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राम विलास पासवान को मनाया गया या फिर हवाओं को भांप रहे हैं 'मौसम वैज्ञानिक'

By Bbc Hindi
रामविलास पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी
Getty Images
रामविलास पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी

तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव हारने के साथ ही बीजेपी के सहयोगियों ने भी उससे दूरी बनानी शुरू कर दी.

पहले राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से अलग हुए और अब लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख रामविलास पासवान ने भी नाराज़गी जाहिर की है.

रामविलास पासवान ने लोकसभा में सीटों के बंटवारे को लेकर आपत्ति जताते हुए कहा था कि बीजेपी को अपने सहयोगियों का ध्यान रखना चाहिए.

इसके बाद से ही बीजेपी की चिंताएं बढ़ गईं और दोनों पक्षों में बातचीत और मोल-भाव का सिलसिला शुरू हो गया. बीजेपी पहले ही बैकफुट पर आ चुकी है और कुछ बड़े नेता पासवान से मुलाकात कर चुके हैं. संभावना है कि उनकी शिकायतें दूर कर दी जाएं.

लेकिन, इस पूरे मामले में बड़ी बात ये है कि रामविलास ​पासवान एक ऐसा नेता हैं जो हमेशा सरकार में बने रहे हैं. वह पहले भी मौजूदा गठबंधन से अलग होकर दूसरे गठबंधन का हिस्सा बनते रहे हैं.

राजनीति में पासवान को उनके विरोधी 'मौसम वैज्ञानिक' की संज्ञा देते हैं. यानि एक ऐसा व्यक्ति जो ये पहले ही भांप लेता है कि कौन सा दल जीतने वाला है और फिर उसके साथ ही हो जाता है.

हर गठबंधन में शामिल

पासवान का राजनीतिक ​इतिहास उठाकर देखें तो वो पांच प्रधानमंत्रियों के साथ और लगभग हर सरकार में रह चुके हैं. वह 1996 से 2015 तक सभी राष्ट्रीय गठबंधनों यूनाइटेड फ्रंट, एनडीए और यूपीए में शामिल रहे हैं.

रामविलास पासवान जनता पार्टी से 1977 में पहली बार बिहार में हाजीपुर सीट से सांसद बने थे. वह 9वीं लोकसभा में फिर से सांसद चुने गए और जनता दल के नेतृत्व में वीपी सिंह की सरकार में श्रमिक एवं कल्याण मंत्री बने.

लेकिन, जनता दल की सरकार ज़्यादा समय तक नहीं रह सकी. लगभग एक साल बाद पूर्व प्रधानमंत्री चंद्र शेखर ने जनता दल से अलग होकर समाजवादी जनता पार्टी बनाई और फिर कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना ली.

ये सरकार अपना एक साल भी पूरा नहीं कर सकी और कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया. इसके बाद फिर से आम चुनाव हुए और कांग्रेस सत्ता में आई. इस दौरान पासवान केंद्र की सत्ता से दूर रहे.

1996 में 11वीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए और बीजेपी की सरकार बनी. लेकिन आवश्यक समर्थन न मिलने के कारण वो सरकार 13 दिन ही चल सकी.

रामविलास पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी, बीजेपी
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रामविलास पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी, बीजेपी

जब बने रेल मंत्री

इसके बाद जनता दल फिर से सत्ता में आई और एचडी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बनें. इस बार पासवान को रेल मंत्री के तौर पर एक बड़े मंत्रालय की ज़िम्मेदारी मिली.

लेकिन, सियासत के बदलते मिजाज को भांपते हुए पासवान साल 1999 में एनडीए में शामिल हो गए. चुनाव में एनडीए की भारी जीत हुई और वो वाजपेयी की सरकार में पहले संचार मंत्री और फिर बाद में कोयला मंत्री बने.

साल 2000 में पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी की नींव रखी. लोजपा ने 2005 के बिहार विधानसभा चुनावों में क़दम रखा और 10 सीटें जीतीं.

वहीं, बीजेपी के साथ उनकी जुगलबंदी हमेशा के लिए नहीं चल पाई. 1999 से 2004 तक वो बीजेपी में रहे लेकिन अगले आम चुनावों में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया.

ये वो समय था जब दो साल पहले गुजरात दंगे हुए थे और बीजेपी सांप्रदायिक राजनीति के लिए आलोचनाओं का सामना कर रही थी. उस वक्त बीजेपी ने लोकसभा चुनावों में शाइनिंग इंडिया का नारा दिया था.

लेकिन, 2004 के चुनावों में बीजेपी के शाइनिंग इंडिया का क्या अंजाम होने वाला है इसे शायद पासवान पहले ही भांप गए थे.

चुनाव से ठीक पहले पासवान ने गुजरात दंगे के नाम पर एनडीए का साथ छोड़ दिया और वो फिर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) में शामिल हो गए. इसके बाद वह 2004 से 2009 तक यूपीए सरकार में मंत्री पद पर शामिल रहे.

इस दौरान उन्होंने रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय संभाला. लेकिन, यूपीए में भी उनका साथ लंबा नहीं चला.

चौथा फ्रंट पड़ा भारी

2009 के आम चुनावों में वो यूपीए से अलग हो गए. वह कांग्रेस का साथ छोड़कर लालू यादव के साथ चले गए. इन चुनावों में लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल, मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और लोजपा ने मिलकर चौथा फ्रंट बनाया.

लेकिन, इस बार पासवान का सियासी दांव कुछ ग़लत साबित हुआ. इन चुनावों में वो अपनी हाजीपुर की सीट भी नहीं बचा सके. उनकी पार्टी को एक भी सीट न मिल सकी. इसके बाद वह पूरे पांच साल तक सत्ता सुख से वंचित रहे.

इसके बाद बिहार में उनकी स्थिति और बिगड़ती चली गई. साल 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में भी उनकी पार्टी 10 से तीन सीटों पर ही सिमट ​गई.

इस दौरान बिहार में नीतीश कुमार के बढ़ते प्रभाव से रामविलास पासवान को नुकसान हुआ. नीतिश कुमार ने दलितों में भी महादलितों की राजनीति की जिससे पासवान की दलित राजनीति का वोटबैंक कमजोर हो गया.

उनकी कमजोर होती स्थिति ने पासवान को नए सहयोगियों की तलाश के लिए अग्रसर किया.

रामविलास पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी, बीजेपी
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रामविलास पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी, बीजेपी

फिर पहुंच गए एनडीए

आगे चलकर उन्हें ये मौका नीतीश कुमार के ज़रिए मिला. वो मौका था साल 2014 के आम चुनाव. जब 10 साल से सत्ता में मौजूद कांग्रेस का चुनावी भविष्य बिगड़ता नज़र आ रहा था.

2जी स्पैक्ट्रम से लेकर कोयला घोटाले के चलते कांग्रेस की छवि ख़राब हो गई थी. आतंकी हमलों के कारण देश की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होने लगे थे. वहीं, मनमोहर सिंह के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे थे और राहुल गांधी ने भी राजनीति में शुरुआती क़दम रखे थे. इसलिए कांग्रेस नेतृत्व के संकट से भी जूझ रही थी.

इसी समय नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने को लेकर जदयू बीजेपी से अलग हो गई और बीजेपी के पास बिहार में कोई गठबंधन नहीं रहा.

रामविलास पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी, बीजेपी
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रामविलास पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी, बीजेपी

बीजेपी को भी गठबंधन की दरकार थी और राम विलास पासवान भी सत्ता से दूर थे. वहीं, कांग्रेस के हालातों को देखते हुए पासवान ने अपना चुनावी आकलन कर लिया. इस तरह स्थितियों ने बीजेपी और लोजपा को मिलाया और गुजरात दंगों के चलते एनडीए से अलग हुए पासवान फिर से एनडीए में शामिल हो गए.

वर्तमान समय की बात करें तो कांग्रेस सत्ता में आने के लिए संघर्ष कर रही है. विपक्ष एकता दिखा रहा है और बीजेपी का सामना करने के लिए एक महागठबंधन बनाने की तैयारी है.

ऐसे में पासवान का बीजेपी से नाराज़गी दिखाना फिर से हवाओं का बदलता रुख देखने जैसा प्रतीत हो रहा है.

BBC Hindi
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English summary
Ram Vilas Paswan was celebrated or wasting the winds weather scientist
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