ओडिशा: क्या फणी तूफान की तबाही से उबर पाएगा पुरी?
राकेश की मौत का गवाह बस वो टूटा मकान है या पास की छत का दरका हुआ मलबा - जो उसपर तब गिरा जब वो तीन अप्रैल को घर में सो रहा था. तीन अप्रैल को ही नौ साल की पायल के सर पर छत गिर पड़ी थी.
"सवेरे 7.30 का वक़्त था, हम खाना खाने बैठे थे कि अचानक हवा आई और छत की एस्बेस्टस को उड़ा दिया, उसकी मां को चोट लगी, मुझे भी पैर और हाथ में चोट आई, मेरी बेटी को सर में पीछे चोट आई."
पायल के पिता, कुओपदा गांव के शेषदेव नायक ये कहते कहते फूट-फूटकर रोने लगते हैं.
सिसकती आवाज़ में कहते हैं कि वो अपना दुख भी नहीं बता पाई. डॉक्टर ने जब बताया कि वो मर चुकी है तो मैं सुनने की हालत में भी नहीं था.
तीन दिन तक डॉक्टर की मदद नहीं मिली
तूफ़ान ने सड़कों को जाम कर दिया था, दिमाग़ी तौर पर कमज़ोर पायल को तीन दिनों तक किसी तरह की डॉक्टरी मदद नहीं मिल पाई.
ओडिशा में तूफ़ान की चपेट में आकर हुई 64 मौतों में से 39 पुरी में हुईं हैं.
शहर में तूफ़ान से हुई बर्बादी का नज़ारा हर तरफ़ साफ़ नज़र आता है. सड़क पर तेज़ हवाओं ने बसों को करवट करके पटक सा दिया हो जैसे. गाड़ियों के टूटे हुए शीशे. और, मकान जिनकी छत हवा में उड़ गए हैं.
सूबे में सालाना एक करोड़ 20 लाख पर्यटकों में से सबसे अधिक पुरी में ही आते हैं. शहर में बिजली नदारद है.
पुरी में जगन्नाथ यात्रा की तैयारियां शुरु हो चुकी हैं और इस बीच अगर ये सारे काम पूरे न हुए तो दूसरी तरह की दिक्क़तें हो सकती हैं.
नुकसान
पुरी के ज़िला कलेक्टर बलवंत सिंह कहते हैं, "ज़िले में ही 4000 बिजली के पोल को नुक़सान पहुंचा है. 23 हाई टेंशन टावर्स पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं. चार हज़ार लोगों को मूलभूत ढाँचे को सही करने के काम पर लगाया गया है."
बलवंत सिंह कहते हैं कि दो हज़ार लोगों ने काम शुरु कर दिया है.
हाई टेंशन टावर्स को हुए नुक़सान का असर राजधानी भुवनेश्वर में भी साफ़ दिखता है हालांकि वहां कुछ इलाक़ों में पावर बहाल हो गया है. लेकिन बिजली की सप्लाई बस कुछ ही घंटो के लिए ही होती है.
रेस्तरां और छोटी-छोटी दुकानें जिनमें बिजली के इस्तेमाल की ज़रूरत होती है, जैसे कोल्ड ड्रिंक की दुकानें या ग्रोसरी स्टोर्स वो अब भी बंद हैं.
ख़राब हो गया सामान सड़कों पर फेंक दिया गया है.
चिंता जताई जा रही है कि शहर में इस तरह से जमा हो रहे कचरे का असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है, या इससे महामारी भी फैल सकती है.
भुवनेश्वर और कटक जैसे शहरों में भी जो महँगे होटलों, या इस दौरान जिन होटलों के किराए बहुत महँगे हो गए थे.
भुवनेश्वर में तो होटलों के कमरे 12,000 रूपये प्रति नाइट की क़ीमत पर मिल रहे थे.
इलेक्ट्रिकल इंजीनियर एससी मिश्रा भुवनेश्वर से पुरी जानेवाली सड़क पर मज़दूरों के साथ टावर को ठीक करवाने का काम करवा रहे हैं.
उनके साथ कम से कम 50 मज़दूर किसी पोल को खड़ा करने की कोशिश में हैं, इंजीनियर मिश्रा के मुताबिक़ फ़िलहाल इमरजेंसी रेस्टोरेशन सिस्टम से चीज़ों को बहाल करने की कोशिश की जा रही है.
औपचारिक आकलन शुरु
इस तरह की ख़बरें हैं कि पुरी में बिजली बहाल करने में कम से कम महीने भर का समय लगेगा.
सूबे में तूफ़ान से हुई तबाही का औपचारिक आकलन शुरु हो गया है.
सरकारी अधिकारी तूफ़ान से प्रभावित 14 ज़िलों में घर-घर जाकर जान-माल के नुक़सान का सर्वे करेंगे जिसके आधार पर लोगों को मुआवज़ा या मदद मुहैया करवाई जाएगी.
मुख्य मंत्री नवीन पटनायक ने केंद्र को लिखी एक चिट्ठी में कहा है कि हालांकि सर्वे का काम जल्द ही ख़त्म हो जाएगा लेकिन प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कम से कम पांच लाख घरों के बनाये जाने का काम जल्द से जल्द शुरु किया जाना चाहिए.
हज़ारों पेड़ उखड़े
200 किलोमीटर से तेज़ रफ़्तार से आए तूफ़ान ने पेड़ों के पत्तों को जैसे नोंचकर फ़ेंक दिया हो. जड़ से उखड़े हज़ारों पेड़ आख़िरी सांसे गिन रहे हैं.
भुवनेश्वर में 75 सालों पुराना बोधिवृक्ष भी जड़ से उखड़कर गिर पड़ा है. हालाँकि उसे लगाने की कोशिशें जारी हैं.
बौद्ध भिक्षु मनते धम्मालोक बताते हैं कि भगवान बुद्ध ने ख़ुद इसकी पूजा की थी. वे इस पेड़ के इतिहास के बारे में कहते हैं कि सम्राट अशोक की बेटी संघमित्रा इस पेड़ के बीज को गया से श्रीलंका ले गई थीं, जहां से 13 मई 1957 में यहां लाकर लगाया गया.
'पिछले दो माह से राशन नहीं मिला'
किसान तूफ़ान से बच गई फ़सल को बचाने की हर कोशिश कर रहे हैं - भीग गए धान के पौधों को सूखने के लिए सड़कों पर फैला दिया गया है और उन्हें जल्दी-जल्दी तैयार करने की कोशिश हो रही है.
बर्बादी के अलावा जो एक और चीज़ हर जगह नज़र आती हैं वो है राशन की दुकान में लगी लंबी लाइनें. और लोगों को ढेरों शिकायते हैं.
मंगलपुर ग्राम पंचायत के प्रफुल्ल कुमार साहू कहते हैं कि किसी तरह की मदद से अलग से नहीं मिली है. बल्कि लोगों को पिछले दो माह से राशन नहीं मिला था वहीं दिया जा रहा है.
अजय भी प्रफुल की बातों की हामी भरते हैं.
दूसरे कई गांव के दौरों में हमने पाया कि वहां लोगों को प्रति व्यक्ति एक किलोग्राम चावल मिला था.
पोलिथीन का भी वही हाल है. कुछ गांवों में ये ज़रूरत से कम पहुंचा है तो जिन्हें इन सामग्रियों को बांटना है वो इस डर से ऐसा नहीं कर रहे कि इससे गांव में अफ़रातफ़री या हंगामा हो जाएगा.
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