राजस्थान चुनाव: जाट समाज किसके साथ, भाजपा या कांग्रेस
राजस्थान के चुनावों में सियासी पार्टियों की नज़र प्रभावशाली जाट समाज पर है. इस बिरादरी के समाजिक संगठनों का कहना है वोट बंटेंगे. मगर इसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस को जा सकता है.
इन संगठनों के मुताबिक, बीजेपी सरकार ने उन्हें निराश किया है. ख़ास तौर पर उन्हें केंद्र की मोदी सरकार की नीतियां प्रभावित नहीं कर पाईं.
मगर सत्तारूढ़ बीजेपी ऐसा नहीं मानती. बीजेपी के अनुसार किसान वर्ग पूरी तरह उनके साथ है.
राजस्थान जाट महासभा के अनुसार पिछले विधानसभा चुनावों में जाट समुदाय ने वोटों के मामले में बीजेपी की हिमायत की थी. क्योंकि तब नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार अभियान में समाज पर अपनी छाप छोड़ी थी. पर अब जाट महासभा का कहना है कि इन पांच सालों का अनुभव ठीक नहीं रहा.
जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील ने बीबीसी से कहा, "हमारे समाज का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ रहेगा. पिछली मर्तबा बहुमत हिस्सा बीजेपी के साथ चला गया था, क्योंकि नरेंद्र मोदी ने बहुत उम्मीदे जगा दी थी. हमे लगा कि किसान की आय दोगुनी हो जाएगी. और भी बहुत कुछ कहा, मगर वो भरोसा टूट गया है."
राज्य की राजनीति में जाट समाज का बड़ा असर है. इस समाज के हर विधानसभा चुनाव में तीस से अधिक विधायक चुन कर आते हैं. अगर इसमें उनकी सहयोगी जातियों को भी जोड़ लिया जाये तो यह संख्या और भी ज्यादा हो जाती है.
यही कारण है कि बीजेपी और कांग्रेस, दोनों पार्टियों ने जब टिकटों का बंटवारा किया, जाट समाज को संख्या में आगे रखा. बीजेपी ने 33 सीटों पर जाट प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारा है.
कांग्रेस ने भी इतनी ही सख्या में जाट उम्मीदवारों को मैदान में आगे किया है. जाट समाज के अनुसार संख्या बल के आधार पर राज्य में 100 से भी अधिक सीटों पर समाज का असर है.
'जाट वोट बटेंगे'
रेगिस्तान में अपने लोक देवता तेजाजी के गीत गाते जाट समुदाय ने इस मकाम तक पहुंचने के लिए लम्बी यात्रा की है. उनके हाथों में बंजर धरती को हरा-भरा करने का हुनर है.
पहले वे महज खेत खलिहानों तक महदूद थे, मगर अब वे जीवन के हर क्षेत्र में कामयाबी की कहानियां लिख रहे हैं. विधानसभा की अध्यक्ष रही सुमित्रा सिंह कहती हैं, "जाट का मतलब जस्टिस, एक्शन और ट्रुथ होता है. जो सत्य और न्याय के लिए संघर्ष करे वो जाट है."
सुमित्रा सिंह की परवरिश स्वाधीनता सेनानी परिवार में हुई. उनके पिता जंग-ए-आज़ादी के सिपाही थे. वो कहती हैं, "कांग्रेस और बीजेपी, दोनों पार्टियों ने इस समुदाय को सौगाते दी हैं."
"कांग्रेस ने किसान वर्ग को 1952 में बड़ी सौगात दी. उस वक़्त मुख्यमंत्री जय नारायण व्यास ने जमीन जोतने वाले काश्तकार को उसका मालिक बना दिया. फिर बीजेपी के कद्दावर नेता रहे स्व. भैरो सिंह शेखावत ने बारानी जमीन का लगान माफ़ कर बड़ा काम किया."
विधानसभा की अध्यक्ष रही सुमित्रा सिंह 09 बार विधायक रही हैं. इस समय वो बीजेपी से जुड़ी हैं.
इन चुनावों में जाट समाज किस ओर रुख करेगा? वो कहती हैं, "मैं तो मेरे झुंझुनू जिले के बारे में कह सकती हूँ, वोट दोनो में बंटेंगे. मगर ज्यादा कांग्रेस की तरफ जाएंगे. कारण क्या है, नहीं कह सकती. फिर रुख बदल भी सकता है. अभी वक़्त है."
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भाजपा का दावा
सत्तारूढ़ बीजेपी के मुताबिक, इन संगठनों के दावों में कोई सच्चाई नहीं है. पार्टी कहती है कि बीजेपी चीजों को जाति-धर्म की निगाह से नहीं देखती. बीजेपी प्रवक्ता पंकज मीणा कहते हैं, "जाट समुदाय किसान वर्ग है और पूरी तरह से बीजेपी से जुड़ा हुआ है. इसकी वजह भी है. इन पांच सालों में केंद्र और राज्य सरकार ने किसानों के हक में बहुतेरे काम किए हैं."
"फिर चाहे वो कर्ज माफ़ी हो या फसलों के वाजिब दाम. जाट समुदाय को पिछड़ा वर्ग में आरक्षण के लिए बीजेपी सरकार ने ही पहल की थी. समाज के लोग न केवल साथ है बल्कि वे सरकार के कामकाज की तारीफ भी करते हैं."
निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल कभी बीजेपी में ही थे. मगर पिछले चुनाव में बगावत कर अपने दम पर चुनाव जीता और विधानसभा पहुंचे. पिछले पांच साल में बेनीवाल ने राज्य में कई बड़ी रैलियां की और पिछले महीने राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक पार्टी खड़ी कर इन चुनावों में कई सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं.
समाज के लोग कहते हैं कि जाट समाज में युवा वर्ग का एक भाग बेनीवाल से प्रभावित है और वो वोट में हिस्सेदारी को प्रभावित कर सकते हैं.
बेनीवाल कहते हैं, "जाट क्या, समाज का दलित, गरीब,अल्पसख्यक, किसान और शोषित तबका उनके साथ है." कुछ लोग सवाल करते हैं कि उनकी पार्टी को साधन कौन मुहैया करवा रहा है. विधायक बेनीवाल इसका उत्तर देते हैं, "जब आम अवाम साथ में आ खड़ा होता है तो कोई दिक्क्त नहीं होती"
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किसी वक़्त राजस्थान की राजनीति में जाट समाज के नेताओं का दबदवा हुआ करता था. इनमें से नाथूराम मिर्धा, राम निवास मिर्धा, परसराम मदेरणा, शीश राम ओला और दौलत राम सारण जैसे नेताओं को भूला नहीं जा सकता है.
इनसे पहले कुम्भाराम आर्य को याद किया जाता है. लेकिन समाज के लोग कहते हैं कि अभी एक शून्यता महसूस हो रही है. कांग्रेस के पवन खेड़ा कहते है कि इस वक़्त समाज का हर हिस्सा कांग्रेस की तरफ उम्मीद से देख रहा है.
आज़ादी के पहले जब जिंदगी गांव और खेत-खलिहानों तक सिमटी थी, उस वक़्त आर्य समाज और जंग-ए-आज़ादी के सिपाहियों ने जाट समाज के बीच बहुत काम किया था. इसके बाद समाज ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.
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