• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

सरकार बनाने में तमिलनाडु की 39 सीटों की होगी अहम भूमिका, मतदान से पहले समझिए पूरा गुणा-गणित

|

नई दिल्ली- 18 अप्रैल को 13 राज्यों की जिन 97 लोकसभा सीटों पर चुनाव होने जा रहा है, उसमें तमिलनाडु की 39 सीटें सबसे अहम मानी जा रही हैं। यहां की सभी लोकसभा सीटों पर एक ही चरण में चुनाव हो रहा है। हाल के 3-4 दशकों में राज्य में यह पहला चुनाव है, जब प्रदेश के दो धुरंधर राजनेता जे जयललिता और एम करुणानिधि नहीं हैं। इस चुनाव में सत्ताधारी एआईएडीएमके (AIADMK) के सामने अम्मा के बगैर पार्टी की साख बचाए रखने की चुनौती है। वहीं विपक्षी डीएमके (DMK) के सामने करुणानिधि के बगैर अपना सियासी दबदबा फिर से हासिल करने का चैलेंज है। अक्सर देखा गया है कि तमिलनाडु की जनता जब भी चुनावी फैसला करती है, तो एकतरफा करती है। मसलन पिछले लोकसभा चुनाव में एआईएडीएमके (AIADMK) ने 39 में से 37 सीटें जीत ली थीं, तो डीएमके (DMK)का खाता भी नहीं खुल पाया था। वहां पर अक्सर मतदाता अपना फैसला पूरी तरह से पलटने के लिए के लिए भी चर्चित रहे हैं। अगर इसबार ऐसा होता है, तो केंद्र के राजनीतिक समीकरण में भी बहुत बड़ा उलटफेर होने की संभावना बन सकती है। ऊपर से राज्य की दोनों बड़ी पार्टियों ने भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के साथ चुनाव से पहले गठबंधन किया है। इन दोनों को ही राज्य की राजनीति में तेजी से उभरे नए, मगर कुछ बड़े चेहरों की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। कुल मिलाकर तमिलनाडु का यह चुनाव राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति के लिए भी बहुत बड़ा चुनाव होने जा रहा है, जिसमें दोनों बड़े क्षेत्रीय दलों के अलावा दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों का भी काफी कुछ दांव पर लगा है। आइए उन मुद्दों को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं, जिसपर तमिलनाडु का सियासी भविष्य ही नहीं, देश के राजनीतिक भाग्य का भी दारोमदार टिका हुआ है।

इसबार तमिलनाडु सबसे बड़ा फैक्टर

इसबार तमिलनाडु सबसे बड़ा फैक्टर

बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही इसबार तमिलनाडु की दोनों बड़ी पार्टियों एआईएडीएमके (AIADMK) और डीएमके (DMK) के साथ गठबंधन के तहत चुनाव लड़ रही हैं। मतलब साफ है, कि तमिलनाडु के मतदाता जो भी फैसला करेंगे, उससे दिल्ली में आने वाली सत्ता की दिशा और दशा तय होने वाली है। 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो वहां सत्ताधारी एआईएडीएमके (AIADMK) को 37, पीएमके (PMK) को 1 और बीजेपी (BJP) को भी 1 सीट मिली थी। कन्याकुमारी की सीट पर जीत भाजपा जैसी बड़ी पार्टी के लिहाज से देखने में भले ही छोटी लगती है, लेकिन इसका मैसेज बहुत ही बड़ा है। यानी कर्नाटक के बाद दक्षिण के इस राज्य में भी पार्टी अपनी एंट्री दर्ज करा चुकी। अगर वोट शेयर के हिसाब से देखें तो पिछली बार एआईएडीएमके (AIADMK) को 44.3%, डीएमके (DMK) को 23.6%, बीजेपी को 5.5%, डीएमडीके (DMDK) को 5.1%, पीएमके (PMK)को 4.4% और कांग्रेस को 4.3% वोट मिले थे। यानी वोट शेयर में तब भी भाजपा राज्य में तीसरे नंबर पर आई थी। सबसे बड़ी बात कि उस समय अम्मा राजनीति में सक्रिय थीं और करुणानिधि भी जीवित थे। लेकिन, इसबार का समीकरण काफी कुछ बदल चुका है। एआईएडीएमके (AIADMK) और डीएमके (DMK) बीजेपी, कांग्रेस के अलावा बाकी छोटी-छोटी पार्टियों को भी अपने-अपने हिसाब से गोलबंद करके चुनाव में उतरी हैं। डीएमडीके (DMDK) को एंटी-इंकम्बेंसी और मोदी-विरोध की राजनीति की बदौलत पिछला चुनाव परिणाम पलटने का भरोसा है, तो एआईएडीएमके (AIADMK)-बीजेपी गठबंधन को बाकी तमिल पार्टियों की एकजुटता और केंद्र के साथ के दम पर जीत का भरोसा है। इसलिए, तमिलनाडु का चुनाव परिणाम न सिर्फ इसबार दिल्ली की सत्ता की चाबी साबित होने जा रहा है, बल्कि इससे एमके स्टालिन और ईके पलानीस्वामी के राजनीतिक भविष्य का भी फैसला भी होने जा रहा है। दोनों के लिए इसबार अपनी लीडरशिप का लोहा मनवाने की चुनौती है।

ओबीसी वोट बैंक की गोलबंदी

ओबीसी वोट बैंक की गोलबंदी

तमिलनाडु में इसबार बीजेपी यूपी, बिहार, गुजरात और कर्नाटक की तर्ज पर ही ओबीसी (OBC) वोट बैंक की गोलबंदी पर फोकस कर रही है। एआईएडीएमके (AIADMK)-बीजेपी गठबंधन खासकर गोंडर (Gounders),थेवार (Thevars) और वानियार (Vaniyars) का समर्थन चाहती हैं। इसी आधार पर इन्होंने पीएमके, डीएमडीके, तमिल मानिला कांग्रेस (TMC)और अन्य छोटे-छोटे दलों का गठजोड़ बनाया है। इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक अमित शाह ने इसपर बहुत काम किया है और पीयूष गोयल को इसकी विशेष जिम्मेदारी सौंपी थी। जबकि डीएमके-कांग्रेस को लेफ्ट पार्टियों, वाइको, वीसीके, दलित पार्टी, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, एमएमके जैसी छोटी पार्टियों का साथ मिल रहा है।

सत्ताधारी दल के लिए दोहरी एंटी-इंकम्बेंसी

सत्ताधारी दल के लिए दोहरी एंटी-इंकम्बेंसी

जातीय गोलबंदी साधने में सत्ताधारी एआईएडीएमके (AIADMK) भले ही आगे रही हो, लेकिन उसे दो तरह की एंटी-इंकम्बेंसी का नुकसान भुगतना पड़ सकता है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मोदी सरकार के खिलाफ राज्य के लोगों की जो भी नाराजगी होगी, उससे भी उसे दो-चार होना पड़ सकता है। मसलन, बेरोजगारी, जीएसटी-नोटबंदी, स्टरलाइट विवाद और कन्याकुमारी पोर्ट के मसले उसे परेशान कर सकते हैं। खासकर वेदांता हिंसा के कारण सत्ताधारी दल को बहुत नुकसान भुगतना पड़ सकता है, जिसमें 13 लोगों की जान चली गई थी। इस विवाद को लेकर तमिलनाडु के कुछ खास वर्ग में सरकार के खिलाफ बहुत ज्यादा नाराजगी है। हालांकि, राज्य में यह मुद्दा ध्रुवीकरण की वजह भी बन सकता है और बीजेपी उसे हवा देने से पीछे भी नहीं हटेगी। क्योंकि, फायरिंग के बाद जिस मछुआरा समाज के खिलाफ पुलिस कार्रवाई का आरोप है, वे ईसाई समुदाय के हैं। ऊपर से अम्मा के बिना राज्य की सत्ता में शुरुआती उथल-पुथल और राज्य सरकार के कार्यों के प्रति जनता की जितनी भी निराशा है, उसका भी खामियाजा एआईएडीएमकी-बीजेपी गठबंधन को भुगतना पड़ सकता है। हालांकि, मुख्यमंत्री पलानीस्वामी और उपमुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम का अपना राजनीतिक भविष्य भी बहुत हद तक इस चुनाव पर टिका है, इसलिए वो अपनी पूरी ताकत झोंककर गठबंधन को 2014 वाली सफलता दोहराने का प्रयास कर रहे हैं।

इसे भी पढ़ें- 2019 में कौन बना सकता है केंद्र में सरकार, पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा ने बताया

स्टालिन के भविष्य पर दांव

स्टालिन के भविष्य पर दांव

डीएमके चीफ एमके स्टालिन के लिए इस चुनाव में सब कुछ दांव पर लगा हुआ है। उन्हें 2016 के चुनाव और जयललिता की मौत के बाद आरके नगर चुनाव में पार्टी की बड़ी नाकामी से उबरने की चुनौती है। एक वरिष्ठ डीएमके नेता के मुताबिक अगर उनकी अगवाई में गठबंधन को 28 सीटों से कम मिलीं, तो उन्हें इसका जवाब देना पड़ेगा। क्योंकि इसबार सारी परिस्थितियां उनके हक में है। वे करुणानिधि के सही उत्तराधिकारी हैं, यह साबित करने के लिए उन्हें 35 सीट तक जितने का दम दिखाना चाहिए। यही वजह है कि इसबार के चुनाव प्रचार में उनकी आक्रमक छवि कम ही देखने को मिल रही है। वे परिवार के विवाद को भी हल्का करने का संकेत दे रहे हैं। राजनीतिक कटुता को भी मिटाने की कोशिशें कर रहे हैं। हालांकि, पार्टी की जिम्मेदारी संभालने के बाद अभी तक एक भी बड़ी कामयाबी हासिल नहीं करने का दाग इस बार भी उनका पीछा छोड़ेगा या नहीं यह देखना दिलचस्प होगा।

न्यूकमर्स का चैलेंज

न्यूकमर्स का चैलेंज

तमिलनाडु में इस बार दो नए चेहरे भी चुनाव को दिलचस्प बना रहे हैं। इनमें से एक तमिल सुपरस्टार रहे कमल हासन हैं और दूसरे शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरन हैं। दिनाकरन खुद को जयललिता का असली उत्तराधिकारी साबित करना चाहते हैं। उन्होंने एआईएडीएमके को तोड़कर अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (AMMK) नाम की नई पार्टी बनाई है। जानकारों की राय में भले ही दिनाकर की पार्टी सीटें जीतने में नाकाम रहे, लेकिन कई जगहों पर सत्ताधारी दल का समीकरण खराब जरूर कर सकती है। थेणी ऐसी ही सीट है, जहां से पन्नीरसेल्वम के बेटे चुनाव लड़ रहे हैं। इनके अलावा सत्ताधारी दल को कुछ सीटों पर बागी प्रत्याशियों से भी जूझना पड़ रहा है।

यहां भी मोदी फैक्टर मौजूद

यहां भी मोदी फैक्टर मौजूद

बीजेपी को भरोसा है कि पिछले पांच साल में मोदी सरकार ने तमिलनाडु के लिए जो काम किया है, उसका फायदा उनके गठबंधन को जरूर मिलेगा। इसके लिए मदुरै में एम्स, 6 बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, एक डिफेंस कॉरिडोर, तिरुपुर में गार्मेंट इंडस्ट्री, मुद्रा और किसान बीमा योजना जैसे केंद्रीय योजनाओं और परियोजनाओं का हवाला दिया जा रहा है। यही नहीं पार्टी गाजा तूफान के समय तमिलनाडु की सहायता के लिए केंद्र से मदद को भी राज्य के लोगों से वोट पाने का कारण मान रही है। लेकिन, विपक्ष इसपर उल्टा वार कर रहा है। विपक्ष का आरोप है कि मौजूदा पलानीस्वामी सरकार केंद्र के हाथों की कठपुतली बन चुकी है। तमिलनाडु की स्वायत्ता बीजेपी खत्म कर रही है। डीएमके-कांग्रेस के चुनाव प्रचार का एक प्रमुख मुद्दा मोदी-विरोध भी है। यानी कुल मिलाकर पूरे देश की तरह भी तमिलनाडु में भी मोदी का साथ या मोदी का विरोध करने पर राजनीति बंटी हुई नजर आ रही है।

इन सबके अलावा तमिलनाडु में हर बार की तरह इसबार भी मनी फैक्टर बहुत बड़ा रोल निभाता दिख रहा है। एक आंकड़े के मुताबिक चुनाव आयोग अब तक करीब 500 करोड़ रुपये से ज्यादा कैश और जेवरात जब्त कर चुका है। वेल्लोर में वोट के लिए पैसे देने का मामला पहले ही तूल पकड़ चुका है, जहां एक डीएमके कार्यकर्ता के ठिकाने से चुनाव अधिकारियों ने 11.53 करोड़ रुपये बरामद किए हैं। 2016 में चुनाव आयोग ने वहां वोट के लिए रिश्वत देने के करीब 100 मामले दर्ज किए थे और तीन विधानसभा चुनाव क्षेत्रों का चुनाव रद्द कर दिया था। बाद में उन तीनों सीटों पर जब फिर से चुनाव कराए गए, तो उन तीनों पर सत्ताधारी एआईएडीएमके की जीत हुई थी।

इसे भी पढ़ें- ईवीएम : जीते तो ठीक हारे तो मशीन गड़बड़

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Tamil Nadu's 39 seats will play an important role in forming government,know the mathematics
For Daily Alerts

Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more