कर्नाटक के बीजापुर में बोरवेल में फंसी बच्ची की जान

पुलिस के अनुसार, बच्ची खेलने के दौरान अपने घर के पास खुदे बोलवेल में गिर पड़ी। घटना के वक्त उसके माता पिता दोनों ही अपने कार्यों में लगे हुए थे। हालांकि, बच्ची को बचाने के लिए राहत कार्य अभी भी जारी है।
बच्चों के बोरवेल में गिरने की घटनाएं रोजमर्रा की खबरों में देखने को मिल जा रहीं है। लेकिन प्रशासन अभी भी इस विषय पर सुस्त रवैया अपनाए बैठी है। साल 2006 हरियाणा के कुरुक्षेत्र में प्रिंस नाम के पांच वर्षीय बच्चे के बोरवेल में गिरने की घटना ने खूब सूर्खियां बटोरी थीं।
सेना द्वारा किए गए जबरदस्त राहत कार्य ने प्रिंस की जान भी बचा ली थी। जिसकी मीडिया द्वारा जबरदस्त कवरेज की गई थी। लेकिन इसके बाद इस तरह घटनाओं की तादाद बढ़ती नजर आयी। साल 2012 में हरियाणा के ही मनेसर में एक पांच वर्षीय बच्ची के बोरवेल में गिर जाने से मौत हो गई थी। वहीं, पिछले साल तमिलना़डू के भी एक गांव में तमाम राहत कार्य के बाद भी 400 फीट गहरे बोरवेल में गिरी बच्ची की जान को नहीं बचाया जा सका।
बोरवेल में गिरने की घटनाओं को देखते हुए 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने बोरवेल से जुड़े दिशा-निर्देशों में संशोधन करते हुए कई नई बातों को जोड़ा।
इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट का कानून क्या कहता है-
1. बोरवेल खोदे जाने के कम से कम 15 दिनों से पहले, इस जमीन के मालिक को उस इलाके के अधिकारी को लिखित में इसकी सूचना देनी है।
2. हर सरकारी अथवा गैर-सरकारी ड्रिलिंग एजेंसी के लिए जिला प्राधिकारी के पास पंजीकरण कराना अतिआवश्यक है।
3. बोरवोल निर्माण से समय वहां पर साइन बोर्ड लगाना अनिवार्य है। जिसमें एजेंसी का नाम और पूरा पता होना चाहिए।
4. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया गया है कि बोरवेल का काम खत्म होने के बाद वहां की जमीन को वापस समतल करना अनिवार्य है।
5. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जिला कलक्टरों को भी अतिरिक्त जिम्मेदारी देते हुए सारे निर्देशों पर नजर रखने सलाह दी है।












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