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Article 370: लद गए अलगाववाद के दिन, कश्मीर में बदल रहे राजनीतिक समीकरण

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बेंगलुर। जम्मू कश्‍मीर को मिला विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद कश्‍मीर घाटी में राजनीतिक समीकरण बदलता नजर आ रहा है। पिछले कई वर्षों सें भारतीय संविधान को नकारते हुए भारत से अलग होने की मांग को लेकर राजनीति कर रही अलगावादी पार्टियां के भविष्‍य पर तलवार लटक रही है। यहां की सियासत में ऐसी शुरुआत होने जा रही है जो न तो आज तक कभी हुआ और न ही इसके बारे में कभी किसी ने सोचा होगा।

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कश्मीर हटने का असर सबसे पहले राज्य के उस जहर पर होता हुआ नजर आ रहा है, जिसे पिछले 70 साल तक जबरन पिलाया गया, जिसके कारण सिर्फ जम्मू कश्मीर और लद्दाख बल्कि पूरा देश बुरी तरह से कराहता रहा है। राजनीति विशेषज्ञ मानते है कि उनका यह पुराना राजनीतिक खेल खत्म हो चुका है।

सूत्रों की माने तो एक ओर कुछ अलगाववादी मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ने की सोच रहे हैं, तो दूसरी ओर मुख्यधारा से जुड़े कुछ नेताओं का प्रतिद्वंद्वी पार्टियों में पालाबदल के लिए झुकाव नजर आ रहा है। फिलहाल तो कश्मीर केंद्रित पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और नेशनल कांफ्रेंस के साथ प्रदेश कांग्रेस के नेताओं की नजरबंदी के कारण सियासी गतिविधियां धीमी गतिविधियां धीमी पड़ी है लेकिन हर दल में अंदर ही अंदर खिचड़ी पक रही है।

राजनीतिक भविष्य पर मंथन में जुटी पार्टियांं

कश्मीर घाटी में राजनीति अभूतपूर्व रूप से नई करवट लेने लगी है। अलगाववाद और मुख्यधारा की सियासत से जुड़े नेताओं के करीबियों ने मीडिया को बताया कि राज्य को दो हिस्सों में बांटने के शुरुआती झटके और आर्टिकल 370 और 35ए पर केंद्र के ऐक्शन के बाद सभी पार्टियां अपने राजनीतिक भविष्य पर मंथन में जुटे हैं।

क्षेत्रीय पार्टियों का अजेंडा महत्वहीन हो चुका है, सभी समूह अपने भविष्य के मंथन में जुटे हुए हैं। कश्‍मीर में क्षेत्रीय स्तर पर राजनीति करने वाले कुछ नेताओं का कहना है कि , 'हम अब देश के बाकी राज्यों की तरह हैं। पार्टियों को अब अलगाववाद, नरम अलगाववाद और स्वायत्तता के बजाए शासन से जुड़े मुद्दों पर लड़ना होगा। आज की तारीख में कश्मीर में सभी क्षेत्रीय पार्टियों का राजनीतिक अजेंडा महत्वहीन हो गया है। यहां के लोग रोज रोज की हिंसा और आतंकवाद से निजाद पाना चाहते हैं। अब वह चाहते है कि वह ऐसी पार्टी को सत्ता पर काबिज करना चाहते हैं जो कश्‍मीर घाटी का विकास करे।

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कई हिस्सों में बंट सकती है पीडीपी

कश्‍मीर की मुख्यधारा की एक और अहम राजनैतिक पार्टी पीडीपी भी फिलहाल अपने विकल्पों पर विचार कर रही है। खबर के अनुसार, पीडीपी के उभार के पीछे जमात ए इस्लामी का बड़ा हाथ था। अब चूंकि सरकार ने जमात ए इस्लामी पर पिछले काफी समय से शिकंजा कसना शुरू कर दिया था। वहीं सरकार में रहते हुए जिस तरह से महबूबा मुफ्ती ने अपने परिवारवालों को अहम पदों पर बिठाया, उससे पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी अलग-थलग हो चुके हैं और दूसरी पार्टियों में शामिल हो सकते हैं, ऐसे में पीडीपी की ताकत काफी घटी है. फिलहाल पार्टी अपने अगले कदम पर विचार-विमर्श कर रही है।

पीडीपी चीफ महबूबा मुफ्ती के साथ काम कर चुके एक नेता का कहना है, 'पीडीपी की ताकत बढ़ाने में जमात-ए-इस्लामी के वोटों का बड़ा योगदान था, लेकिन अलगाववादियों और जमात नेताओं पर कार्रवाई के बाद पीडीपी खत्म हो गई है। ऐसा लगता है कि अब पार्टी कई धड़ों में बंट जाएगी। पार्टी में बहुत कम लोग ही उनकी कट्टर भारत विरोधी राजनीति के साथ हैं। हर किसी को पता है कि पुराना राजनीतिक खेल खत्म हो चुका है।

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पिछले 30 साल के दौरान हिंसा और आतंकवाद के बीच जहां अलगाववादी भारतीय संविधान को नकारते हुए भारत से अलग होने की मांग उठाते रहे हैं, वहीं कश्मीर की सबसे पुरानी पार्टी नैशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू-कश्मीर को 1953 से पहले मिली स्वायत्तता बहाल करने की मांग की है। मुख्यधारा की अन्य सियासी पार्टियों में एक पीपल्स डेमोक्रैटिक पार्टी (पीडीपी) नरम अलगाववाद के साथ धार्मिक प्रतीकात्मकता के पक्ष में खड़ी दिखती रही है।

हुर्रियत के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि उनके युवा कार्यकर्ता मुख्यधारा से जुड़ने के इच्छुक हैं। लोगों को अब अहसास हुआ है कि पाकिस्तान और भारत, दोनों से फंडिंग पर निर्भर अलगाववाद से कश्मीर की जनता को कोई मदद नहीं मिली है। संघर्ष में आम कश्मीरी मारे जाते हैं, लेकिन अलगाववादी नेता और उनके बच्चे आलीशान जिंदगी जीते हैं। बता दे हुर्रियत कॉन्फ्रेंस मुख्यत: जम्मू-कश्मीर में चरमपंथी संगठनों से संघर्ष कर रही भारतीय सेना की भूमिका पर सवाल उठाने के अलावा मानवाधिकार की बात करती रही है।

भारतीय सेना की कार्रवाई को सरकारी आतंकवाद का नाम देती रही है और कश्मीर पर भारत के शासन के ख़िलाफ़ हड़ताल और प्रदर्शन करती है। 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस के समारोहों का बहिष्कार भी करती आई है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने अभी तक एक भी विधानसभा या लोकसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लिया है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ख़ुद को कश्मीरी जनता का असली प्रतिनिधि बताती है।

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नैशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के सूत्रों का कहना है कि पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को बहाल करने के लिए लड़ाई लड़ने को तैयार हैं, नेशनल कांफ्रेंस सूत्रों के अनुसार, फारुख अब्दुल्ला अभी भी इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि केन्द्र सरकार ने जम्मू कश्मीर के विशेषाधिकार छीन लिए हैं और उसका बंटवारा कर दिया है वहीं उमर अब्दुल्ला इस मामले पर अपने पिता की सोच को लेकर थोड़े अनिच्छुक नजर आ रहे हैं. इसका सीधा सन्देश ये माना जा रहा है कि उमर उब्दुल्ला केंद्र के फैसले को स्वीकार करने के लिए खुद को तैयार कर सकते हैं लेकिन फारुख अब्दुल्ला अभी भी अड़े हुए हैं।

वहीं कांग्रेस और अन्य पार्टियां यहां आकर राजनीतिक रोटियां सेकने की फिराक में लगी हुई है लेकिन उन्‍हें कश्‍मीर में एंट्री न मिलने पाने के कारण छटापटा रही हैं। बता दें पिछले रविवार को कश्मीर में हालात का जायजा लेने आए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी व गुलाम नबी आजाद सहित अन्य नेताओं को एयरपोर्ट से ही लौटा दिया गया था । कश्मीर के हालात को लेकर राजनीति करने वाली पार्टियां चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही हैं।

खबर के अनुसार, जम्मू कश्मीर की राजनीति में बीते दिनों ही दस्तक देने वाले पूर्व नौकरशाह शाह फैसल के एक करीबी ने बताया कि फैसल के लिए मुख्यधारा की राजनीति की शुरुआत का यह अच्छा मौका हो सकता है और राज्य के युवाओं का भी उन्हें अच्छा खासा समर्थन हासिल है। कश्मीर के राजनैतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि कश्मीर की राजनीति में अब सबसे बड़े किंगमेकर पंचायत सदस्य और स्थानीय निकाय के नेता बन सकते हैं. कश्मीर के कई युवा और प्रगतिशील नेताओं ने हालिया पंचायत चुनावों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। ऐसे में आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति को नई दिशा देने में यह तबका काफी अहम साबित हो सकता है।

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पैर जमाने की जुगत में भाजपा

जम्मू कश्‍मीर में भाजपा इस समय अपने संगठनात्मक गतिविधियों को तेजी दे रही है। पार्टी 31 अगस्त और एक सितंबर को जम्मू व लद्दाख में जिला स्तरीय कार्यशालाओं के आयोजन के लिए तैयार है। इनमें प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता शामिल होंगे। भाजपा ने फिलहाल कश्मीर संभाग के 10 जिलों में संगठनात्मक गतिविधियों का आयोजन न करने का फैसला किया है।

राज्य में भाजपा के संगठनात्मक चुनाव के प्रभारी विरेन्द्रजीत सिंह का कहना है कि जम्मू व लद्दाख में जिला स्तर तक चुनाव होंगे। हमारे पास दिसंबर के पहले हफ्ते तक का समय है। ऐसे में कुछ समय बाद कश्मीर में संगठनात्मक चुनाव करवाने का फैसला हो सकता है।

इसी बीच केंद्र शासित प्रदेश बनने के फैसले के बाद जम्मू में डोमीसाइल व अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर भी राजनीति जारी है। प्रदेश भाजपा की पूरी कोशिश है कि जम्मू कश्मीर के लोगों के भूमि संबंधी हितों के संरक्षण के लिए डोमीसाइल की व्यवस्था हो। पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. निर्मल सिंह ने यह मुद्दा दिल्ली में उठाने का विश्वास दिलाया है।

जम्मू केंद्रित कुछ दल डोमीसाइल और जम्मू को अलग राज्य बनाने का मुद्दा उठा रहे हैं। इनमें पैंथर्स पार्टी के साथ एकजुट जम्मू और जम्मू वेस्ट असेंबली मूवमेंट आदि शामिल हैं। इन संगठनों का कहना है कि जम्मू से भेदभाव का दौर तभी खत्म होगा जब इसे कश्मीर से अलग कर राज्य बना दिया जाए। ऐसे हालात में जम्मू को अलग राज्य बनाने की मांग का जोर पकड़ना तय है।

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English summary
Political equations are seen changing in Kashmir. On the one hand some separatists are thinking of joining mainstream politics, on the other hand some of the mainstream leaders are seen leaning towards a change in rival parties.
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