देश की बागडोर संभाल सकते हैं आलसी राहुल गांधी?
कांग्रेस युवराज राहुल गांधी जो पार्टी के उम्मीद का सहारा हैं, जिन्हें कांग्रेस सदस्य और स्वयं वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी भावी पी.एम पद के लिए फिट मानते हैं, वो राहुल गांधी आज लोकल ट्रेन की तरह राजनीति की पटरियों पर चल रहें हैं. चुनाव को बचा केवल एक महीना फिर भी जनाब हैं कि फुरसतिया आलम से बाहर नहीं आना चाहते. उनकी यही अदा तो है जो उन्हें कांग्रेस की परम्परा से अलग करती है. अभी तक जनता ने देखा था इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की कर्मण्यशील व्यक्तित्व को पर आज उसी गांधी परिवार के सूत्रधार राहुल गांधी की छवि आलोचकों की निगाह में अनिच्छुक हो गई है।
ऐसा नहीं है कि उनकी यह छवि चुनावी माहौल के दौरान ही उभरी हो बल्कि आरंभ से ही राहुल राजनीति और सत्ता के प्रति इच्छुक नहीं नजर आते। 128 साल के अस्तित्व वाली कांग्रेस पार्टी के पी.एम पद के दावेदार राहुल गांधी का व्यक्तित्व अनोखा है जिसे जानना मुश्किल है, वह सत्ता से दूर हैं पर फिर भी लोगों से मिलना पंसद करते हैं। इतना ही नहीं यह आराम पसंद राहुल ही हैं जो पिछले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र में ऊर्जा का प्रतीक थे, परंतु राहुल के व्यक्तित्व का यह अंश उनके राजनीतिक जीवन के लिए नकारात्मक साबित हो सकता है।
मौजूदा चुनावी माहौल में जहाँ सभी दल सत्ता को हथियाने की होड़ में तेजी से दौड़ रहें हैं वहीं राहुल अब भी उतने क्रियाशील नहीं दिख रहे जितना होना चाहिए था। 'द हिन्दु' समाचार पत्र में स्मिता गुप्ता ने राहुल से हुई बातचीत के दौरान जो अनुभव प्रकट किया वो भी सिद्ध करता है कि चुनावी युद्ध में राहुल की भूमिका अपेक्षाकृत कम क्रियाशील है राहुल की इस अनउत्साही छवि का कारण यह भी हो सकता है कि शायद राहुल इन चुनाव में अपने दल की स्थिति को भांप चुके हैं। कहीं न कहीं वो कांग्रेस की हार को पहले से ही स्वीकार कर चुके हैं।
आगे की खबर स्लाइडों में...

राहुल की बेरूखी से नाराज साथी
प्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार शंकर्षण ठाकुर ने एक बार राहुल गांधी के विषय में विवेचित किया कि रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान ने राहुल गांधी से मिलने के लिए, संपर्क साबित करने का अथक प्रयास किया परंतु फिर भी राहुल ने उनके इस प्रयास को विफल कर दिया चिराग से बात नहीं की और अंत में इस विफलता से हार कर रामविलास पासवान को नरेन्द्र मोदी से हाथ मिलाना पड़ा।

राहुल का इगनोरिंग व्यक्तित्व?
एक राजनेता में इस इगनोरिंग व्यक्तित्व का होना निश्चित ही अप्रिय है, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है बल्कि इससे पहले भी कई बार राहुल को इस विमुख छवि में देखा गया है। जब सोनिया गांधी ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुनने के अवसर पर यूपीए सहयोगियों को शुक्रिया कहने के लिए लंच का आयोजन किया तो इस अवसर पर भी राहुल सोनिया गांधी के साथ होने की बजाय मुलायम सिंह, प्रफुल पटेल और फारुक्ख अब्दुला के साथ बैठे थे।

राहुल की कोई रणनीति नहीं
इस चुनाव में राहुल गांधी की कोई रणनीति स्पष्ट दिखाई नहीं देती, वो जो भी संदेश देते हैं वो जनता के पक्ष में कम और पार्टी के पक्ष में अधिक दिखाई देता है। इतना ही नहीं कांग्रेस ने तीसरे मोर्चे का भी समर्थन करने में कोताही नहीं बरती आखिर क्या ऐजेंडा है राहुल और उनकी पार्टी का।

राहुल गांधी, केजरीवाल की नकल कर रहे हैं?
राहुल के सियासी लक्षणों से तो यही लगता है कि राहुल केजरीवाल की नकल कर रहे हैं उनकी रणनीति आप की रणनीति से प्रभावित लगती है। वह आजकल केजरीवाल की ही तरह जनता से मिल रहे हैं और उन्हीं की तरह बातें कर रहे हैं।

देश की बागडोर संभाल सकते हैं राहुल?
राहुल की यह सुस्त और फुरसतिया छवि कांग्रेस के लिए क्या रंग लाएगी यह भी जल्दी पता चल जाएगा पर सवाल यह उठता है कि क्या राहुल एक सफल और पूर्ण राजनेता है? जो व्यक्ति अपने दल का ही ठीक से प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता अपने दल की बागडोर ही नहीं संभाल पाता क्या वो देश की बागडोर संभाल सकता है?












Click it and Unblock the Notifications