नरेंद्र मोदी: गुजरात की राजनीति से दिल्ली तक का सफर

नई दिल्ली। गुजरात में चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है। तारीखों के ऐलान के बाद से ही राज्य में राजनीतिक माहौल गर्मा गया है। गुजरात में इस समय भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है। इसके बाद दूसरा बड़ा चेहरा अमित शाह का है। भले ही मुख्यमंत्री का चेहरा विजय रुपानी हो लेकिन गुजरात का चुनाव पीएम नरेंद्र मोदी के लिए नाक का सवाल है। इसलिए पीएम मोदी इस चुनाव में किसी भी तरह की कसर नहीं छोड़ रहे हैं। नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय और अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में 2002 के गोधरा कांड के बाद आए थे। चार दशक से ज्यादा के करियर में नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय राजनीति में उभार मुश्किल से पिछले पंद्रह सालों का है।

narendra modi

मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी एक कुशल जमीनी संगठनकर्ता थे। वो पंचायत चुनावों से लेकर संसदीय चुनावों तक संगठन के कार्यों में शामिल थे। नरेन्द्र जब विश्वविद्यालय के छात्र थे तभी से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में नियमित जाने लगे थे। इस प्रकार उनका जीवन संघ के एक निष्ठावान प्रचारक के रूप में प्रारम्भ हुआ उन्होंने शुरुआती जीवन से ही राजनीतिक सक्रियता दिखलायी और भारतीय जनता पार्टी का जनाधार मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभायी।

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उनके इनोवेटिव संगठन कौशल को एक उदाहरण से अच्छी तरह समझा जा सकता है कि गुजरात भाजपा के प्रमुख सदस्य के रूप में उन्होंने किस तरह 1980 के दशक में अहमदाबाद नगर निगम का चुनाव जीतने में भाजपा की मदद की। नरेन्द्र मोदी की यात्रा वड़नगर की गलियों से शुरू होती है। उत्तरी गुजरात के मेहसाणा जिले का एक छोटा-सा क़स्बा। भारत के स्वतंत्र होने के तीन साल और भारत में गणतंत्र की स्थापना के कुछ महीने बाद 17 सितम्बर 1950 को जन्मे नरेन्द्र मोदी, दामोदरदास मोदी और हीराबा की छह संतानों में से तीसरी संतान थे।

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1980 के दशक में जब मोदी गुजरात की भाजपा ईकाई में शामिल हुए तो माना गया कि पार्टी को संघ के प्रभाव का सीधा फायदा होगा। वे वर्ष 1988-89 में भारतीय जनता पार्टी की गुजरात ईकाई के महासचिव बनाए गए। नरेंद्र मोदी ने लाल कृष्ण आडवाणी की 1990 की सोमनाथ-अयोध्या रथ यात्रा के आयोजन में अहम भूमिका अदा की। इसके बाद वो भारतीय जनता पार्टी की ओर से कई राज्यों के प्रभारी बनाए गए।

इसके बाद 1998 में उन्हें महासचिव (संगठन) बनाया गया। इस पद पर वो अक्‍टूबर 2001 तक रहे। 2001 में जब गुजरात में भूकंप के आने से 20,000 लोग मारे गए तब राज्य में राजनीतिक सत्ता में भी बदलाव हुआ। दबाव के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को अपना पद छोड़ना पड़ा। पटेल की जगह नरेंद्र मोदी को राज्य की कमान सौंपी गई और इसके बाद मोदी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मोदी के सत्ता संभालने के लगभग पांच महीने बाद ही गोधरा रेल हादसा हुआ जिसमें कई हिंदू कारसेवक मारे गए। फरवरी 2002 में ही गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ़ दंगे भड़क उठे। इन दंगों में सरकार के मुताबिक एक हजार से ज्यादा और ब्रिटिश उच्चायोग की एक स्वतंत्र समिति के अनुसार लगभग 2000 लोग मारे गए। इनमें ज्यादातर मुसलमान थे।

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महत्वपूर्ण है कि दंगों के चंद महीनों के बाद ही जब दिसंबर 2002 के विधानसभा चुनावों में मोदी ने जीत दर्ज की थी तो उन्हें सबसे ज्यादा फायदा उन इलाकों में हुआ जो दंगों से सबसे ज्यादा प्रभावित थे। इसके बाद 2007 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने गुजरात के विकास को मुद्दा बनाया और फिर जीतकर लौटे। फिर 2012 में भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा गुजरात विधानसभा चुनावों में विजयी रहे और अब केंद्र में अपने नेतृत्‍व में सरकार चला रहे हैं। एक बार फिर से गुजरात में विधानसभा होने जा रहे है।

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