SC का ऐतिहासिक फैसला, सिटिजेनशिप एक्ट की धारा 6A को बताया वैद्य, संवैधानिक पीठ ने 4-1 से सुनाया निर्णय

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने आज (17 अक्तूबर) नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6A की संवैधानिक वैधता पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे वैद्य करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्र और राज्य सरकार से अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान, उनका पता लगाने और निर्वासन के लिए असम में तत्कालीन सर्बानंद सोनोवाल की सरकार के एनआरसी को लेकर दिए गए निर्देश को प्रभावी ढंग से लागू करने को कहा है।

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने धारा 6A को बरकरार रखने के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे 1985 में असम समझौते के एक भाग के रूप में संशोधन के माध्यम से पेश किया गया था। बता दें कि धारा 6ए को 1985 में असम समझौते को में जोड़ा गया है।

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सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस सूर्यकांत, एमएम सुंदरेश, जस्टिस जेबी पादरीवाला और मनोज मिश्रा भी शामिल थे। बेंच ने बहुमत से अपना फैसला सुनाया है, हालांकि जस्टिस जेबी पारदीवाला ने फैसले पर असहमति जताई।

नागरिकता अधिनियम की धारा 6A, मुख्य रूप से बांग्लादेश से असम में अवैध अप्रवासियों की आमद को प्रबंधित को लेकर है। इस प्रावधान का उद्देश्य 25 मार्च, 1971 से पहले बांग्लादेश से असम में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों की नागरिकता को नियमित करना है।

1 जनवरी, 1966 और 25 मार्च, 1971 के बीच आने वाले लोगों को दस साल की प्रतीक्षा अवधि के बाद भारतीय नागरिक के रूप में पंजीकरण करने की अनुमति है, जिसके दौरान वे वोट देने के हकदार नहीं हैं।

यह कानून 24 मार्च, 1971 के बाद असम में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों का पता लगाने और उन्हें निर्वासित करने का आदेश देता है। जिसका उद्देश्य प्रदेश की जनसांख्यिकीय संरचना और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करना है।

सर्वोच्च न्यायालय के बहुमत के फैसले ने असम समझौते को एक "राजनीतिक समाधान" के रूप में देखा जा रहा है। इस फैसले का उद्देश्य अवैध प्रवास के लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे को हल करना है, जिसने असम के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है।

न्यायाधीशों ने इस बात पर जोर दिया कि किसी राज्य में विभिन्न जातीय समूहों की मौजूदगी स्वाभाविक रूप से संविधान के अनुच्छेद 29(1) के तहत अधिकारों के उल्लंघन का कारण नहीं बनती है।

पीठ के बहुमत के फैसले के बावजूद न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला ने धारा 6ए की संवैधानिकता के खिलाफ तर्क देते हुए असहमतिपूर्ण निर्णय दिया।

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