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जम्मू-कश्मीर में लोकसभा-विधानसभा चुनाव साथ होने चाहिए थे?

By Bbc Hindi

17वीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव सात चरणों में होंगे. 11 अप्रैल को पहले चरण के लिए और 19 मई को अंतिम चरण के लिए मतदान होगा. मतों की गिनती 23 मई को होगी.

लोकसभा के साथ ही ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और आंध्र प्रदेश विधानसभा के चुनाव भी होंगे. हालांकि, इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव की तारीख़ों का भी इंतज़ार किया जा रहा था लेकिन चुनाव आयोग ने इसकी घोषणा नहीं की गई.

चुनाव आयोग का कहना है कि हालिया हिंसा की घटनाओं के कारण वहां सुरक्षा की दिक्कत है जिस कारण अभी केवल वहां लोकसभा चुनाव ही कराए जाएंगे.

क्या वास्तव में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने में दिक्कत है? और दोनों चुनाव साथ क्यों नहीं हो सकते?

इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद ने कश्मीर टाइम्स की एग्ज़िक्युटिव एडिटर अनुराधा भसीन से बात की.

कश्मीर
EPA
कश्मीर

आगे पढ़ें अनुराधा भसीन का नज़रिया...

पहले यह देखा जाना ज़रूरी है कि जम्मू-कश्मीर में किस तरह के चुनाव होने जा रहे हैं. लोकतंत्र में चुनावों को पवित्र माना जाता है लेकिन हम हाल में जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव देख चुके हैं.

पंचायत चुनाव एक 'ग़ोस्ट इलेक्शन' था जिसमें लोगों को उम्मीदवारों के नाम तक पता नहीं थे. कुछ इलाक़ों में उम्मीदवार ही नहीं थे और वोटिंग प्रतिशत बहुत कम था.

अगर इसी क़िस्म का चुनाव होना है तो उसकी क्या पवित्रता है? चुनाव नाम की जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, वह मतदाताओं के लिए होती है न कि उम्मीदवारों के लिए.

पंचायत और स्थानीय चुनाव यह कहकर कराए गए कि ज़मीनी राजनीति होनी चाहिए. तो अब विधानसभा चुनावों में कहां समस्या आ गई? वहीं, सुरक्षा कारणों से दक्षिण कश्मीर का लोकसभा उप-चुनाव तीन साल से नहीं हो सका है.

तो यह समझ नहीं आ रहा कि लोकसभा चुनाव कराना और विधानसभा चुनाव न कराना किसकी बेहतरी है? यह मतदाताओं के लिए हो रहा है या केवल संख्या के लिए?

संख्याबल इस समय बहुत महत्वपूर्ण है. अगर सरकार बनाने के लिए संख्या कम पड़ती है तो जम्मू-कश्मीर की छह सीटें ख़ास भूमिका निभा सकती हैं.

कश्मीर चुनाव
Getty Images
कश्मीर चुनाव

साथ चुनाव कराना बेहतर होता

चुनाव आयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कह रहे थे कि विधानसभा चुनाव साथ इसलिए नहीं कराए गए क्योंकि सभी उम्मीदवारों को सुरक्षा मुहैया कराना संभव नहीं था.

पंचायत चुनाव में अगर इतने सारे उम्मीदवारों को सुरक्षा मुहैया कराई जा सकती है तो विधानसभा चुनाव में यह दिक्कत कैसे आ गई? लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने पर खर्चा बचता. संसाधनों का कम इस्तेमाल होता और बार-बार सुरक्षा व्यवस्था नहीं करनी होती.

यह बिलकुल व्यावहारिक नहीं है कि लोकसभा चुनाव अब हो और विधानसभा चुनाव बाद में हो. पुलवामा हमले से पहले राज्यपाल शासन लागू है और राज्यपाल कहते आए हैं कि उन्होंने चरमपंथ का सफ़ाया कर दिया है तो अब सुरक्षा की क्यों समस्या हो रही है.

इससे यह पता लगता है कि जो राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है वह चुनाव कराइये, बाक़ी रहने दीजिए.

राज्य में सरकार बनती है तो वह लोगों का प्रतिनिधित्व करती है. इस समय राज्य में राज्यपाल का शासन चल रहा है और इस दौरान किस तरह से हालात बिगड़े हैं, वह साफ़ दिख रहे हैं.

हाल में केंद्र द्वारा जम्मू-कश्मीर के बहुत से ख़ास क़ानूनों में बदलाव होते देखा गया है अगर यहां राज्य सरकार होती तो ऐसा नहीं हो पाता.

ज़रूरत इस समय इस बात की है कि चुनावी प्रक्रिया के अलावा क़ानून-व्यवस्था ठीक हो, सीमा पर तनाव कम हो, लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारी जाए. इन चीज़ों पर तवज्जो नहीं दी जा रही है.

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English summary
Should the vidhan sabha and lok sabha assembly elections be held in Jammu and Kashmir

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