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New Guidelines: अब किसी भी निर्भया को इंसाफ का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा, जानिए वजह?

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बेंगलुरू। राजधानी दिल्ली में चलती बस में 23 वर्षी पैरा मेडिकल छात्रा के साथ गैंगरेप और मर्डर के दोषी चार दोषियों को अभी तक फांसी पर नहीं चढ़ाया जा सका है। चारों दोषी पिछले 3 वर्षों से उसी कानून को टूल बनाकर लगातार फांसी की सजा का टालते आ रहे हैं, जिससे इंसाफ के लिए पिछले 7 वर्षों से दर-दर भटक रहा परिवार टूट गया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइन से निर्भया ही नहीं, दूसरी निर्भयाओं के फांसी के सजा पाए दोषी फांसी टालने में अधिक दिन तक कामयाब नहीं हो पाएंगे।

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वरना कभी पुनर्विचार याचिका के नाम पर, कभी क्यूरेटिव याचिका के नाम पर, कभी दया याचिका के नाम पर और फिर खारिज हो चुके दया याचिका को फिर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर निर्भया के चारो दोषियों ने पिछले तीन वर्षों से कानून का ही नहीं, बल्कि उसके मां-बाप के धैर्य का मजाक उड़ाते आ रहे हैं, लेकिन अब कानूनी रूप से सजा के हकदार बनाए गए चारो दोषी और उनके वकील लूप होल्स की मदद से फांसी की सजा का मजाक नहीं बना पाएंगे।

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यह केंद्र की मोदी सरकार के पहल से संभव हुआ है। निर्भया के चारो दोषियों के फांसी से बचने की हरकतों से तंग आकर केंद्र सरकार ने फांसी की सजा के मामले में सुप्रीम कोर्ट से नई गाइड लाइन जारी की गुजारिश की थी और गत 12 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा पाने वाले दोषियों की सजा पर अमल करने के लिए नई गाइडलाइन जारी की है।

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नई गाइडलान में मौत की सजा के खिलाफ अपीलों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जो दिशा-निर्देश तय किए हैं, उसके मुताबिक अब फांसी के सजा पाए दोषियों की अपील की सुनवाई महज 6 महीने के अंदर निपटाना होगा। यानी भविष्य में फांसी की सजा पाने वाला दोषी का 6 महीने बाद फांसी पर लटकना तय हो गया है, जिसके बाद कोई भी लेकिन, परंतु और किन्तु पर विचार नहीं किया जाएगा।

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गौरतलब है 17 दिसंबर, 2017 वह तारीख थी जब सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के खिलाफ चारों दोषियों की ओर दायर पहली पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन उसके बाद पहले राजनीतिक वजहों से दोषियों की फांसी पर चढ़ाने की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई और दोषी पूरे दो वर्ष तक बिना किसी अड़चन के जेल में मजा करते रहे।

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क्योंकि दिल्ली की केजरीवाल सरकार पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद दोषियों की फांसी देने की प्रक्रिया शुरू करने के बजाय सो गई और ऐसी सोई कि पूरे दो वर्ष बाद जाकर जागी, लेकिन इसी अंतराल मे ऊंघते हुए ही दिल्ली सीएम केजरीवाल ने दिल्ली सरकार के अधी जेल विभाग के जेल मैनुअल में संशोधन कराने में सफल रही।

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सोचिए, दिल्ली सरकार सोते और ऊंघते हुए काम करती है। जैल मैनु्अल में बदलाव ही वह कड़ी थी, जिसकी मदद से निर्भया के दोषी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल फांसी को टालने में अब तक सफल हुए हैं। केजरीवाल सरकार को जेल मैनुअल में बदलाव के लिए केजरीवाल सरकार को दिल्ली की हाईकोर्ट बुरी तरह से फटकार चुकी है और फांसी में देरी के लिए जेल मैनुअल को सीधे-सीधे जिम्मेदार भी ठहरा चुकी है।

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यही नहीं, दिल्ली में आम आदमी सरकार की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने केजरीवाल पर निर्भया के दोषियों को बचाने का आरोप लगाया गया। निर्भया के माता आशा देवी और पिता बद्रीनाथ सिंह ने भी दोषियों की फांसी में देरी के लिए केजरीवाल को आड़ों हाथों लिया।

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दिल्ली में हो रहा यह तमाशा दिल्ली में बैठी दिल्ली की जनता भी देखती और सुनती रही, लेकिन जिस निर्भया की घटना के विरोध में उमड़े आंदोलन से जन्में केजरीवाल को उसने दिल्ली के मुखिया बनाया था, उसे एक बार सत्ता की चाभी सौंपकर दिल्ली में महिला सुरक्षा के मुद्दे को एक बार फिर मामूली बना दिया गया।

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दिल्ली सरकार द्वारा संशोधित नए जेल मैनुअल के नए नियम नंबर 854 के मुताबिक अगर एक केस में एक से ज्यादा दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई हो और उनमें सिर्फ एक दया याचिका दायर करता है तो उसकी याचिका पर फैसला आने तक सभी दोषियों की फांसी टाल दी जाएगी।

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दिल्ली की जेलों में बंद निर्भया के चारो दोषियों पर भी यह नया नियम लागू होता है, जिसके चलते चारो दोषी लगातार डेथ वारेंट को कैंसिल कराने में सफल होते रहे, क्योंकि चारो दोषी बारी-बारी से अपने कानूनी विकल्पों को उपयोग कर रहे थे। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने पहला डेथ वारंट 22 जनवरी और दूसरा डेथ वारेंट 1 फरवरी को जारी किया था, लेकिन दोनों पर अमल नहीं किया जा सका है।

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लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जारी नए दिशा-निर्देश में मौत की सजा के मामले में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ छह माह के भीतर अपील पर सुनवाई तय कर दी है। यानी अब मौत की सजा पाने के बाद कोई भी दोषी 6 महीने के अंतराल में कानूनी विकल्पों का उपयोग कर सकता है, इनमें पुनर्विचार याचिका, क्यूरेटिव याचिका और दया याचिका सभी शामिल हैं, जिसके बाद उसका फांसी पर चढ़ना तय है।

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सुप्रीम कोर्ट के सर्कुलर में कहा गया है कि किसी मामले में जब हाईकोर्ट मौत की सजा की पुष्टि करता है या उसे बरकरार रखता है और अगर सुप्रीम कोर्ट भी उस पर सुनवाई की सहमति जताता है तो आपराधिक अपील पर सहमति की तारीख से छह माह के भीतर मामले को शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कर दिया जाएगा, भले ही यह अपील तैयार हो पाई हो या नहीं। यह निः संदेह इंसाफ की राह देख रहे पीड़ित और उसके परिवार के लिए राहत की बात है।

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गाइडलाइन के मुताबिक, मौत की सजा के मामले में जैसे ही सुप्रीम कोर्ट विशेष अनुमति याचिका दाखिल की जाती है, तो सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री मामले के सूचीबद्ध होने की सूचना मौत की सजा सुनाने वाली अदालत को देगी। इसके 60 दिनों के भीतर केस संबंधी सारा मूल रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट भेजा जाएगा या जो समय अदालत तय करे उस अवधि में ये रिकॉर्ड देने होंगे। अगर इस संबंध में कोई अतिरिक्त दस्तावेज या स्थानीय भाषा के दस्तावेजों का अनुवाद देना है तो वह भी देना होगा।

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सर्कुलर यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने की सूचना के बाद रजिस्ट्री पक्षकारों को अतिरिक्त दस्तावेज कोर्ट में देने के लिए 30 दिन का और समय दे सकती है। अगर तय समय में अतिरिक्त दस्तावेज देने की यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती है तो मामले को रजिस्ट्रार के पास जाने से पहले जज के चैंबर में सूचीबद्ध किया जाएगा और फिर जज इस संबंध में आदेश जारी करेंगे।

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उल्लेखनीय है निर्भया के गुनहगारों की फांसी में हो रही देरी को देखते हुए गत 22 जनवरी को केंद्र की मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में मांग की थी कि मौत की सजा पर सुधारात्मक याचिका दाखिल करने के लिए समय-सीमा तय की जाए।

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क्योंकि मौजूदा नियमों के मुताबिक, किसी भी दोषी की कोई भी याचिका लंबित होने पर उस केस से जुड़े बाकी दोषियों को भी फांसी नहीं दी जा सकती थी, जिसका कनेक्शन वर्ष 2018 में संशोधित किए दिल्ली जेल के मैनुअल से जुड़ा है, जिसे केजरीवाल सरकार के दौरान संशोधित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी नया सर्कुलर 12 फरवरी को आया था, लेकिन यह 13 फरवरी को ही सामने आ सका।

7 वर्षों से इंसाफ के लिए निर्भया की मां सिसकती आ रही, डेथ वारेंट की तारीख बढ़ती जा रही!

22 जनवरी को फांसी पर चढ़ाने के लिए जारी हुआ था पहला डेथ वारेंट

22 जनवरी को फांसी पर चढ़ाने के लिए जारी हुआ था पहला डेथ वारेंट

18 दिसंबर, 2019 वह आखिरी तारीख थी जब सुप्रीम कोर्ट ने सभी दोषियों की अंतिम अपीलों को खारिज कर दिया और 7 जनवरी को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने 22 जनवरी को सभी दोषियों को फांसी पर चढ़ाने के लिए डेथ वारेंट जारी किया। यही वह समय था जब न्याय और कानूनी प्रक्रिया के बीच पिस रही निर्भया के मां की एक और जंग शुरू हुई।

दिल्ली की अदालत द्वारा जारी आखिरी डेथ वारेंट भी कैंसिल हो गया

दिल्ली की अदालत द्वारा जारी आखिरी डेथ वारेंट भी कैंसिल हो गया

दिल्ली के कोर्ट द्वारा जारी हुआ आखिरी डेथ वारेंट भी कैंसिल हुआ दिल्ली के कोर्ट द्वारा जारी हुआ आखिरी डेथ वारेंट भी कैंसिल हो चुका है। लगातार डेथ वारेंट क्यों कैंसिल हो रहे हैं इसका जवाब दिल्ली सरकार द्वारा संशोधित जेल मैनुअल में छिपा हुआ है। संशोधित नए जेल मैनुअल का रूल 854 कहता है कि एक केस में एक से ज्यादा दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई हो तो तब तक उनमें से किसी को फांसी पर नहीं चढ़ाया जा सकता है, जब तक कि प्रत्येक दोषी की अपील सुप्रीम कोर्ट से खारिज न हो जाए।

संशोधित जेल मैनुअल को टूल बनाकर फांसी से बचते आ रहे हैं दोषी

संशोधित जेल मैनुअल को टूल बनाकर फांसी से बचते आ रहे हैं दोषी

दिल्ली सरकार द्वारा वर्ष 2018 में संशोधित जेल मैनुअल ही वह टूल है, जिसको हथियार बनाकर निर्भया गैंगरेप और मर्डर के दोषी चारो दोषी क्रमशः अक्षय सिंह, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और मुकेश सिह मौत के साथ आंख मिचोली खेलते आ रहे हैं। आखिरी डेथ वारेंट के मुताबिक चारों दोषियों को आज यानी 1 फरवरी, 2010 की सुबह 6 बजे फांसी दिया जाना था, लेकिन दोषियों और उनके वकील के कानूनी विकल्पों के चलते दोषी अब भी फांसी से दूर हैं। फांसी टलने के बाद निर्भया के पिता बद्रीनाथ सिंह ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जी भर के कोसा। निर्भया की मां एक और बार डेथ वारेंट कैंसिल होने की खबर सुनते ही निढाल हो गई।

7 वर्षों से न्याय की आस लगाए बोझिल हुए जा रहे हैं निर्भया के मां-बाप

7 वर्षों से न्याय की आस लगाए बोझिल हुए जा रहे हैं निर्भया के मां-बाप

न्याय की आस में 7 वर्ष से अधिक इंतजार में बोझिल हुए जा रहे निर्भया के मां-बाप समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर उनकी गलती क्या है। निर्भया के पिता बद्रीनाथ सिंह और मां आशा देवी का भारतीय न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा आज भी कामय है और लड़ाई आगे भी जारी रखने का जज्बा दिखाया है, लेकिन जज्बातों का क्या, जो पिछले 7 वर्षों से छलनी हो रहे हैं। पिता बद्रीनाथ ने फांसी में हो रही देरी के लिए दिल्ली सरकार को कोसते हुए आरोप लगाया है कि निर्भया के दोषियों की फांसी में हो रही देरी के लिए सिर्फ और सिर्फ सीएम केजरीवाल जिम्मेदार हैं।

1 फरवरी को डेथ वारेंट कैंसिल हुआ तो आंखों से आंसू बह निकले

1 फरवरी को डेथ वारेंट कैंसिल हुआ तो आंखों से आंसू बह निकले

1 फरवरी को डेथ वारेंट कैंसिल हुआ तो निर्भया की मां के आंखों से आंसू बह निकले थे। निर्भया के पिता बद्रीनाथ सिंह ने कहा दिल्ली वालों से सवाल किया कि दिल्ली की महिलाएं यह समझ लें कि दिल्ली में सिर्फ बिजली और पानी ही जरूरी है, महिलाओं की सुरक्षा भी जरूरी है। अगर दिल्ली में महिलाएं सुरक्षित नहीं है, तो इसके लिए सिर्फ और सिर्फ अरविंद केजरीवाल ही जिम्मेदार हैं। वहीं, निर्भया की मां आशा देवी के जज्बे को सलाम किया जाना चाहिए, जो लड़ाई आगे भी जारी करते हुए अपने जज्बातों को काबू मे किया हुआ है। हालांकि जब 1 फरवरी को डेथ वारेंट कैंसिल हुआ तो उनकी आंखों में आंसू बह निकले।

निर्भया की मां ने कहा, सरकार को दोषियों को फांसी देनी ही होगी

निर्भया की मां ने कहा, सरकार को दोषियों को फांसी देनी ही होगी

भावुक होते हुए निर्भया के लिए इंसाफ की बाट जो रही आशा देवी ने कह कि निर्भया के दोषियों के वकील एपी सिंह ने उन्हें चुनौती देते हुए कहा है कि दोषियों को कभी भी फांसी नहीं दी जाएगी। यह एक मां की जीवटता है कि वो अभी तक नहीं टूटी और लड़ाई जारी रखने का जज्बा दिखाकर जेल में बैठ फांसी के फंदों से सांसे बचाने की कोशिश कर रहे चारों दोषियों और उसके वकील एपी सिंह की हवाईयां निकाल रहे हैं। आशा देवी ने कहा कि सरकार को दोषियों को फांसी देनी ही होगी। हालांकि हताशा उनके चेहरे पर साफ-साफ देखी जा सकती थी, जब आशा देवी ने कहा, आखिर मुजरिम जो चाहते थे वो गया है। अब तो ऐसा लग रहा है जैसे सभी लोग मुजरिमों का साथ दे रहे हैं।

मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से की थी गाइडलाइन तय करने की मांग

मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से की थी गाइडलाइन तय करने की मांग

निर्भया के गुनहगारों की फांसी में हो रही देरी को देखते हुए इस साल 22 जनवरी को केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। गृह मंत्रालय ने अपनी याचिका में यह मांग की थी कि मौत की सजा पर सुधारात्मक याचिका दाखिल करने के लिए समयसीमा तय की जाए। मौजूदा नियमों के मुताबिक, किसी भी दोषी की कोई भी याचिका लंबित होने पर उस केस से जुड़े बाकी दोषियों को भी फांसी नहीं दी जा सकती।

मौत की सजा पर अब छह महीने के भीतर अपील पर सुनवाई होगी पूरी

मौत की सजा पर अब छह महीने के भीतर अपील पर सुनवाई होगी पूरी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुक्रवार को जारी दिशा-निर्देश में मौत की सजा के मामले में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ छह माह के भीतर अपील पर सुनवाई तय कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के सर्कुलर में कहा गया है कि किसी मामले में जब हाईकोर्ट मौत की सजा की पुष्टि करता है या उसे बरकरार रखता है और अगर सुप्रीम कोर्ट भी उस पर सुनवाई की सहमति जताता है तो आपराधिक अपील पर सहमति की तारीख से छह माह के भीतर मामले को शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कर दिया जाएगा, भले ही यह अपील तैयार हो पाई हो या नहीं। यह निः संदेह इंसाफ की राह देख रहे पीड़ित और उसके परिवार के लिए राहत की बात है।

कुछ मामलों में पक्षकारों को 30 दिन की और मिल सकती है मोहलत

कुछ मामलों में पक्षकारों को 30 दिन की और मिल सकती है मोहलत

सर्कुलर में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने की सूचना के बाद रजिस्ट्री पक्षकारों को अतिरिक्त दस्तावेज कोर्ट में देने के लिए 30 दिन का और समय दे सकती है। अगर तय समय में अतिरिक्त दस्तावेज देने की यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती है तो मामले को रजिस्ट्रार के पास जाने से पहले जज के चैंबर में सूचीबद्ध किया जाएगा और फिर जज इस संबंध में आदेश जारी करेंगे। सर्कुलर 12 फरवरी को ही जारी हुआ था, जो अब सामने आया है।

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English summary
This has been made possible by the initiative of the Modi government of the Center. Fed up with the antics of Nirbhaya's execution of all the four convicts, the Central Government had requested the Supreme Court to issue a new guide line in the death penalty case and on February 12, the Supreme Court had issued a new guideline for the convicts Issued to execute the sentence.
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