रेलवे स्टेशनों पर मारे-मारे घूमने वाले बच्चों की होगी अब फिक्र
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) आप देश के सभी रेलवे स्टेशनों में या उसके उसके आसपास कुछ बेहद फटे हाल कपड़े पहने बच्चों को घूमते देख सकते हैं। दरअसल देश के लाखों बेसहारा बच्चों के लिए छत का काम करते हैं रेलवे स्टेशन। कौन हैं ये बच्चे? क्या किसी को इनकी कोई फिक्र है? पर, अब इनका क्याल किया जाएगा।

मानव तस्करी का शिकार
कम 5 से 6 लाख ऐसे बच्चे हैं जो, या तो रेलवे का इस्तेमाल करते हैं अथवा रेलवे स्टेशनों पर आते हैं और या तो वे भागे हुए अथवा बेसहारा अथवा मानव तस्करी का शिकार होते हैं और उन्हें सहायता की जरूरत होती है।
बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा
राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग ने राजधानी में अपने आठवें स्थापना दिवस पर "भारतीय रेल के संपर्क में असुरक्षित बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा" विषय पर एक सम्मेलन आयोजित किया। केन्द्रीय महिला और बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका संजय गांधी ने इस सम्मेलन का उद्घाटन किया।
इस अवसर पर श्रीमती गांधी ने कहा कि कम-से-कम 5 से 6 लाख ऐसे बच्चे हैं जो, या तो रेलवे का इस्तेमाल करते हैं अथवा रेलवे स्टेशनों पर आते हैं और या तो वे भागे हुए अथवा बेसहारा अथवा मानव तस्करी का शिकार होते हैं और उन्हें सहायता की जरूरत होती है।
उन्होंने कहा कि महिला और बाल विकास मंत्रालय तथा रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल के संपर्क में आये ऐसे बच्चों की देखभाल और उनका संरक्षण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक विशेष संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की है। उन्होंने कहा कि 20 रेलवे स्टेशनों पर इन विशेष संचालन प्रक्रियाओं को लागू करना शुरू किया जा चुका है। मेनका संजय गांधी ने बच्चों के कल्याण के क्षेत्र में इन विशेष संचालन प्रक्रियाओं के कार्यान्वयन को एक ऐतिहासिक कदम बताया।
श्रीमती गांधी ने कहा कि इन रेलवे स्टेशनों पर गैर-सरकारी संगठन,बाल सहायता समूह उनके साथ काम करेंगे जो उनके माता-पिता,अभिभावक के पास बच्चों को वापस पहुंचाने के लिए काम करेंगे अथवा उनकी अनुपस्थिति में बच्चों के पुनर्वास के लिए काम करेंगे।
बच्चों का पुनर्वास हो सके
कोशिश हो रही है ताकि ज्यादा से ज्यादा गैर-सरकारी संगठन रेलवे के साथ साझेदारी कायम करने के लिए आगे आएं ताकि बच्चों का पुनर्वास हो सके। रेलवे भी अपने संपर्क में आये सभी बच्चों को सभी संभव सहायता प्रदान करने के लिए इच्छुक है।












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