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ओलंपिक खेलों का वो पक्ष, जिनमें स्कैंडल, मारपीट और प्रतिबंध हैं

By BBC News हिन्दी
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ओलंपिक
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यूँ तो आधुनिक ओलंपिक खेल हैरतअंगेज़ खेल कारनामों के गवाह रहे हैं, लेकिन साथ ही इन ओलंपिक खेलों में धोखाधड़ी, स्कैंडल्स, प्रतिबंधित दवाओं का सेवन, राजनीतिक विरोध और हिंसा का भी बोलबाला रहा है.

वर्ष 1886 में एथेंस में हुए पहले ओलंपिक खेलों में सिर्फ़ पुरुषों ने भाग लिया था. इनमें से अधिक्तर ग्रीक थे या उन दिनों ग्रीस की यात्रा पर आए हुए थे.

डेविड गोल्डब्लेट अपनी किताब 'द गेम्स' में लिखते हैं, "1900 के पेरिस खेल मध्य मई से लेकर अक्तूबर के अंत तक यानी साढ़े तीन महीने चले थे. इन खेलों में न तो कोई उद्घाटन समारोह और न ही समापन समारोह हुआ था. और तो और विजेताओं को कोई पदक भी नहीं दिए गए थे. तैराकी की स्पर्धा सीन नदी के गंदे पानी में कराई गई थी."

अगले कुछ ओलंपिक खेल भी पूरी तरह से व्यवस्थित नहीं थे, जो कई महीनों तक चलते थे. खेलों के कोई निश्चित नियम नहीं थे और इस बात पर बहस होती थी कि एथलीटों को रविवार को दौड़ना चाहिए या नहीं और खेलों में उनके भाग लेने के लिए उन्हें पैसा मिलना चाहिए या नहीं.

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति का ज़ोर था कि खिलाड़ियों को पेशेवर नहीं होना चाहिए और उन्हें खेलों से कोई पैसा नहीं कमाना चाहिए. इसकी वजह से उन लोगों के लिए इन खेलों में भाग लेना मुश्किल हो गया था, जो अमीर नहीं थे.

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कार में लिफ़्ट लेकर पूरी की मैराथन दौड़

1904 के ओलंपिक खेलों में अमेरिका के फ़्रेड लोर्ज़ ने कड़ी गर्मी और धूल भरी सड़कों पर दौड़ते हुए मैराथन दौड़ जीती थी. बाद में पता चला कि उन्होंने दौड़ के बीच में कुछ दूरी के लिए अपने ट्रेनर की कार में लिफ़्ट ली थी.

उनको पदक दिया ही जाने वाला था कि उन्होंने स्वीकार कर लिया कि उन्होंने कार में लिफ़्ट ली थी. बाद में ये पदक टॉमस हिक्स को दिया गया.

लंदन में हुए 1908 के ओलंपिक खेलों में मैराथन दौड़ को इसलिए एक किलोमीटर लंबा कर दिया गया ताकि राजघराने के सदस्य विंडसर कैसल के अंदर बैठ कर इस दौड़ को देख सकें.

1972 के म्यूनिख ओलंपिक में भी एक बाहरी व्यक्ति बीच में ही मैराथन रेस दौड़ने लगा था. वो एक विजेता के रूप में स्टेडियम में घुसा था, लेकिन सजग सुरक्षाकर्मियों ने उसे गिरफ़्तार कर लिया.

ओलंपिक
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महिलाओं के भाग लेने की मनाही

पहले ओलंपिक खेलों में किसी महिला ने भाग नहीं लिया था. पहली बार 1900 के पेरिस ओलंपिक में महिलाएँ प्रतियोगी के रूप में देखी गईं थीं, लेकिन 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक तक उन्हें एथलेटिक्स और जिमनास्टिक्स में भाग लेने की मनाही थी.

1928 के ओलंपिक खेलों में जब 800 मीटर की दौड़ में कई महिला एथलीट दौड़ पूरी न कर ट्रैक पर ही गिर गई, तो उनके 200 मीटर से ज़्यादा की दौड़ों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जो 1960 के रोम ओलंपिक तक जारी रहा.

जिन थॉर्प से छीने गए जीते गए स्वर्ण पदक

कई दशकों तक अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति इस बात पर ज़ोर देती रही कि खिलाड़ियों को इन खेलों से पैसा नहीं कमाना चाहिए. 1912 के स्टॉकहोम ओलंपिक में अमेरिकी धावक जिम थॉर्पे से पेंटाथलन और डिकेथलॉन में जीते गए स्वर्ण पदक छीन लिए गए, जब ये पता चला कि उन्हें एक बार बेसबॉल खेलने के लिए मामूली रकम दी गई थी.

70 वर्ष बाद 1982 में कहीं जाकर जिम थॉर्प के परिवार को वो पदक वापस किए गए.

जिम थॉर्पे
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जिम थॉर्पे

स्टॉकहोम खेलो के बाद से ही ओलंपिक खेलों में एथलीटों के निजी तौर से भाग लेने पर रोक लगा दी गई थी.

ब्रिटेन के सैनिक अफ़सर आरनल्ड जैक्सन को राष्ट्रीय टीम में नहीं चुना गया था, लेकिन निजी तौर पर भाग लेते हुए उन्होंने 1500 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता था.

रेफ़री की बेईमानी

जब 1920 में एंटवर्प में ओलंपिक खेल हुए, तो न तो दूसरे विश्व युद्ध में हारे जर्मनी, तुर्की, हंगरी और ऑस्ट्रिया को ओलंपिक खेलों में बुलाया गया और न ही गृह युद्ध की मार झेल रहे सोवियत संघ को.

फ़ुटबॉल में जब मेज़बान बेल्जियम और चेकोस्लोवाकिया का मुक़ाबला हुआ, तो बेल्जियम ने पहले हाफ़ की शुरुआत में ही दो गोल की बढ़त बना ली. इसके बाद चेक खिलाड़ियों ने मारधाड़ शुरू कर दी.

जब हाफ़ टाइम से कुछ पहले रेफ़री ने चेक रक्षक कारेल स्टीनर को हिंसक टैकल के लिए बाहर भेजा, तो पूरी चेक टीम भी विरोध में उनके साथ बाहर चली गई. नतीजा ये हुआ कि बेल्जियम को विजेता घोषित किया गया.

ग़ुस्साई भीड़ ने मैदान में घुसकर चेक झंडा फाड़ डाला और अपने खिलाड़ियों को कंधों पर बैठा कर बाहर लाए.

ओलंपिक खेलों में राजनीति का प्रवेश

1936 में जब बर्लिन में ओलंपिक खेल हुए, तो जर्मनी के चांसलर एडोल्फ़ हिटलर ने इन खेलों का इस्तेमाल नाज़ी विचारधारा के प्रचार और प्रसार के लिए किया.

उनकी सोच थी कि गोरे चमड़ी के आर्यन जर्मन क्षमता में दूसरे देशों के एथलीटों से बेहतर थे. उनकी ये सोच ग़लत साबित हुई, जब काली चमड़ी के अमेरिकी जेसी ओवेंस ने एथलेटिक्स में चार स्वर्ण पदक जीते.

जैसी ओवेंस
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जैसी ओवेंस

यही नहीं 400 मीटर में आर्ची विलियमेस, 800 मीटर में जॉन वुडरफ़ और ऊँची कूद में कोर्नेलियस जॉन्सन विजयी रहे. ये सारे खिलाड़ी भी काले थे. हिटलर के क़रीबियों में से एक गोबिल्स ने अपनी डायरी में इन जीतों को 'कलंक' की संज्ञा दी.

हिटलर
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हिटलर

ग़ुलाम देशों के भाग लेने पर विवाद

1936 के ही ओलंपिक खेलों की मैराथन दौड़ में दो कोरियाई खिलाड़ियों सोन की चुंग और नैम संग यौंग ने स्वर्ण और काँस्य पदक जीते, तो जापानी राष्ट्र गान बजाया गया क्योंकि उस समय कोरिया पर जापान का अधिकार था.

के लेनार्ज़ ने जर्नल ऑफ़ ओलंपिक हिस्ट्री में लिखा, "इन दोनों खिलाड़ियों ने अपने सिर झुका कर शांतिपूर्वक विरोध का इज़हार किया. यही नहीं जापान ने इन दोनों खिलाड़ियों को झूठे जापानी नाम कितई सोन और शारयू नान देकर ओलंपिक खेलों में शामिल कराया था. जब ये खिलाड़ी स्वदेश लौटे, तो कुछ स्थानीय अख़बारों ने इनकी तस्वीर छापी, जिसमें जापानी झंडे को हटा दिया गया था. जापान सरकार ने इसकी सज़ा इन अख़बारों के संपादकों को गिरफ़्तार करके दी."

इसी तरह का वाकया 1936 के ओलंपिक खेलो में भारत की हॉकी टीम के साथ हुआ, जब उनके स्वर्ण पदक जीतने के बाद ब्रिटेन का राष्ट्रगान बजाया गया और यूनियन जैक ऊपर गया.

लेकिन कम लोगों को पता है कि फ़ाइनल मैच शुरू होने से पहले टीम के मैनेजर पंकज गुप्ता ने अपनी जेब से कांग्रेस का तिरंगा झंडा निकालकर भारतीय खिलाड़ियों में जोश भरा था. सारे खिलाड़ी उस झंडे को सैल्यूट कर मैदान में उतरे थे और उन्होंने जर्मनी की हॉकी टीम को 8-1 से हराया था.

1936 ओलंपिक में गोल्ड जीतने वाली भारतीय टीम
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1936 ओलंपिक में गोल्ड जीतने वाली भारतीय टीम

राजनीतिक कारणों से खेलों का बहिष्कार

पचास के दशक से अस्सी के दशक तक शीत युद्ध का असर ओलंपिक खेलों में दिखने लगा. जो देश एक दूसरे से वास्तविक लड़ाई नहीं लड़ रहे थे, वो एक दूसरे पर खेलों के ज़रिए हावी होने की कोशिश कर रहे थे.

खेलों में राजनीति के प्रवेश का चलन 1956 के मेलबर्न ओलंपिक से हुआ, जब सोवियत संघ और हंगरी के बीच हुए वॉटरपोलो मैच में दोनों देशों के खिलाड़ी आपस में इतना लड़े कि ख़ूनोख़ून हो गए.

इस मैच को 'ब्लड इन द वॉटर' की संज्ञा दी गई. उससे पहले सोवियत संघ ने हंगरी में अपनी सेनाएँ भेज दी थीं. इन्हीं खेलों में इसराइल की नीतियों के ख़िलाफ़ अपना विरोध प्रकट करने के लिए अरब देशों ने खेलों का बहिष्कार किया.

वर्ष 1976 में न्यूज़ीलैंड के अपने देश की रग्बी टीम को दक्षिण अफ़्रीका का दौरा करने की अनुमति दिए जाने के विरोध में अफ़्रीकी देशों ने मांट्रियल ओलंपिक का बॉयकॉट किया.

1980 में सोवियत संघ के अफ़गानिस्तान में अपनी सेना भेजने के विरोध में लगभग 65 पश्चिमी और अमेरिका के मित्र देशों ने ओलंपिक खेलों का बहिष्कार किया. 12 साम्यवादी देशों ने 1984 के लॉस एंजेलेस खेलों का बहिष्कार कर इसका हिसाब बराबर किया.

लंदन खेलों में क्रिकेट ओलंपिक पर भारी पड़ा

1948 में लंदन में हुए ओलंपिक खेल चूँकि दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद हो रहे थे, इसलिए आयोजकों के पास धन की बहुत कमी थी. इन खेलों को 'ऑस्टेरिटी गेम्स' की संज्ञा दी गई.

आयोजन समिति ने ऐलान किया कि वो ओलंपिक में भाग लेने वाले खिलाड़ियों को साबुन तो उपलब्ध करा देगी, लेकिन उन्हें तौलिए अपने घर से लाने होंगे.

ये बात आज शायद सुन कर अजीबी लगे कि स्पर्धा के बाद इस्तेमाल की गई फुटबॉल, बास्केटबॉल और दूसरे खेल उपकरणों की नीलामी की जाती थी, जिससे कुछ धन अर्जित किया जा सके. लंदन में इतने बड़े खेल आयोजन के बावजूद दर्शकों की रुचि डॉन ब्रेडमैन के इंग्लैंड में आख़िरी टेस्ट मैच देखने में ज़्यादा थी.

लंदन ओलंपिक
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लंदन ओलंपिक

दक्षिण अफ़्रीका को किया गया खेलों से बाहर

1964 के टोक्यो ओलंपिक में दक्षिण अफ़्रीका को उसकी नस्लभेद की नीति के कारण ओलंपिक खेलों से प्रतिबंधित कर दिया गया. 1992 के बार्सिलोना ओलंपिक में जाकर दक्षिण अफ़्रीका की ओलंपिक खेलों में वापसी हुई.

इस बीच दक्षिण अफ़्रीका के जो खिलाड़ी ओलंपिक खेलों में भाग लेना चाहते थे, उन्होंने दूसरे देशों की नागरिकता ले कर इन खेलों में भाग लिया.

1984 के 3000 मीटर स्टीपलचेज़ प्रतियोगिता में दक्षिण अफ़्रीका की एथलीट ज़ोला बड ने ब्रिटेन की नागरिकता लेकर खेलों में भाग लिया था. ये अलग बात है कि वो कोई पदक नहीं जीत पाईं थीं, क्योंकि उनकी एक दूसरी एथलीट से टक्कर हो गई थी, जिसके कारण वो गिर गईं थी.

ज़ोला बड ने ब्रिटेन की तरफ़ से भाग लिया
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ज़ोला बड ने ब्रिटेन की तरफ़ से भाग लिया

मेक्सिको में काले खिलाड़ियों का 'ब्लैक पॉवर सैल्यूट'

साठ के दशक से ही ओलंपिक खेलों का पूरी दुनिया में व्यापक स्तर पर टेलीविज़न प्रसारण शुरू हो गया था. 1968 के मेक्सिकों खेलों में दो काले अमेरिकी एथलीटों टॉमी सिमथ और जॉन कार्लोस ने 200 मीटर की दौड़ जीतने के बाद विनर्स पोडियम पर 'ब्लैक पॉवर सैल्यूट' किया.

उन्होंने अमेरिका में काले लोगों की बराबरी के लिए हो रहे संघर्ष के प्रति अपना समर्थन जताने के लिए ऐसा किया. वह उस समय अमेरिका में एक बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया था.

ब्लैक पॉवर सेल्यूट करते टॉमी सिमथ और जॉन कार्लोस
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ब्लैक पॉवर सेल्यूट करते टॉमी सिमथ और जॉन कार्लोस

तीस वर्ष बाद अपनी आत्मकथा साएलेंट जेस्चर में टॉमी स्मिथ ने सफ़ाई दी कि उनका वो क़दम 'ब्लैक पॉवर सेल्यूट' न होकर मानवाधिकार सैल्यूट था. इस स्पर्धा में रजत पदक जीतने वाले आस्ट्रेलियाई एथलीट पीटर नॉरमन ने भी उनके समर्थन में अपनी बाँह पर काली पट्टी बाँधी थी. इन दो अमेरिकी धावकों के इस क़दम को दर्शकों ने पसंद नहीं किया.

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने उन पर प्रतिबंध लगाया और उन्हें वापस अमेरिका भेज दिया गया. लेकिन ओलंपिक समिति ने उनसे उनके पदक नहीं छीने. 2006 में जब इन एथलीटों का समर्थन करने वाले आस्ट्रेलियाई एथलीट पीटर नॉर्मन का निधन हुआ, तो इन अमेरिकी एथलीटों ने जा कर उनके ताबूत को कंधा दिया.

म्यूनिख में इसराली खिलाड़ियों पर हमला

1972 के म्यूनिख ओलंपिक में फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने ओलंपिक विलेज पर हमला कर इसराइली टीम के सदस्यों को बंधक बना लिया. ये चरमपंथी एथलीटों के वेश में ओलंपिक गाँव में घुसे थे. जब जर्मन सुरक्षा बलों ने इन एथलीटों को छुड़ाने की कोशिश की, तो इसराइली दल के 11 सदस्य, 5 चरमपंथियों और एक सुरक्षाकर्मी की मौत हो गई.

म्यूनिख
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म्यूनिख

इसके बाद से ओलंपिक खेलों में सुरक्षा व्यवस्था बहुत कड़ी कर दी गई. इसके बाद जिन-जिन देशों को ओलंपिक खेलों की मेज़बानी मिली, वहाँ के राजनीतिक हालातों को देख कर उनकी मेज़बानी का विरोध किया गया.

उदाहरण के लिए जब 2008 में चीन को ओलंपिक खेल मिले, तो कई लोगों ने चीन के मानवाधिकार रिकॉर्ड की आलोचना की. दुनिया में जहाँ-जहाँ भी ओलंपिक मशाल गई, उसके ख़िलाफ़ चीन विरोधियों ने न सिर्फ़ प्रदर्शन किया, बल्कि कई जगह मशाल को छीनने की कोशिश भी हुई.

ओलंपिक मेज़बानी के लिए रिश्वत के आरोप

90 के दशक में इस बात पर बहुत विवाद पैदा हो गया, जब पता चला कि ओलंपिक खेलों की मेज़बानी के लिए कुछ सदस्य वोट देने के बदले रिश्वत ले रहे थे.

रिश्वत ही नहीं ओलंपिक खेलों में मैच फ़िक्सिंग के भी आरोप सामने आए. मोएरा बटरफ़ील्ड ने अपनी किताब 'ओलंपिक स्कैंडल' में लिखा, "1988 के सोल ओलंपिक खेलों में वेल्टरवेट मुक्केबाज़ी के फ़ाइनल में अमेरिकी मुक्केबाज़ रॉय जोन्स दक्षिण कोरियाई मुक्केबाज़ पार्क सी हुन से पराजित हो गए. हालाँकि दर्शक और बॉक्सिंग के पंडितों ने साफ़ देखा कि अमेरिकी मुक्केबाज़ कोरियाई मुक्केबाज़ से बेहतर था और उसकी जीत निश्चित दिखाई दे रही थी. बाद में कुछ खोजी पत्रकारों ने पता लगाया कि एक दक्षिण कोरियाई अरबपति ने कोरियाई मुक्केबाज़ को जितवाने के लिए एक जज को रिश्वत दी थी. बाद में एक जज से स्वीकार भी किया कि उसने इस मुक़ाबले की स्कोरिंग में कुछ ग़लती की थी."

प्रतिबंधित दवाओं का बढ़ता चलन

प्रतिबंधित दवाओं के सेवन ने भी कई ओलंपिक प्रतियोगियों को शर्मसार किया. इसका पहला उदाहरण 1904 के ओलंपिक खेलों में मिला, जब मैराथन दौड़ जीतने वाले अमेरिकी एथलीट टॉमस हिक्स ने दौड़ से पहले स्ट्रिचनीन का इंजेक्शन लिया और दौड़ के दौरान ब्राँडी भी पी.

1920 के एंटवर्प ओलंपिक खेलों में 100 मीटर की दौड़ से पहले एक अमरीकी एथलीट चार्ली पैडक ने शेरी और कच्चे अंडे का मिश्रण पिया और दौड़ जीती.

1960 के रोम ओलंपिक खेलों में डेनमार्क के एक साइकलिस्ट नड एनमार्क जेन्सन 100 किलोमीटर की दौड़ में साइकिल चलाते-चलाते गिर गए और उनकी मौत हो गई. जब उनका पोस्टमार्टम किया गया, तो मौत का कारण लू लगना बताया गया.

लेकिन बाद में पोस्टमार्टम करने वाले एक डॉक्टर ने दावा किया था कि उनके शरीर में प्रतिबंधित दवा एम्फ़ेटेमाइन के अंश पाए गए थे.

डेनमार्क का एक साइकलिस्ट नड एनमार्क जेन्सन 100 किलोमीटर की दौड़ में साइकिल चलाते चलाते गिर गया और उसकी मौत हो गई
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डेनमार्क का एक साइकलिस्ट नड एनमार्क जेन्सन 100 किलोमीटर की दौड़ में साइकिल चलाते चलाते गिर गया और उसकी मौत हो गई

बेन जॉन्सन पर प्रतिबंध

1968 में स्वीडिश एथलीट हाँस गनर लिजेनवाल को पेंटाथलन स्पर्धा से पहले दो पाइंट बियर पीने के आरोप में डिसक्वालिफ़ाई किया गया था.

1972 ओलंपिक में पहली बार अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने प्रतिबंधित दवाओं के सेवन को रोकने के लिए ड्रग परीक्षण शुरू किए

1988 के सोल ओलंपिक में कनाडा के बेन जॉन्सन ने 100 मीटर दौड़ में न सिर्फ़ स्वर्ण पदक जीता, बल्कि विश्व रिकार्ड भी बनाया. लेकिन उनके मूत्र परीक्षण से पता चला कि उन्होंने स्टेरॉयड्स का सेवन किया है. उनसे न सिर्फ़ उनके पदक छीने गए, बल्कि तुरंत उनके देश रवाना कर दिया गया.

बेन जॉन्सन
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बेन जॉन्सन

2000 के दशक में कुछ चोटी के अमेरिकी एथलीटों ने प्रदर्शन बेहतर करने वाली दवाएँ लेने की बात स्वीकार की. 2000 के सिडनी ओलंपिक खेलों में तीन स्वर्ण और दो काँस्य पदक जीतने वाली मारियन जोंस के पदक ड्रग परीक्षण के बाद उनसे छीन लिए गए और उनके बीजिंग ओलंपिक में भाग लेने पर रोक लगा दी गई.

ड्रग्स
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ड्रग्स

2008 के बीजिंग ओलंपिक खेलों में 15 एथलीट प्रतिबंधित दवाओं का सेवन करते पकड़े गए. यहाँ तक कि घुड़सवारी स्पर्धा में कुछ घोड़ों तक को प्रतिबंधित दवाएँ पिलाई गई थीं. 2012 के लंदन ओलंपिक में भी ये सिलसिला रुका नहीं. रूस के 41 खिलाड़ी प्रतिबंधित दवाओं का इस्तेमाल करते हुए पकड़े गए.

नरसिंह यादव
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नरसिंह यादव

2016 के रियो ओलंपिक में जब रूस ने 389 सदस्यीय दल का ऐलान किया, तो अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने इनमें से सिर्फ़ 278 नामों को मंज़ूरी दी और 111 रूसी खिलाड़ियों को ओलंपिक खेलों में भाग नहीं लेने दिया गया.

इसके अलावा आठ प्रतियोगियों को स्पर्धा से पहले हुए ड्रग टेस्ट में फ़ेल होने के कारण भाग नहीं लेने दिया गया, जिनमें भारत के पहलवान नरसिंह यादव भी थे.

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English summary
Olympic Games that have scandals and Controversies
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