Assembly election: मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा के दो बड़े चेहरे, चुनाव मैदान में क्यों पड़ गए अकेले?
पिछले कई विधानसभा चुनावों से राजस्थान में वसुंधरा राजे ही भारतीय जनता पार्टी की मुख्य चेहरा रहती आई हैं। उनका अपना राजनीतिक अंदाज कुछ ऐसा रहा है कि राज्य में पार्टी का रास्ता भी खुद ही तय करती आई हैं। लेकिन, इस बार ऐसा लग रहा है कि बीजेपी के अंदर उन्हें अपनी लड़ाई भी खुद ही लड़नी पड़ रही है।
तथ्य यह है कि राजस्थान में बीजेपी सरकार में दो बार की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा को पार्टी ने चुनावों से जुड़ी कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं दी है। ना ही पार्टी ने उन्हें अभी तक मुख्यमंत्री केचेहरे के तौर पर पेश किया है। ऐसे में वो अपने स्तर पर ही चुनाव अभियान में जुटी हुई हैं। वह रोजाना दो-तीन सभाएं कर रही हैं।

बीजेपी में नहीं दिख रहा वसुंधरा का पहले वाला जलवा
हर दिन कुछ ऐसे कार्यक्रमों में शिरकत करती हैं, जो खासकर उनके समर्थकों की ओर से आयोजित किया जा रहा है। हालांकि, जहां तक बीजेपी की ओर से आयोजित बड़ी सभाओं में शामिल होने की बात है, तो वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में जरूर शामिल हुई हैं। लेकिन, वह प्रोटकॉल वाली औपचारिकता भर ही नजर आई है। बाकी वो अपने स्तर पर सभाएं कर रही हैं, जो कि कोई ऐसा आयोजन नहीं हो रहा, जिसे बीजेपी बड़े स्तर पर करवा रही हो।
जबकि, पिछले कुछ दशकों से वसुंधरा राजस्थान में पार्टी की सबसे बड़ा चेहरा होती थीं। पार्टी के सारे महत्वपूर्ण चुनावी कार्यक्रमों में उनकी सबसे बड़ी भूमिका रहती थी। लेकिन, भाजपा ने सामूहिक नेतृत्व वाली लाइन लेकर उनके उस प्रभावशाली नेतृत्व को फिलहाल के लिए धुंधला कर दिया लगता है।
सामूहिक नेतृत्व वाले फॉर्मूले में उलझा राज्य का सबसे बड़ा चेहरा
भाजपा में दूसरा बड़ा बदलाव मध्य प्रदेश में नजर आ रहा है। राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बीजेपी सरकार के अगुवा होने के नाते स्वभाविक तौर पर नेतृत्व की भूमिका में दिख जाते हैं। लेकिन, पार्टी ने उन्हें चुनावों में अभी तक आधिकारिक तौर पर मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश नहीं किया है। यहां भी सामूहिक नेतृत्व वाला फॉर्मूला लागू किया गया है।
चुनाव जीतने पर भी सीएम पद की नहीं मिल रही गारंटी
शिवराज पहले से भी भावुक हृदय वाले व्यक्ति रहे हैं। लेकिन, पिछले कुछ दिनों से सार्वजनिक सभाओं में वे कुछ ज्यादा ही भावनात्मक होने लगे हैं। एमपी के चार बार के मुख्यमंत्री को शायद अबकी बार पक्का यकीन नहीं है कि चुनाव जीतने पर भी पार्टी उन्हें ही फिर से मुख्यमंत्री बनाएगी। पिछले मंगलवार को उन्होंने अपनी बुधनी विधासभा क्षेत्र में एक कार्यक्रम के दौरान भीड़ से यह भी पूछा है कि उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए या नहीं।
केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को टिकट देकर बढ़ा दी हैं अटकलबाजियां
इससे पहले अपने गृह जिले सीहोर में वे एक सभा के दौरान लोगों से यह तक पूछ चुके हैं कि क्या उनके जाने के बाद लोग उन्हें याद करेंगे? दरअसल, इस बार बीजेपी ने एमपी में अपनी जो उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट जारी की, उसमें तीन केंद्रीय मंत्रियों समेत 7 सांसदों का नाम देकर चुनावों के बाद की संभावनाओं को लेकर कयासबाजियों के लिए मौका छोड़ दिया है।
विजवर्गीय ने कयासबाजियों को दी है हवा
बीजेपी की लिस्ट में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का भी नाम है। उन्होंने इन अटकलों को और भी हवा दे दी है। बुधवार को उन्होंने एक सभा में कह दिया कि पार्टी ने उन्हें सिर्फ एमएलए बनने के लिए नहीं भेजा है, बल्कि उन्हें और भी बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी।
बीजेपी की चुनावी लड़ाई, अपने स्तर पर लड़ रहे शिवराज
विजयवर्गीय ही नहीं, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रह्लाद पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते समेत बाकी अन्य चारों सांसदों के भी समर्थकों को यही लग रहा है कि बीजेपी की जीत के बाद उन्हीं के नेता सीएम बनने वाले हैं। ऐसे में इस चुनावी लड़ाई में सीएम चौहान को अपनी जंग अकेले लड़ना पड़ रहा है। वह रोजाना 2- 3 सभाएं करते हैं और 18 वर्षों में मुख्यमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल की चर्चा करते हैं।
गुरुवार को बुरहानपुर में 'लाडली बहना' योजना से जुड़े एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, 'मैं दिखता भले ही पतला हूं, लेकिन लड़ता हूं मजबूती से...।' अब यह देखने वाली बात होगी कि पार्टी के अंदर के संघर्ष को वह कितनी ताकत से लड़ते हैं।
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