सुप्रीम कोर्ट ने 22 साल बाद रद्द की दंपति की शादी, इस विशेषाधिकार का किया इस्तेमाल
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे दंपति की शादी को रद्द करने का आदेश दिया है जो पिछले 22 सालों से अलग-अलग रह रहे थे और उनके बीच लगातार मतभेद बने हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि ये शादी अस्थिर, भावनात्मक रूप से मृत, निस्तारण से परे और अनियमितता से भरी है। जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की।

पीठ ने कहा, 'हमारा विचार है कि प्रतिवादी पत्नी के हितों की रक्षा करते हुए एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता के जरिए उसकी भरपाई के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 में प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल कर शादी को रद्द करने का ये उपयुक्त मामला है।' इस शख्स की तलाक की अर्जी को निचली अदालत और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था, इसके बाद शख्स ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
पति-पत्नी पिछले 22 सालों से अलग-अलग रह रहे थे। साल 1993 में उनकी शादी के कुछ सालों बाद ही उनके रिश्तों में खटास आ गई थी। सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में केंद्र सरकार से कह चुका है कि वह तलाक के कानून में बदलाव करे ताकि अगर संबंधों में इस हद तक खटास हो कि दोबारा साथ रहने की गुंजाइश ना हो, तो ये भी तलाक का आधार हो सके। वहीं, अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि अगर विवाह भावनात्मक तौर पर मृत और बचाव से परे हो तो इसे रद्द किया सकता है।
कोर्ट ने इस मामले में कहा कि ये एक ऐसा केस है जिसमें वैवाहिक रिश्ते जुड़ नहीं सकते हैं। बेंच ने कहा कि आर्थिक रूप से पत्नी के हितों की रक्षा करनी होगी, ताकि उसे दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़े। अदालत ने पति को निर्देश दिया कि वह अलग रही पत्नी को आठ हफ्ते के भीतर बैंक ड्राफ्ट के माध्यम से 20 लाख का गुजारा भत्ता दें।












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