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कश्मीर समस्या के लिए पंडित नेहरू ही नहीं, इंदिरा गांधी भी हैं जिम्मेदार!

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बेंगलुरू। भारत और पाकिस्तान की सियासत की कभी धुरी रही जम्मू-कश्मीर समस्या के हल होने की उम्मीद अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाने और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो अलग-अलग केंद्रशासित प्रदेश बनाने के फैसले के बाद बढ़ गई है। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों में अभी तक कश्मीर समस्या के निदान के लिए कोई ठोस प्रयास क्यों नहीं किया गया। भारत-पाकिस्तान के रूप में दो पृथक देशों के वजूद आने के बाद से जम्मू-कश्मीर पर कब्जे को लेकर पाकिस्तान भारत पर कई प्रत्यक्ष और परोक्ष युद्ध थोप चुका है, लेकिन कांग्रेसी नेतृत्व वाली कोई भी सरकार इसके हल के लिए कभी ईमानदार कोशिश करती नहीं दिखी।

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कांग्रेस नेतृत्व वाली दो सरकारों को कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए दो सुनहरे अवसर मिले थे, लेकिन दोनों सरकारों ने न केवल वो सुनहरा अवसर को गंवाया बल्कि समस्या को नासुर बना दिया। पिछले 72 वर्षों से नासुर की भारत मां की छाती पल रहे कश्मीर समस्या पर पहली बार प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार ने कड़ा फैसला लिया और जम्मू-कश्मीर राज्य से संसद से प्रावधानित अस्थायी अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाकर हिंदुस्तान को गौरान्वित होने का मौका दिया।

पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की ढुलमुल नीति और अदूरदर्शिता कश्मीर समस्या की जननी थी, यह अभी तक इसलिए अनसुलझी रह गई, क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को पाकिस्तानी कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना से अपनी गहरी दोस्ती पर भरोसा था। जिन्ना ने नेहरू की भावुक दोस्ती और परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए 22 अक्टूबर, 1947 को कबाईली लुटेरों के भेष में पाकिस्तानी सेना को कश्मीर में भेजकर धरती के स्वर्ग कश्मीर में कत्लेआम मचा दिया और वर्तमान के पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जा कर लिया। बात फिर भी बन जाती, लेकिन पंडित नेहरू की अदूरदर्शिता ने जब कश्मीर समस्या को नासुर में बदल डाला जब 31 दिसंबर, 1949 को पंडित नेहरू यूएनओ पहुंच गए।

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कश्मीर समस्या के निदान का दूसरा अवसर पूर्व प्रधानमंत्री और आयरन लेडी इंदिरा गांधी को भी मिला था। वर्ष 1971 में पूरे कश्मीर पर कब्जे के लिए पाकिस्तान ने पूरे सैन्य बल के साथ हमला किया। भारतीय सेना के अदम्य साहस के आगे पाकिस्तान को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। यही नहीं, भारतीय सेना के आगे पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों ने आत्म समर्पण कर दिया था।

इसी समय पूर्वी पाकिस्तान से टूटकर बांग्लादेश नामक एक नया और स्वतंत्र देश भी बना। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चाहती तो पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों को छोड़ने के बदले में हमेशा-हमेशा के लिए पाकिस्तान पर दवाब बना सकती थी और पाकिस्तान के कब्जे से पाक अधिकृत कश्मीर छुड़ा सकती थीं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

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इंदिरा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू की अदूरदर्शिता और भावुक फैसलों की देन थी कि कश्मीर समस्या नासुर की तरह भारत की छाती पर बनी रही है। इंदिरा गांधी चाहती तो जुल्फिकार अली भुट्टों को घुटनों पर ले आतीं और पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जे के लिए पाकिस्तान पर दवाब बना सकती थीं। लेकिन इंदिरा गांधी जुल्फिकार अली भुट्टो के बहकाव में आ गईं और भारतीय सेना के आगे आत्म समर्पण करने वाली एक लाख पाकिस्तान सेना को यूं ही जाने दिया।

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1971 तक पाकिस्तान पूरे कश्मीर पर कब्जे के लिए तीन बार भारत पर हमला कर चुका था और तीनों बार पाकिस्तान को बुरी हार का सामना करना पड़ा। पाकिस्तान समझ चुका था कि प्रत्यक्ष युद्ध में पाकिस्तान भारत के साथ जीत नहीं सकता है इसलिए कश्मीर हथियाने के लिए उसने परोक्ष युद्ध यानी गुरिल्ला युद्ध शुरू किया।

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इसी दौरान उसने जेहादी तैयार किए और भारत को अस्त-व्यस्त करने के लिए हिंदुस्तान में आतंकवादी हमले करवाने शुरू किए। दोनों देशों के अंतर्राष्ट्रीय सरहद से आतंकी कश्मीर में भेजने शुरू किए। कश्मीर में अलगाववादी खड़े किए और पंजाब को अस्थिर करने के प्रयास किए।

इसी दौरान पाकिस्तान ने पंजाब में खालिस्तानी मूव का आगाज किया। अमृतसर स्वर्ण मंदिर पर आतंकी हमला और आतंकियों के सफाए के लिए भारत सरकार द्वारा ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया, जिसका बदला लेने के लिए 31 अक्टूबर, वर्ष 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई।

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इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भारत में अस्थिरता को माहौल हो गया। अनुभवहीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भूमिका सबसे अधिक खतरनाक थी, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्होंने सिख नर संहार को जायज ठहराने वाले बयान दिए। भारत की अस्थिरता का लाभ उठाकर पाकिस्तान ने एक नए तरह की युद्ध रणनीति तैयार कर ली।

90 के दशक में पूरे कश्मीर पर कब्जे पाने के सपने को बेंचने के लिए पाकिस्तानी हुक्मरानों ने परोक्ष युद्ध का नया प्रारुप तैयार कर लिया था। पाकिस्तानी हुक्मरानों ने इस युद्ध का नामकरण वॉर ऑफ लो इंटेंसिटी किया था। यह गुरिल्ला युद्ध का आधुनिकी रूप था।

पूरे कश्मीर पर कब्जे करने के सपने बेचकर सत्ता में पहुंचने वाले पाकिस्तानी हुक्मरानों की तरह कांग्रेस पार्टी भी पूरे कश्मीर को भारत का अभिन्न बताकर सत्तासीन होती रही। सत्ता में बने रहने के लिए वोट, गठजोड़ और ढुलमुल रवैये के कारण कश्मीर समस्या के समाधान के लिए कोई ऐसा प्रयास नहीं किया जिससे कांग्रेस की पकड़ कुर्सी पर कमजोर हो।

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इस बीच वर्ष 1999 में कारगिल की लड़ाई जरूर लड़ी, जिसमें उसे एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी, लेकिन कारगिल की लड़ाई भी उसके गुरिल्ला युद्ध के आधुनिक संस्करण से अधिक कुछ नहीं था, क्योंकि कश्मीर को अशांत करने के लिए पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई की योजना का यह एक हिस्सा मात्र था।

आतंकवाद और जेहाद का सहारा लेकर पाकिस्तान ने पूरे कश्मीर से 7 लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों को उनके घर से बाहर निकाला। इस दौरान हजारों कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम भी किया गया। लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने कश्मीर समस्या के समस्या के निदान के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया।

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गृहमंत्री अमित शाह अब जब यह कहते हैं कि कश्मीर समस्या के लिए पंडित नेहरू जिम्मेदार हैं तो उनको इसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी जोड़कर देखना चाहिए। क्योंकि 1949 में जो गलती पंडित नेहरू ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध विराम की घोषणा करके और मामले के निपटारे के लिए यूएनओ जाकर की थी। वहीं गलती पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वर्ष 1971 की भारत-पाकिस्तान लड़ाई के दौरान आत्म समर्पण करने वाले एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों को छोड़कर की थी। इसका खामियाजा भारत वर्तमान में भी भोग रहा है।

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English summary
Home minister amit shah earlier blam India first prime minister Pandit Jawahar Lal nehru for Kashmir issue.He blamed that Nehru UNO step was wrong.
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