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संदेशखाली की घटना से TMC को कितना नुकसान होगा?

Sandeshkhali incident in Hindi: पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिला का संदेशखाली इस समय देशभर की मीडिया की सुर्खियों में है। यहां की दलित और आदिवासी महिलाओं ने स्थानीय सत्ताधारी बाहुबली नेताओं पर जो आरोप लगाए हैं, वह किसी भी सभ्य समाज की व्यक्ति की जमीर को हिला सकता है।

तथ्य ये है कि यहां पीड़ित और और उनका हर तरह से उत्पीड़न करने वाले दोनों ही तरफ के लोग सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस समर्थक और नेता-कार्यकर्ता बताए जा रहे हैं।

sandeshkhali and tmc

संदेशखाली का काला सच!
राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और प्रदेश के राज्यपाल तक की रिपोर्ट के मुताबिक यहां टीएमसी का एक दबंग नेता और उसके लोगों ने न सिर्फ गरीबों की जमीनों पर अवैध कब्जा कर रखा है, बल्कि उनकी महिलाओं का लंबे वक्त से यौन-उत्पीड़न करते रहे हैं।

संदेशखाली का सरगना शाहजहां शेख अबतक फरार
टीएमसी का बाहुबली स्थानीय नेता और अबतक यहां हुए तमाम कुकर्मों का मास्टरमाइंड बताया जा रहा शाहजहां शेख ईडी अधिकारियों पर भी हमले का आरोपी भी है और करीब डेढ़ महीने से फरार है।

भारी बवाल और दबाव के साथ स्थानीय महिलाओं के विद्रोही तेवर के बाद सिर्फ उसके दो गुर्गों शिबू हाजरा और उत्तम सरदार की ही गिरफ्तारी हो पाई है।

30 फीसदी मुस्लिम आबादी टीएमसी की कमजोरी?
तथ्य यह है कि बंगाल की महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी अभी तक शाहजहां शेख को टीएमसी से निलंबित तक नहीं कर पाई है। इसी से एक अनुमान लगाया जा सकता है कि इस मुस्लिम बाहुबली का इलाके में क्या प्रभाव है और उसके खिलाफ कार्रवाई करने में स्थानीय प्रशासन क्यों हिचकिचाता रहा है। आरोपों के मुताबिक तो उसे प्रशासन का सक्रिय सहयोग ही मिलता रहा है!

संदेशखाली बंगाल के बशीरहाट लोकसभा क्षेत्र में है, जहां से 2019 में टीएमसी के टिकट पर बंगाली फिल्मों की अभिनेत्री नुसरत जहां ने जीत दर्ज की थी। एक टीएमसी नेता के मुताबिक 2011 की जनगणना के मुताबिक इलाके में 30% मुस्लिम आबादी है और यही सत्ताधारी दल की सियासी 'कमजोरी' बन चुकी है।

चुनावी वर्ष में टीएमसी के लिए खतरे की घंटी
लेकिन, संदेशखाली की गरीब दलित और आदिवासी महिलाओं ने इस बार जिस तरह से बाहुबली शाहजहां शेख के खिलाफ मोर्चा खोला है और उसकी सीधे फांसी तक की मांग होने लगी है, वह चुनावी वर्ष में टीएमसी के लिए खतरे की घंटी है। क्योंकि, कई टीवी चैनलों पर स्थानीय पीड़ित महिलाओं ने खुद को टीएमसी समर्थक ही बताया है।

बीजेपी-आरएसएस पर क्यों भड़क रही हैं ममता?
अब जरा 15 फरवरी को बंगाल के सीएम ममता बनर्जी के विधानसभा में दिए गए बयान पर गौर फरमाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा था, 'यह जानकारी सामने आई है कि किस तरह से बीजेपी कार्यकर्ता लाए गए और कैसे इलाके (संदेशखाली) में हिंसा भड़काई गई। पहला टारगेट शेख शाहजहां (सरगना) था और ईटी उन्हें टारगेट करते हुए इलाके में घुसी। फिर उन्होंने वहां से सबको भगा दिया और आदिवासी बनाम अल्पसंख्यकों की लड़ाई बना दी।'

चुनावी नजरिए से ममता की चिंता वाजिब है। क्योंकि, इलाके में मुस्लिम आबादी के बराबर ही 30% दलित भी हैं और आदिवासियों की जनसंख्या 26% है। टीएमसी को डर है कि अगर बीजेपी यहां उसके स्थानीय नेतृत्व के खिलाफ ध्रुवीकरण में सफल हो गई तो फिर किस्सा खत्म ही समझे!

टीएमसी के नेता भी मान रहे हैं गलती!
टीएमसी के संस्थापक नेताओं में शामिल और बशीरहाट में पार्टी बढ़ाने वाले एक वरिष्ठ पार्टी नेता के मुताबिक, 'सीएम ने जो कहा वह सच है, लेकिन उन्होंने जो नहीं कहा वो ये है कि संदेशखाली के मौजूदा हालात यहां की हमारी रणनीति का परिणाम है। सिर्फ संदेशखाली ही नहीं, बल्कि आसपास के इलाकों में भी बाहुबली अल्पसंख्यक समुदाय का है।'

उनके मुताबिक, 'इस वजह से आरएसएस को वहां अपनी मौजूदगी बढ़ाने की मौका मिला है। पिछले कुछ वर्षों में बहुसंख्यक समाज के टीएमसी नेताओं से भी उन्हें मदद मिली है।'

2019 में बशीरहाट में क्या हुआ था?
अगर 2019 के लोकसभा चुनाव का परिणाम देखें तो बशीरहाट में टीएमसी की नुसरत जहां को 54.55% वोट मिले थे और बीजेपी को 30.11% मत हासिल हुए थे। वहीं कांग्रेस को 7.27% और सीपीआई को 4.76% वोट मिले थे।

ऐसे में जिस ढंग से इलाके की 56% आबादी में टीएमसी के खिलाफ नाराजगी भड़की है, वह पूरे प्रदेश में जंगल की आग की तरह फैल सकती है और ममता के रणनीतिकारों की चिंता भी यही है।

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