Rajasthan Chunav: ओबीसी कार्ड कितना असरदार, राजस्थान में फिर कांग्रेस की दाल गलेगी या खिलेगा कमल?
राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इस बार यहां की परंपरा बदलने के लिए पूरा जोर लगा दिया है। ओबीसी वोटरों के प्रभाव वाले राज्य में कांग्रेस ने पांच साल बाद भी सत्ता में बने रखने के लिए समाज के इस वर्ग को लुभाने का दांव चला है।
पार्टी नेता राहुल गांधी हाल ही में प्रदेश की एक चुनाव सभा में ओबीसी जनगणना का पासा फेंककर गए हैं। उन्होंने कहा, 'देश में ओबीसी की आबादी कितनी है? कोई नहीं बता सकता, क्योंकि इसकी वजह है। यह एक साजिश है कि अपनी असली जनसंख्या आप नहीं जान सकें।'

चुनाव आया तो कांग्रेस ने जाति जगणना का किया वादा
जाट-बहुल हनुमानगढ़ विधानसभा क्षेत्र में वह वादा कर गए कि अगर कांग्रेस सत्ता में फिर से लौटती है तब वह कास्ट सर्वे करवाएगी। बिहार में जाति सर्वे का मुद्दा काफी समय से चर्चित रहा है। लेकिन, कांग्रेस ने चुनाव के दौरान राजस्थान में इसका वादा किया है, जबकि वह पिछले पांच वर्षों से सरकार में है।
ईटी ने हनुमानगढ़ से करीब 600 किलोमीटर दूर चित्तौड़गढ़ बस स्टैंड में फल बेचने वाले 35 साल के राजकुमार खटीक से राहुल के इस चुनावी वादे के बाद उनका रुख जानने की कोशिश की। खटीक ओबीसी जाति से हैं और हमेशा से बीजेपी को वोट देते आए है।
ओबीसी वोटरों में कांग्रेस के वादे का खास असर नहीं
उनका कहना है, 'अशोक गहलोत सरकार मुफ्त बिजली, बच्चों को स्कूलों में अच्छा मिडडे मील देती है और मेरी मां को भी वृद्धावस्था पेंशन देती है।' लेकिन, उनका कहना है कि फिर भी उनका वोट भाजपा को ही जाएगा। यूं लग रहा है कि कांग्रेस के वादे का उनपर कोई प्रभाव नहीं है।
वहीं जयपुर की तरफ बढ़ने पर जिधर जाटों की आबादी ज्यादा है, वहां लगता है कि ये अभी भी सतीश पूनिया जैसे नेता को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने को लेकर पार्टी से खुश नहीं है।
ऊपर से महिला पहलवानों के मामले में भाजपा के राजपूत सांसद बृजभूषण सिंह को लेकर भी उनकी नाराजगी पार्टी से कम नहीं हुई लगती है। इस तरह से राजस्थान में ओबीसी वोटर जाति जनगणना के वादे से मूल रूप से अप्रभावित ही लगते हैं और अन्य वजहों से उनका झुकाव बीजेपी या कांग्रेस में जरूर दिख रहा है।
राजस्थान में करीब 60 एमएलए और 11 सांसद ओबीसी
राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों के लिए 25 नवंबर को मतदान होना है। मौजूदा विधानसभा में करीब 60 एमएलए ओबीसी समाज से हैं। राज्य की सभी 25 लोकसभा सीटों पर बीजेपी का कब्जा है, जिनमें से 11 सांसद ओबीसी हैं।
राजस्थान में 35-40% ओबीसी आबादी का अनुमान
अनुमानों के मुताबिक राज्य की 35 से 40% आबादी ओबीसी है। इनमें सबसे ज्यादा जनसंख्या (करीब 9%) जाटों की मानी जाती है। इसके बाद गुर्जरों की आबादी करीब 7% मानी जाती है।
राजस्थान के ओबीसी वोटरों में बीजेपी का प्रभाव ज्यादा
कांग्रेस और भाजपा दोनों ने टिकट देने में ओबीसी की संभावित जनसंख्या का ख्याल रखा है। मसलन, बीजेपी ने 70 तो कांग्रेस ने 72 ओबीसी प्रत्याशियों को टिकट दिया है। वैसे अगर कुछ जाट बेल्ट में बीजेपी से इनकी मौजूदा नाराजगी को छोड़ दें तो भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान में ओबीसी समाज पर अपना अच्छा प्रभाव छोड़ रखा है।
गुर्जरो का इसबार कांग्रेस की तरफ एकतरफा झुकाव नहीं
कुछ ओबीसी जातियां ऐसी भी हैं, जो समाज के खास नेताओं की वजह से कांग्रेस और बीजेपी के बीच भी बंटी नजर आती हैं। उदाहरण के लिए गुर्जरों को ले सकते हैं। 2018 में गुर्जरों ने तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद में अपनी पूरी ताकत कांग्रेस के पीछे झोंक दी थी।
लेकिन, पांच साल में पायलट का कांग्रेस पार्टी के अंदर हाल देखने के बाद इस बार राजस्थान के गुर्जर कांग्रेस और बीजेपी के बीच विभाजित नजर आ रहे हैं। बीजेपी ने जिस तरह से गुर्जर बेल्ट में दिल्ली के तेज-तर्रार गुर्जर सांसद रमेश बिधूड़ी को पार्टी के चुनाव अभियान की जिम्मेदारी सौंपी है, उसके पीछे एक महत्वपूर्ण वजह ये भी है।
कांग्रेस के वादे में हो गई देर?
राहुल ने राजस्थान में पार्टी के सामने ओबीसी वोटरों के बीच इस बार खड़ी चुनौती को देखते हुए ही जाति जनगणना वाला दांव आजमाया है। लेकिन, लगता है कि कांग्रेस पार्टी के लिए अब काफी देर हो चुकी है।
राजस्थान के ट्रेड यूनियन नेता और लोकतांत्रिक मोर्चा के संयोजक अर्जुन डेथा कहते हैं, 'हमने जाति सर्वेक्षेण का आदेश देने के लिए 2021 के अगस्त में ही मुख्यमंत्री को लिखा था। कांग्रेस इसका आदेश देकर ओबीसी आबादी के आधार पर आरक्षण देने के प्रति अपना इरादा दिखा सकती थी। लेकिन, अब यह राजनीतिक मौकापरस्ती लग रहा है।'
हकीकत ये है कि आज राजस्थान में बेरोजगारी दर 28.5% है, जिसमें सरकारी नौकरियों की संख्या काफी है। राज्य में ओबीसी के लिए 21% और गुर्जरों समेत अन्य अति पिछड़ों के लिए 5% आरक्षण का इंतजाम है। ऐसे में अगर कांग्रेस इस तरह की पहल पहले ही की होती और इसपर अमल किया होता तो शायद उसे ज्यादा फायदा मिल सकता था।












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