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भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर के पास खुदाई में मिला 10वीं शताब्दी का मंदिर, देखिए तस्वीरें

10th Century temple:भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) को ओडिशा की राजधानी में प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर के नजदीक एक बहुत ही प्राचीन मंदिर का ढांचा मिला है। मंदिर का यह ढांचा 10-11वीं शताब्दी का बताया जा रहा है। दरअसल, लिंगराज मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए एकमारा क्षेत्र हेरिटेज प्रोजेक्ट के तहत गुरुवार खुदाई का काम चल रहा था, उसी दौरान जमीन के नीचे पूरा पत्थर का ढांचा मिला है। हालांकि, अभी बहुत ही कम हिस्से की खुदाई हुई है और अभी कम से कम 10 दिन इसपर और काम किया जाना है,लेकिन जमीन के अंदर से जो ढांचा बाहर आया है, उससे स्पष्ट हो रहा है कि वहां पर किसी भव्य प्राचीन मंदिर के अवशेष दबे पड़े हैं।

लिंगराज मंदिर से भी पुराना मंदिर!

लिंगराज मंदिर से भी पुराना मंदिर!

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) को लिंगराज मंदिर के नजदीक यह ढांचा तब मिला है, जब वह सौंदर्यीकरण के तहत सरकार की ओर से सुका सारी मंदिर के नजदीक खुदाई का काम जारी था। जमीन के अंदर मिले ढांचे की खुदाई का काम अब एएसआई की भुवनेश्वर सर्किल की टीम कर रही है। एएसआई का अनुमान है कि सारी मंदिर परिसर पंचयत्ना मॉडल पर बना है,जहां मुख्य मंदिर के चारों ओर चार मंदिर मौजूद हैं। खुदाई में एक शिवलिंग मिलने की भी बात सामने आ रही है और मंदिर के आधार पर सुंदर नक्काशी की हुई है।

सोम वंश काल का मंदिर होने का अनुमान

सोम वंश काल का मंदिर होने का अनुमान

एएसआई के अधिकारी अरुण मलिक के मुताबिक, 'अब तक हमें दीवार का एक हिस्सा मिला है,जिसपर कुछ सुंदर नक्काशीदार मूर्तियां बनी हुई हैं, जो पहले गिर चुके संस्कृत कॉलेज परिसर अवशेषों नीचे दब हुए थे। दीवार के दूसरी ओर के हिस्से की खुदाई की जा रही है, पूरा ढांचा को बाहर निकालने में 10 दिन और लगेंगे। ' जानकारों को लग रहा है कि 10वीं सदी के ये अवशेष सोम वंश के शासनकाल का बना हुआ है।

वैज्ञानिक तरीके से खुदाई का काम जारी

वैज्ञानिक तरीके से खुदाई का काम जारी

इस अति प्राचीन मंदिर के ढांचे को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए पुरातत्व विभाग वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है, ताकि वो अब किसी तरह से और क्षतिग्रस्त ना हों। क्योंकि, खुदाई में लगे लोगों को आशंका है कि सौंदर्यीकरण के काम के दौरान भारी मशीनों के इस्तेमाल से अवशेष का कुछ हिस्सा हो सकता है कि पहले ही बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका हो।

सौंदर्यीकरण के नाम पर हुआ काफी नुकसान?

सौंदर्यीकरण के नाम पर हुआ काफी नुकसान?

बता दें कि पिछले कुछ महीनों में सुकरा-सारी मंदिर परिसर के आसपास के कई हिस्सों को सौंदर्यीकरण के नाम पर गिरा दिया गया है। जमीन के नीचे जो प्राचीन मंदिर के अवशेष मिले हैं, वह सारी मंदिर के उत्तर-पश्चिम कोने पर है। दो छोटे ढांचे और निकले हैं, जिसके बारे में माना जा रहा है कि वह भी मंदिर के ही हिस्से हैं।

क्या मंदिर का ऊपरी हिस्सा सुरक्षित बचा है?

क्या मंदिर का ऊपरी हिस्सा सुरक्षित बचा है?

एएसआई के अधिकारियों ने बताया है कि खुदाई में मिले मंदिर के अवशेष पास के ब्रह्मेश्वर और चित्रकारिनी मंदिरों की तरह ही है। अब इनकी चिंता यही है कि जितने बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की कार्रवाई पहले हुई है, कहीं ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा ही तबाह ना हो गया हो? सबसे बड़ी आशंका है कि प्राचीन मंदिर का ऊपरी हिस्सा ही ना टूट गया हो और सिर्फ आधार के अवशेष ही बचे हों।

मंदिर मालिनी के तौर पर थी भुवनेश्वर की पहचान

मंदिर मालिनी के तौर पर थी भुवनेश्वर की पहचान

इतिहासकार पद्मलोचन मिश्रा बताते हैं, 'भुवनेश्वर को मंदिर मालिनी के तौर पर जाना जाता था, क्योंकि यहां पर अलग-अलग तरीके के 1,000 से ज्यादा मंदिर थे। आज की तारीख में इनमें से ज्यादातर अतिक्रमण के नीचे दब चुके हैं। ' जब वहां जमीन के नीचे इतने पौराणिक अवशेष मौजूद होने की उम्मीद है, सरकार की ओर से सौंदर्यीकरण के नाम पर आंख मूंद कर तोड़फोड़ की कार्रवाई पर भी सवाल उठ रहे हैं। (तस्वीरें साभार- कलिंगा टीवी)

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