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Section 377: समलैंगिकता पर अब तक क्या-क्या हुआ, देखिए पूरी TimeLine

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नई दिल्ली। समलैंगिकता अब अपराध नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है। देश में सभी को समानता का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने फैसले में कहा कि देश में सबको सम्मान से जीने का अधिकारी है। समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है। पुरानी धारणाओं को छोड़ना होगा। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व में पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाया है। आइए जानते हैं इस मामले में कब-कब क्या हुआ है...

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2001 में नाज फाउंडेशन ने दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की जनहित याचिका

2001 में नाज फाउंडेशन ने दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की जनहित याचिका

- साल 2001 में सबसे पहले समलैंगिक लोगों के लिए आवाज उठाने वाली संस्था नाज फाउंडेशन की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई।

- 2003 में दिल्ली हाईकोर्ट ने नाज फाउंडेशन की याचिका को खारिज कर दिया।

- इसके बाद सितंबर, 2004 में नाज फाउंडेशन की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में रिव्यू पिटिशन दाखिल की।

- 3 नवंबर, 2004 को हाईकोर्ट ने रिव्यू पिटिशन भी खारिज कर दी।

2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से हटाया

2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से हटाया

- दिसंबर, 2004 में याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

- अप्रैल, 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से इस मामले को दोबारा सुनने के लिए कहा।

- इस मामले में सुनवाई के दौरान सितंबर, 2008 में केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट से अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा।

- 7 नवंबर, 2008 को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर फैसला सुरक्षित रखा।

- जुलाई, 2009 को दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए समलैंगिकता को अपराध के दायरे से हटाया।

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे दोबारा अपराध करार दिया

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे दोबारा अपराध करार दिया

- 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

- 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे दोबारा अपराध करार दिया।

- 2014 में सर्वोच्च कोर्ट ने इस संबंध में दायर रिव्यू पिटिशन भी खारिज कर दी।

2016 में पांच याचिकाकर्ताओं ने SC में दायर की याचिका

2016 में पांच याचिकाकर्ताओं ने SC में दायर की याचिका

- 2016 में पांच याचिकाकर्ताओं एस जौहर, पत्रकार सुनील मेहरा, सेफ रितु डालमिया, होटल कारोबारी अमन नाथ और आयशा कपूर ने धारा 377 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की।

- 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने सेक्सुअलिटी को निजता का अधिकार माना। कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति का सेक्स के प्रति झुकाव उसके राइट टू प्राइवेसी का मूलभूत अंग है।

- 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भेजकर जवाब मांगा।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में जनमत संग्रह से किया इंकार

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में जनमत संग्रह से किया इंकार

इस मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जनमत संग्रह से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इस मुद्दे पर जनमत संग्रह की बात करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा है कि वह बहुसंख्यक नैतिकता की जगह संवैधानिक नैतिकता को तरजीह देगी और आईपीसी के सेक्शन-377 को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के आधार पर देखेगी। अक्तूबर, 2017 तक दुनिया के 25 देशों में समलैंगिकों के बीच यौन संबंध को कानूनी मान्यता मिल चुकी है। इन देशों में अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देश शामिल हैं।

इसे भी पढ़ें:- "मैं जैसा हूं वैसा ही स्वीकार करें", धारा 377 पर फैसला देते हुए बोले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा

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English summary
Section 377 Comlete Timeline of Events Supreme Court, all you need to know.
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