लालकिला हमला: गोलाबारी कांड के आरोपी व लश्‍कर आतंकी मोहम्‍मद आरिफ की फांसी पर 16 मई तक रोक

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नई दिल्‍ली। वर्ष 2000 में लाल किले पर हमला करने वाले आरोपी मोहम्‍मद आरिफ के फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने अगले 16 मई तक रोक लगा दी है। आरिफ पाकिस्‍तान का रहने वाला है।

गौरतलब है कि अगस्त 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने लाल किले पर हुए हमले के मामले में मोहम्मद आरिफ की फांसी की सजा बरकरार रखी थी। मोहम्मद आरिफ लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हुआ आतंकी है। लाल किले पर 22 दिसंबर 2000 की रात हुए हमले में लश्कर के छह आतंकी शामिल थे। जिन्होंने लालकिले के अंदर घुस कर अंधाधुंध फायरिंग की थी। इस हमले में राजपूताना रायफल्स के दो जवान और एक अन्य की मौत हो गई थी।

हमले के ठीक बाद दिल्ली पुलिस ने जामिया नगर में हुए मुठभेड़ में मोहम्मद आरिफ ऊर्फ अशफाक और उसकी पत्नी रहमाना यूसुफ फारूकी को गिरफ्तार किया था। 31 अक्तूबर 2005 को निचली अदालत ने मोहम्मद आरिफ को मौत की सजा सुनाई थी और उसकी पत्नी को सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।

आरिफ के दो और सहयोगी नजीर अहम कासिब और फारूक अहमद कासिब को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। निचली अदालत ने तीन और अभियुक्तों को सात साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी और चार को रिहा कर दिया था। इसके बाद आरोपियों ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने 13 सितंबर 2007 को आरिफ की सजा बरकरार रखी थी और छह अन्य को बरी कर दिया था।

चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली बेंच ने इसके साथ ही आरिफ की याचिका पर केंद्र को नोटिस भी जारी किया। आरिफ ने अपनी याचिका में इस आधार पर अपनी रिहाई का निर्देश दिए जाने का आग्रह किया था कि वह पहले ही 13 साल से ज्यादा समय जेल में गुजार चुका है और इतनी लंबी अवधि के बाद उसे फांसी नहीं दी जानी चाहिए। उसने कहा कि उसकी मौत की सजा पर अमल का मतलब उसे अपराध के लिए दो बार सजा देने के समान होगा क्योंकि वह 13 साल से अधिक वक्त जेल में काट चुका है, जो करीब उम्रकैद की सजा के बराबर है।

वकील त्रिपुरारी रे ने कहा कि आरिफ ने जेल में 13 साल चार महीने का वक्त बिताया है और इसके बावजूद उसे मृत्युदंड देना संविधान का उल्लंघन होगा। रे ने अदालत से यह भी कहा कि आरिफ ने दया याचिका दाखिल नहीं की है। आरिफ को 25 दिसंबर 2000 को गिरफ्तार किया गया था। उसे निचली अदालत ने 24 अक्टूबर 2005 को दोषी करार दिया था और 31 अक्टूबर 2005 को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने 13 सितंबर 2007 को उसकी मृत्युदंड पर मुहर लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने 10 अगस्त, 2011 को उसकी याचिका और 28 अगस्त 2011 को पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया था।

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