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सबरीमलाः घर से निकाले जाने के बाद कनकदुर्गा के पास अब क्या हैं विकल्प?

By Bbc Hindi

कनकदुर्गा
AFP/Getty Images
कनकदुर्गा

सबरीमला मंदिर में प्रवेश कर इतिहास रचने वाली कनकदुर्गा को उनके पति ने घर से निकाल दिया है और अधिकार पाने के लिए अब न्याय का रास्ता ही उनके लिए एकमात्र विकल्प है.

क़ानून के जानकार बताते हैं कि ऐसे मामलों में देश की महिलाओं के लिए "स्पष्ट क़ानून" है.

बुधवार को कनकदुर्गा का केस कोर्ट में पेश नहीं हो सका क्योंकि मजिस्ट्रेट तीन दिनों की छुट्टी पर हैं. फ़िलहाल उनके पास वन-स्टॉप शेल्टर में रहने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.

वन-स्टॉप शेल्टर में सरकार उन महिलाओं को रहने की सुविधा प्रदान करती है, जो किसी विपरीत परिस्थितियों में फंसी होती हैं.

कनकदुर्गा के पति ने पुलिस के सामने यह कहा था कि वो नहीं चाहते हैं कि कनकदुर्गा अब उनके घर मे रहें.

केरल और कर्नाटक हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों का मानना है कि कनक दुर्गा का केस "पूरी तरह घरेलू हिंसा" से जुड़ा मामला है.

कोच्चि के ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क से जुड़े प्रीत केके कहते हैं, "भले ही इसका कारण सबरीमला में प्रवेश हो, यह मामला पूरी तरह मानसिक उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से जुड़ा है और उसे घरेलू हिंसा की रोकथाम अधिनियम के तहत ही देखा जाएगा."

कर्नाटक हाई कोर्ट की वकील गीता देवी ने बीबीसी से कहा, "ऐसी स्थिति में क़ानून पति को घर छोड़ने की अनुमति और पत्नी को घर पर रहने इजाज़त देता है."

कनकदुर्गा
Reuters
कनकदुर्गा

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद किया था प्रवेश

कनकदुर्गा (39) और बिंदु अम्मिनी (40) ने दो जनवरी को लंबी यात्रा करने के बाद सबरीमला मंदिर में प्रवेश किया. इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के बीते साल उस आदेश का पालन भी किया जिसके अनुसार 10 से 50 साल की सभी महिलाओं को मंदिर में प्रार्थना करने की अनुमति है.

मंदिर के परिसर में प्रवेश करने के लिए इन दोनों महिलाओं ने उन सभी रीति-रिवाजों का पालन किया जो मंदिर की 18 सीढ़ियां चढ़ने से पहले भक्तों के लिए ज़रूरी होते हैं. इससे पहले भी इन्होंने मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की थी लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली थी. इस बार उनके साथ सादे लिबास में महिला पुलिस अधिकारी भी थीं.

24 दिसंबर को पुलिस की भारी मौजूदगी में भी कनकदुर्गा और बिंदु ने मंदिर में जाने की कोशिश की थी. उस वक़्त भाजपा के साथ जुड़े संगठन सबरीमला कर्मा समिति के सदस्यों ने पुलिस का विरोध किया था.

ये समिति बीते साल के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का विरोध कर रही है क्योंकि इसका मानना है कि मासिक धर्म होने वाली उम्र की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश हर हाल में रोका जाना चाहिए क्योंकि ये परंपरा के विरुद्ध है.

28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने 4-1 के बहुमत से परंपरा के ऊपर महिला के अधिकारों को तरजीह दी थी.

सबरीमला मंदिर
EPA
सबरीमला मंदिर

घरेलू हिंसा की शिकार

सोमवार शाम कनकदुर्गा अस्पताल से छूटीं थीं. इससे पहले उनकी अपनी सास के साथ इस मुद्दे पर झड़प हो गई थी कि उन्होंने स्वामी अयप्पा के मंदिर में प्रार्थना कर प्राचीन परंपरा तोड़ी है.

इस झड़प में कनकदुर्गा को सिर पर चोट आ गई थी जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

जब कनकदुर्गा अस्पताल में थीं तभी उन्हें पता चला था कि उनके ससुराल वाले नहीं चाहते कि वो वापस घर आएं. इस कारण अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद पहले वो पुलिस थाने पहुंची थीं.

कनकदुर्गा के पति कृष्णन उन्नी ने उन्हें घर ले जाने से मना कर दिया था, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें एक सरकारी शेल्टर होम में भेज दिया था.

कनकदुर्गा के जुड़वा लड़के हैं.

सबरीमला मंदिर
BBC
सबरीमला मंदिर

केरल हाई कोर्ट के वकील संध्या राजू के मुताबिक़ "क़ानून के हिसाब से कनकदुर्गा अपने घर पर रह सकती हैं और मजिस्ट्रेट यह फ़ैसला सुना सकता है."

गीता देवी कहती हैं, "क़ानून बहुत ही स्पष्ट है. उन्हें अपने पति के घर में रहने का अधिकार है. वो बेघर नहीं हो सकती हैं. क़ानून उनको यह इजाज़त देता है."

वो बताती हैं कि क़ानून के मुताबिक़ यह पति का कर्तव्य है कि वो अपनी इच्छा से दूसरी पत्नी या महिला साथी के साथ रहने की स्थिति में अपनी पहली पत्नी को रहने के लिए घर दे.

"घरेलू हिंसा क़ानून के सेक्शन 19 के मुताबिक़ महिला को अपने पति के घर में दोबारा आश्रय लेने का अधिकार है. मजिस्ट्रेट उनके पति को घर छोड़ने को भी कह सकता है और पत्नी घर में रह सकती है."

जब तक सुनवाई नहीं होती, कनकदुर्गा को तब तक सरकारी शेल्टर होम में ही रहना पड़ेगा.

BBC Hindi
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English summary
Sabarimala What is the choice now next to Kanakdurga after being removed from the house
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