017 में देशभर में कुल 1 लाख 46 हजार रेप के वारदात रजिस्टर हुए थे। इनमें से महज 201 मामलों में ट्रायल चला और सिर्फ 31.8 फीसदी केस में आरोपियों के खिलाफ दोषसिद्धि हुई बाकी साफ बच गए।

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कुछ ऐसा ही आंकड़ा गैंगरेप से जुड़े मामलों की भी है, जहां वर्ष 2017 के गैंगरेप के 90.1 फीसदी मामले अभी भी न्यायालयों में लंबित पड़े हैं और जब तक केस में फैसले का समय आएगा तब तक पीड़ित न्याय पाने की हालत में नहीं रह पाता है। इसके लिए पीड़ित की आर्थिक, मानसिक और सामाजिक समस्या बड़ी वजह होते हैं, जिससे वो केस की पैरवी नहीं कर पाते हैं।

हैदराबाद डॉक्टर गैंगरेप: चारों आरोपियों का एनकाउंटर करने वाले वीसी सज्जनार के भाई ने क्या कहा

महज 30 फीसदी केस में रेप आरोपियों को मिली सजा

महज 30 फीसदी केस में रेप आरोपियों को मिली सजा

वर्ष 2014 से 2017 तक के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अबतक रेप और गैंगरेप केस रजिस्टर हुए केसों में महज 30 फीसदी आरोपियों को सजा मिल पाई है जबकि अकेले वर्ष 2017 में देशभर में कुल 1 लाख 46 हजार रेप के वारदात रजिस्टर हुए थे। इनमें से महज 201 मामलों में ट्रायल चला और सिर्फ 31.8 फीसदी केस में आरोपियों के खिलाफ दोषसिद्धि हुई बाकी साफ बच गए। कुछ ऐसा ही आंकड़ा गैंगरेप से जुड़े मामलों की भी है, जहां वर्ष 2017 के गैंगरेप के 90.1 फीसदी मामले अभी भी न्यायालयों में लंबित पड़े हैं और जब तक केस में फैसले का समय आएगा तब तक पीड़ित न्याय पाने की हालत में नहीं रह पाता है। इसके लिए पीड़ित की आर्थिक, मानसिक और सामाजिक समस्या बड़ी वजह होते हैं, जिससे वो केस की पैरवी नहीं कर पाते हैं।

7 साल में कस्टडी में मौत का कोई दोषी नहींः NCRB

7 साल में कस्टडी में मौत का कोई दोषी नहींः NCRB

रेप के आरोपियों के एनकाउंटर के बाद एक धड़ा पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठा रहा है। वहीं नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB)के मुताबिक, पिछले सात सालों में कस्टडी में किसी की मौत के लिए किसी पुलिसवाले को दोषी नहीं ठहराया गया है। बता दें कि साल 2011 से अब तक पुलिस कस्टडी में 713 लोगों की मौत हुई है।

एनकाउंटर से मिले त्वरित न्याय है लोगों की खुशी की बड़ी वजह

एनकाउंटर से मिले त्वरित न्याय है लोगों की खुशी की बड़ी वजह

पिछले कुछ सालों के रेप से जुड़े आंकडें बताते हैं कि ऐसे मामलों में दोषी साबित होने वाले लोगों की संख्या बेहद कम है। इतना ही नहीं पिछले 11 सालों में जिन तीन केसों ने देश की राजधानी को झकझोर दिया वे अभी तक कोर्ट में हैं। हैदराबाद मामले में लोगों की खुशी की असली वजह त्वरित न्याय थी, क्योंकि लोग देश में लगातार हो रहे हैदराबाद में हुए नृशंस गैंगरेप और मर्डर से बेहद आक्रोशित थे।

दिल्ली निर्भया गैंगरेप केस के दोषियों को फांसी नहीं

दिल्ली निर्भया गैंगरेप केस के दोषियों को फांसी नहीं

16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप ने पूरे देश को हिला दिया था। पीड़िता की मौत के बाद ऐसे जघन्य अपराधों से निपटने के कानून में बदलाव हुए। इसके बाद ही रेप केसों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बने थे। 2013 में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने इन्हें दोषी पाया और फांसी की सजा सुनाई। सजा के खिलाफ दोषी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए, जिसके चलते 2014 में इन्हें फांसी नहीं हुई। फिर मामला अटका रहा। अब 2018 में इनकी रिव्यू याचिका खारिज की गई। फिलहाल फांसी पर कोई फैसला इसलिए नहीं हुआ क्योंकि एक दोषी (विनय शर्मा) ने दया याचिका दायर की हुई है। जिस पर अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है।

पत्रकार सोम्या विश्वनाथन का आरोपी परोल पर बाहर है

पत्रकार सोम्या विश्वनाथन का आरोपी परोल पर बाहर है

वर्ष 2008 में दिल्ली की टीवी पत्रकार सोम्या विश्वनाथन को गोली मार दी गई थी। उस वक्त वह रात को अपने घर लौट रही थीं। मामले में तीन लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ था। ये तीन लोग आईटी कर्मचारी जिगिशा घोष के मर्डर के भी दोषी पाए गए। फिलहाल साकेत की जिला कोर्ट में इनका ट्रायल चल रहा है और उनमें से एक आरोपी रवि कपूर जुलाई में परोल पर बाहर तक आ चुका है।

जिगिशा घोष मर्डर केस में मौत की सजा पर अमल नहीं

जिगिशा घोष मर्डर केस में मौत की सजा पर अमल नहीं

वर्ष 2009 में नोएडा में जॉब करने वाली जिगिशा घोष मर्डर हो गया था। यह घटना दिल्ली के पॉश इलाके वसंत विहार में घटी थी। उनका शव तीन दिन बाद सूरजकुंड से मिला था। आरोपी सोने के आभूषण, दो फोन और डेबट-क्रेडिट कार्ड ले गए थे। ट्रायल कोर्ट द्वारा तीन दोषियों में से दो (रवि कपूर, अमित शुक्ला) को मौत की सजा और बलजीत मलिक को उम्रकैद की सजा सुनाई गई, लेकिन अभी तक दोषियों को सजा नहीं मिली, क्योंकि दिल्ली हाई कोर्ट ने रवि और अमित की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। यह जिगिशा के परिवार के लिए झटके जैसा था। अब मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसला का इंतजार है।

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English summary
After the death of the accused in the Hyderabad gangrape and murder in a police encounter, people had celebrated for justice immediately. This happiness was beyond the encounter methods and its right and wrong. His support to the Hyderabad police was because the four criminals convicted in the Nirbhaya case of Delhi by judicial process are still away from execution after 7 years. Not only this, Nirbhaya's convicts are now finding new ways to escape punishment. These include a mercy petition, which a convict has just sent to the President.
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