Rajasthan Political Crisis:गहलोत बनाम पायलट जंग के ये होंगे 5 संभावित अंजाम

नई दिल्ली- सोशल मीडिया पर मजाक चल रहा है कि होली में मध्य प्रदेश भाजपा के झोली में आ गया, रक्षा बंधन में राजस्थान में भगवा लहराने लगेगा और दिवाली आते-आते महाराष्ट्र में भी उसकी वापसी हो जाएगी। क्योंकि, राजस्थान की स्थिति ये बन चुकी है कि सचिन पायलट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ जितने आगे निकल चुके हैं, उनका वापस लौटना लगभग मुश्किल है। क्योंकि, ऐसा करना उनका अपने ही हाथों अपने सियासी करियर का गला घोंटना साबित हो सकता है। ऐसे में मौजूदा परिस्थितियों में राजस्थान की राजनीति किस करवट बैठेगी, उसकी फिलहाल 5 संभावनाएं नजर आ रही हैं।

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    Rajasthan Political Crisis: Rahul Gandhi, Priyanka Gandhi समेत 5 नेताओं की एंट्री | वनइंडिया हिंदी
    गहलोत सरकार गिर सकती है

    गहलोत सरकार गिर सकती है

    राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की बगावत का एक परिणाम तो ये हो सकता है कि लगभग 19 महीने पुरानी अशोक गलतोत सरकार गिर जाए। ये तभी हो सकता है, जब पायलट के दावे के मुताबिक कांग्रेस के 30 विधायक पाला बदल लें और वे अपने साथ कुछ निर्दलीय विधायकों को भी एकजुट कर लें। अगर ऐसा होता है तो अशोक गहलोत सरकार अल्पमत में आ सकती है, जैसा कि खुद सचिन पायलट दावा कर चुके हैं। यानि मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया वाला मॉडल अपनाकर राजस्थान में पायलट 107 विधायकों वाली कांग्रेस की संख्या 77 तक गिरा सकते हैं और तब पार्टी 5 सहयोगी विधायकों को मिलाकर सिर्फ 82 विधायक ही जुटा पाएगी। जबकि, 200 विधायकों वाले सदन में 30 विधायकों के जाने (विधायकी से इस्तीफे) से प्रभावी सदस्य संख्या 170 ही बचेगी और कांग्रेस को सरकार बचाने के लिए कम से कम 86 विधायकों की जरूरत पड़ेगी। ऐसी स्थिति में अगर 13 में से ज्यातर निर्दलीय विधायकों (कम से कम 11) पर भाजपा (72+3=75) का पलड़ा भारी पड़ा तो कमलनाथ स्टाइल में गहलोत सरकार भी बीते जमाने की बन सकती है।

    गहलोत इस्तीफा दें और पायलट प्रदेश के 'पायलट' बन जाएं

    गहलोत इस्तीफा दें और पायलट प्रदेश के 'पायलट' बन जाएं

    अशोक गहलोत का दावा है कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है और उन्हें 109 विधायकों का समर्थन हासिल है। कांग्रेस और उसकी सहयोगी सरकार के मुखिया ऐसा दावा मध्य प्रदेश और कर्नाटक में भी कर चुके हैं। ऐसे में पायलट का अभी तक ये कहना कि वह भाजपा में 'नहीं शामिल' हो रहे हैं, इस संभावना को जन्म देता है कि कांग्रेस गहलोत से कुर्सी का मोह छोड़ने के लिए कह सकती है और युवा नेता सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाकर उन्हें अभी भी पार्टी में रोक कर दल को इस संकट से बचा सकती है। लेकिन, राजनीति में इसकी संभावना तो है, लेकिन फिलहाल इसकी सभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही। क्योंकि, भले ही पायलट के पास पार्टी की कमान हो, लेकिन विधायको की संख्या अभी भी गहलोत के पास ज्यादा है और उम्र के इस पड़ाव पर उनका कुर्सी छोड़ने का मतलब है कि प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर पहुंच जाना। दूसरी बात ये है कि पार्टी आलाकमान के सामने भी जिस हद तक गहलोत नतमस्तक हो सकते हैं, उतने कभी पायलट हो जाएंगे, इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती।

    अलग गुट बना लें पायलट या भाजपा में विलय कर लें

    अलग गुट बना लें पायलट या भाजपा में विलय कर लें

    कांग्रेस के पास राजस्थान में 107 विधायक हैं। ऐसे में पार्टी तोड़ने के लिए सचिन पायलट के पास जरूरी आंकड़े नहीं हैं। अभी वो 30-31 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं। ऐसे में अगर वो पार्टी से इस्तीफा देते हैं तो उन सबकी सदस्यता जा सकती है। लेकिन, अगर वो जरूरत के मुताबिक विधायकों का जुगाड़ कर लें तो आसानी से भाजपा में विलय कर सकते हैं या अपना अलग गुट बनाकर भारतीय जनता पार्टी के साथ कोई सियासी सौदा कर सकते हैं। मौजूदा परिस्थितियों में यह तबतक मुमकिन नहीं दिखता, जबतक उन्हें बीजेपी का सक्रिय सहयोग न मिल रहा हो।

    सरकार से निकलकर कांग्रेस में ही बने रहें पायलट

    सरकार से निकलकर कांग्रेस में ही बने रहें पायलट

    एक संभावना ये हो सकती है कि सचिन पायलट उपमुख्यमंत्री का पद छोड़ दें और पार्टी की कमान संभाले रहें। सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी को इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी। हो सकता है कि इसके लिए वो पायलट को पार्टी में कुछ और छूट का प्रलोभन में भी दे सकते हैं। लेकिन, सिंधिया के तजुर्बे को देखने के बाद पायलट अपने आत्मसम्मान का गला घोंटकर इस स्थिति के लिए कितने दिन तक राजी रह पाएंगे कहना मुश्किल है। अपना सियासी करियर बचाने के लिए उन्हें एक न एक दिन तो कोई ठोस निर्णय लेना ही पड़ेगा, नहीं तो गहलोत जैसे राजनीति के घाघ नेता तो उनकी पूरी सियासत की बाट भी लगा सकते हैं। वैसे भी पायलट दो महीने बाद भी सिर्फ 43 के ही होंगे। जबकि, गहलोत पहली बार 1998 में तब सीएम बने थे, जब वे महज 47 साल के थे।

    सभी नेताओं को मना ले कांग्रेसी आलाकमान

    सभी नेताओं को मना ले कांग्रेसी आलाकमान

    एक संभावना ये हो सकती है कि दिल्ली दरबार में दोनों खेमे को अलग-अलग क्षेत्र देकर मना लिया जाए और किसी तीसरे को मुख्यमंत्री बना दिया जाए। कर्नाटक और मध्य प्रदेश का हाल देखने के बाद सोनिया गांधी ये फॉर्मूला खुशी से अपनाना चाहेंगी। लेकिन, सवाल है कि क्या फॉर्मूला गहलोत और पायलट दोनों में कोई भी मानने को तैयार होगा?

    इसे भी पढ़ें- Rajasthan Political Crisis: बचेगी या जाएगी अशोक गहलोत सरकार ? समझिए नंबर गेम

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