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काम के बदले 'सेक्सुअल फेवर' लेना माना जाएगा रिश्वत, नए कानून में प्राइवेट सेक्टर पर भी लगाम

By Brajesh Mishra
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नई दिल्ली। संसदीय समिति की ओर से पेश किए गए बिल में काम के बदले सेक्सुअल फेवर की मांग को भी रिश्वत की कैटेगरी में रखने का प्रस्ताव रखा गया है। लॉ कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर राज्यसभा की सेलेक्ट कमेटी ने एंटी करप्शन के नए बिल पर यह सिफारिशें की हैं। पहली बार प्राइवेट सेक्टर को भी इसके दायरे में लिया गया है।

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दरअसल, केंद्र सरकार करप्शन मिटाने को लेकर बीते लंबे समय से नया कानून लाने और इसका दायरा बढ़ाने पर विचार कर रही थी। अब तक करप्शन के मामले एंटी करप्शन लॉ-1988 के तहत सुने जाते थे। अब सरकार ने करप्शन लॉ में बदलाव का फैसला लिया है। इसके पहले सरकार ने 'एंटी करप्शन अमेंडमेंट बिल 2013' को संसद में पेश करने का फैसला लिया था, जो अब तक अधर में है। इसमें रिश्वत से जुड़े अपराधों के लिए 'आर्थिक या अन्य फायदे' शब्द का इस्तेमाल किया गया था।

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लॉ कमीशन के सुझाव पर जोड़े गए शब्द

बीते साल नवंबर में लॉ कमीशन ने केंद्र सरकार को दिए गए सुझाव में कहा था कि 'आर्थिक या अन्य फायदे' की जगह अनुचित लाभ (Undue Advantage) को जोड़ दिया जाए। क्योंकि पिछले नियम में 'अन्य फायदों' का दायरा निर्धारित नहीं था। संसदीय समिति ने इन सिफारिशों को काफी हद तक सही माना और बिल में जोड़ दिया।

रिश्वत देने वाले को भी मिलेगी सजा

नए बिल के मुताबिक, काम के बदले निर्धारित रिम्यूनरेशन के अलावा किसी भी तरह के फायदे लेना अपराध होगा। यह बिल अगले सत्र में राज्यसभा में पेश किया जा सकता है। इसके तहत, अगर कोई कर्मचारी करप्शन के आरोप में दोषी पाया जाता है तो सात साल की जेल और जुर्माना हो सकता है। साथ ही रिश्वत देने वाले को भी सजा दी जाएगी।

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प्राइवेट सेक्टर भी दायरे में

मौजूदा कानून के दायरे में प्राइवेट कंपनियां नहीं आती हैं। सिर्फ सरकारी कर्मचारियों पर ही कानून लागू है, लेकिन नए कानून के तहत यदि किसी प्राइवेट कंपनी का कर्मचारी किसी सरकारी कर्मचारी को रिश्वत देता है तो इसके लिए कंपनी को भी जिम्मेदार माना जाएगा।

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English summary
Sexual favour will be considered as bribe recommended Parliamentary Committee in a new bill. Select Committee of Rajya Sabha has relied on the Law Commission’s report and recommended inclusion of undue advantage in a relevant provision.
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