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समलैंगिकता पर फैसले के बाद पुलिस के सामने चुनौती, पुरुषों को कैसे मानेंगे बलात्कार पीड़ित

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    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। सेक्शन 377 पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समलैंगिकों के अधिकार भी दूसरे नागरिकों जैसे ही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं, पशुओं और बच्चों के साथ अप्राकृतिक यौन क्रिया से संबंधित सेक्शन 377 का हिस्सा पहले जैसा ही लागू रहेगा। वहीं, इस फैसले के बाद पुलिस विभाग में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही है। कुछ अधिकारियों ने इसको लेकर कानूनी जटितलाओं का भी हवाला दिया है।

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    'LGBTQI समुदाय के लोगों का शोषण रुकेगा'

    'LGBTQI समुदाय के लोगों का शोषण रुकेगा'

    कुछ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद सहमति से गे सेक्‍स को वैध करार दिए जाने से LGBTQI समुदाय के लोगों का शोषण रुकेगा। एक पुलिस अधिकारी ने इस मुद्दे पर बात करते हुए कहा कि कई बार LGBTQI के लोगों को हिंसा, ब्‍लैकमेल या फिर धमकी का शिकार होना पड़ता है। जबकि समलैंगिक पुरुष बलात्‍कार व अन्‍य अपराधों की बात बताने से कतराते हैं और उनको डर लगा रहता है कि कहीं उनके खिलाफ ही केस न चलने लगे, इसको लेकर उनको मानसिक दवाब से गुजरना पड़ता है।

    'यौन संबंध सहमति ये बने थे या जबरन?'

    'यौन संबंध सहमति ये बने थे या जबरन?'

    वहीं, कुछ अन्य पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में पुलिस को अब सहमति का सिद्धांत स्थापित करना होगा क्योंकि समलैंगिक रिश्तों में कानूनी एजेंसियों को इसके उदाहरण देखने होंगे। एक अधिकारी ने बताया कि इस फैसले की व्याख्या से पुलिस के काम करने के तरीके में बदलाव भी आ सकता है। वो उदाहरण देते हैं कि एक छात्र ने अपने सीनियर्स के खिलाफ जबरन अप्राकृतिक सेक्स की शिकायत की, जिसके बाद उसे एड्स हो गया। अब ऐसे केस में पुलिस को यह पता करने में मुश्किलें आती हैं कि यौन संबंध सहमति ये बने थे या जबरन।

    सहमति का सवाल पुलिस को परेशान कर रहा?

    सहमति का सवाल पुलिस को परेशान कर रहा?

    एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक, इस मामले में गाइडलाइंस की जरूरत है। उनका मानना है कि अगर समलैंगिक व्यक्ति सहमति से इनकार कर देता है और अपने पार्टनर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराता तो इस स्थिति में पुलिस क्या करेगी? यौन अपराधों का भारतीय कानून पुरुषों को बलात्कार पीड़ित नहीं मानता है।

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    English summary
    section 377: after supreme court's judgement police face the unfamiliar, victim men and consent

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