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क्या अब राहुल गांधी को मान लेना चाहिए कि संसदीय राजनीति में उनका कोई भविष्य नहीं ?

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नई दिल्ली, मई 02: कांग्रेस की उम्मीदों के चिराग राहुल गांधी को क्या यह मान लेना चाहिए कि संसदीय राजनीति में अब उनका कोई भविष्य नहीं ? पश्चिम बंगाल में दूसरे नम्बर की पार्टी रही कांग्रेस का अब सफाया हो गया। केरल से सांसद रहने के बाद भी वे यूडीएफ को सत्ता नहीं दिला सके। पिछले चालीस साल से केरल में एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सत्ता की अदला-बदली होती रही थी। लेकिन एलडीएफ ने दोबारा जीत हासिल कर कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। असम में बहरुद्दीन अजमल से गठजोड़ का भी कांग्रेस को कई फायदा नहीं मिला। पुद्दुचेरी की सत्ता भी कांग्रेस गंवा बैठी। तमिलनाडु में जरूर डीएमके –कांग्रेस गठबंधन को जीत मिली है। लेकिन इसमें राहुल गांधी से अधिक एमके स्टालिन का योगदान है।

राहुल गांधी का अटपटा फैसला

राहुल गांधी का अटपटा फैसला

2016 में कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में 44 सीटें जीती थीं। 2021 के चुनाव में केरल फैक्टर के चलते राहुल गांधी पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार करने नहीं गये। मुश्किल से एक दौरा किया ही था कि कोरोना विस्फोट ने चुनावी रैलियों पर ब्रेक लगा दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि पश्चिम बंगाल से कांग्रेस का तंबू पूरी तरह उखड़ गया। केवल एक सीट पर बढ़त मिलती दिख रही थी। केरल में वाम मोर्चा के खिलाफ लड़ने वाली कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में उससे गठबंधन किया था। केरल में सीपीआइ की धज्जियां उड़ाने वाले राहुल पश्चिम बंगाल में भला उसके लिए कैसे वोट मांग सकते थे। इस विरोधाभास के चलते कांग्रेस न घर की रही न घाट की। केरल तो हाथ से गया ही पश्चिम बंगाल भी चला गया। अटपटों फैसलों के चलते राहुल गांधी की विश्वसनीयता लगातार घटती जा रही है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों की आस में अब्बास सिद्दीकी से चुनावी समझौता किया था। अब्बास सिद्दीकी पर साम्प्रदायिक राजनीति का आरोप लगता रहा है। इसके बावजूद राहुल गांधी ने अब्बास सिद्दीकी से हाथ मिलाया। इसका नतीजा ये हुआ कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस जड़ से उखड़ गयी।

अब क्या केरल में ताजगी महसूस करेंगे राहुल ?

अब क्या केरल में ताजगी महसूस करेंगे राहुल ?

केरल में राहुल गांधी ने खूब हवा बनायी थी। उन्होंने केरल की जनता को भरोस दिलाया था कि अब उनके राज्य से ही वे राजनीति करेंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि उत्तर भारत (अमेठी) की राजनीति में उनका दम घुट रहा था। लेकिन केरल आकर वे ताजगी महसूस कर रहे हैं। वे वायनाड से सांसद होने का औचित्य सिद्ध करना चाहते थे। केरल में मछुआरों संग समुद्र में मछली मार कर उन्होंने खुद को आम आदिमी का नेता सबित करना चाहा था। इतना कुछ करने के बाद भी वे कांग्रेस गठबंधन को सत्ता नहीं दिला सके। राहुल गांधी के दौर में कांग्रेस धीरे-धीरे अपनी राष्ट्रीय पहचान खो रही है। पिछले चालीस साल में किसी गठबंधन ने लगातार दो चुनाव नहीं जीते थे। लेकिन विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ ने यह करिश्मा कर दिया। विजयन पर भ्रष्टाचर के कई आरोप थे। इसके बावजूद वह जीत गये। राहुल गांधी सत्ता विरोधी लहर को अपने पक्ष में नहीं भुना सके। एक नेता के रूप में यह उनकी एक बड़ी नाकामी है।

भाजपा की कमजोरियों का फायदा नहीं उठा पाये राहुल

भाजपा की कमजोरियों का फायदा नहीं उठा पाये राहुल

असम में सीएए का मुद्दा भाजपा के लिए गले की फांस बन गया था। ऊपरी असम के हिंदू वोटर भी सीएए के खिलाफ थे। लेकिन इसके बावजूद भाजपा को दोबारा जीत मिली। कांग्रेस सत्तारुढ़ भाजपा की कमजोरियां का फायदा नहीं उठा सकी। असम में भाजपा को हराने के लिए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने खूब जोर लगाया था। प्रियंका ने चाय बागान की महिला मजदूरों के साथ सिर से टोकरी लटका कर चाय की पत्तियां भी तोड़ी थीं। मुस्लिम वोटों को अपने पाले में करने के लिए राहुल गांधी ने बदरुद्दीन अजममल के साथ चुनावी समझौता तक किया था। लेकिन इतना सब करने के बाद भी वे भाजपा को नहीं रोक पाये। असम में भाजपा की दोबारा जीत कांग्रेस की बहुत बड़ी पराजय है। इससे साबित होता है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी में वह राजनीतिक क्षमता नहीं जो कांग्रेस में जीत का जोश फूंक सके।

राहुल ‘ब्रांड गांधी' के प्रतिनिधि नहीं

राहुल ‘ब्रांड गांधी' के प्रतिनिधि नहीं

राहुल उस ‘गांधी ब्रांड' का प्रतिनिधित्व नहीं करते जो अपने दम पर पार्टी को जीत दिला सके। चुनावी नतीजे बार-बार इस बात को साबित करते रहे हैं। इंदिरा गांधी के बाद एक हद कर राजीव गांधी में यह ब्रांड वैल्यू थी। लेकिन उसके बाद कांग्रेस दूसरे दलों की छतरी के नीचे शरण लेने लेगी। असम में लगातार तीन चुनाव जीतने वाली कांग्रेस ने 2021 में अदरुद्दीन अजमल के सामने एक तरह से समर्पण कर दिया। अजमल ने अपनी शर्तों पर कांग्रेस से समझौता किया था। इसके लिए कांग्रेस को अपनी कई परम्परागत सीटों की कुर्बानी देनी पड़ी। इसी तरह कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में उस वाम मोर्चे को बड़ा भाई बना कर समझौता किया था जो खुद वजूद के लिए जद्दोजहद कर रहा था। गठबंधन की राजनीति से कांग्रेस का लगातार नुकसान हो रहा है। लेकिन भाजपा को रोकने का नाम पर वह यह कड़वा घूंट पीने को भी तैयार है। कांग्रेस का ग्रुप-23 राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर लगातार सवाल उठाता रहा है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद यह हमला और बढ़ेगा।

English summary
Should Rahul Gandhi now accept that he has no future in parliamentary politics
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