• search

नोएडा ख़ुदकुशी मामला: कहां, किससे हुई चूक

Subscribe to Oneindia Hindi
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS
For Daily Alerts

    दिल्ली के प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाली एक छात्रा ने खुदकुशी कर ली है.

    नोएडा ख़ुदकुशी मामला: कहां, किससे हुई चूक

    छात्रा 9वीं क्लास में पढ़ती थी और इस साल सोशल स्टडी और साइंस में उसके नंबर कम आए थे.

    छात्रा के परिवार का आरोप है कि स्कूल के टीचर ने उनकी बेटी के साथ बुरा व्यवहार किया. नंबर कम आने पर उसे ताने मारे और री-टेस्ट में भी फ़ेल करने की धमकी दी.

    इसी से तंग आकर छात्रा ने अपनी जान दे दी. हालांकि, परिवार के इन आरोपों को स्कूल प्रशासन ने सिरे से ख़ारिज कर दिया है.

    पुलिस ने इस पूरे मामले पर एफ़आईआर दर्ज कर ली है. एफ़आईआर में स्कूल के प्रिंसिपल समेत दो अन्य शिक्षकों के नाम दर्ज़ हैं.

    कोटा की कोचिंग क्लास में आत्महत्या करते छात्र

    बच्चा माता-पिता को बातें बताता है या नहीं?

    लेकिन सवाल ये है कि क्या स्कूल की परीक्षा में नंबर कम आना इतनी बड़ी बात है कि एक छात्रा अपनी जान दे दे?

    क्या छात्रा के माता-पिता इस घटना को रोक सकते थे? यही सवाल हमने शिक्षाविद् पूर्णिमा झा से किया. पूर्णिमा एप्पी स्टोर नाम से बच्चों की वेबसाइट चलाती हैं.

    उनके मुताबिक़ कोई बच्चा सीधे इतना बड़ा कदम नहीं उठाता. उसके पीछे एक इतिहास जरूर होता है. माता पिता को उस इतिहास के बारे में पता होना चाहिए और अगर नहीं है तो ये बतौर अभिभावक उनके लिए चिंता का विषय ज़रूर है.

    पूर्णिमा का कहना है कि कुछ महीने पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर एक छोटा-सा प्रयोग किया था 'ममा को बताया क्या?' इसके तहत माता-पिता को बच्चों से पूछना था कि क्या बच्चे अपनी हर बात उनसे शेयर करते हैं या नहीं?

    'डिजिटल एज किड'

    पूर्णिमा झा कहती हैं कि 5000 से ज़्यादा माताओं को पता चला कि बच्चे केवल खुशी ही माता-पिता के साथ शेयर करते हैं, अपने दुख नहीं.

    वो आगे कहती हैं कि इसी प्रयोग में सारा सार छिपा है.

    पूर्णिमा की मानें तो आज के बच्चे 'डिजिटल एज किड' हैं. वो अपनी खुशी और दुख माता-पिता से ना बांटें, लेकिन सोशल मीडिया पर ज़रूर शेयर करते हैं. बतौर अभिभावक हमें उनके प्रोफ़ाइल से बहुत कुछ जानने और समझने का मौका मिल सकता है.

    जिस लड़की ने ख़ुदकुशी की, उसने भी फ़ेसबुक पर एक महीने पहले 'जीवन और डांस' से जुड़ा एक पोस्ट लिखा था.

    पूर्णिमा के मुताबिक वो एक पोस्ट उस लड़की की मन:स्थिति के बारे में बहुत कुछ बताता है.

    'पढ़ाई ही सब कुछ है'

    मुंबई में रहने वाली चाइल्ड साइकॉलजिस्ट रेणु नरगुंडे की मानें तो इस पूरे मामले में जितने दोषी स्कूल के टीचर हैं उतने ही दोषी छात्रा के माता-पिता भी हैं.

    रेणु कहती हैं, "घर हो या फिर स्कूल हमने पढ़ाई-लिखाई को इतना बड़ा बना दिया है कि पढ़ाई में नंबर ही सबकुछ है. नंबर कम आए या बच्चा फ़ेल हो गया तो चाहे स्कूल के लोग हों या घर के पास-पड़ोस के लोग, बच्चे को कमतर आंकने में देर नहीं करते. इससे बच्चे में हीन भावना पैदा होती है."

    दिल्ली के प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाली जिस छात्रा ने ख़ुदकुशी की, बहुत मुमकिन है कि उसके साथ भी ऐसा ही हुआ हो.

    रेणु कहती हैं कि सबसे पहले माता-पिता को 'पढ़ाई ही सब कुछ है' की सोच को बदलना चाहिए.

    माता-पिता क्या करें?

    तो क्या बच्चों को पढ़ने के लिए माता-पिता कुछ कहना ही बंद कर दें?

    रेणु कहती हैं, "ऐसा कतई नहीं है. बस माता-पिता को ये समझने की ज़रूरत है कि बच्चों की पढ़ाई में उन्हें कब और कितना दख़ल देना है."

    इसको समझने का रेणु एक आसान तरीका बताती हैं.

    उनके मुताबिक, "एक बच्चे को साइकिल सिखाते वक्त हम बीच-बीच में कभी साइकिल पकड़ते हैं, कभी छोड़ते हैं और कुछ समय बाद उसे बिना बताए पूरी तरह खुद साइकिल चलाने के लिए छोड़ देते हैं, ताकि बच्चा बैलेंस सीख सके. ठीक ऐसे ही बच्चों के पढ़ाई के मामले में हमें करना चाहिए."

    "कम नंबर लाने की वजह से बच्चा कभी भी दबाव महसूस करे तो माता-पिता को बच्चों के साथ ज़्यादा वक्त बिताना चाहिए. बच्चे को ये बताने की ज़रूरत है कि वो किस चीज़ में बहुत अच्छा है."

    सबसे बड़ी चूक

    रेणु का मानना है कि अभिभावक को ये समझना चाहिए कि हर बच्चा पढ़ाई में टॉप नहीं हो सकता, कोई स्पोर्ट्स में अच्छा होगा तो कोई गाने में तो कोई डांस या फ़ोटोग्राफ़ी में.

    "माता-पिता और स्कूल दोनों को मिल कर बच्चे के अंदर सही समय पर उस हुनर को पहचानने की ज़रूरत होती है."

    दिल्ली की छात्रा भी डांस में बहुत अच्छी थी. ऐसा उसके माता पिता का भी कहना है. रेणु के मुताबिक़ रिजल्ट मिलने के बाद माता-पिता से यहीं सबसे बड़ी चूक हुई.

    जब उनकी बेटी बार-बार घर लौट कर अपना रिपोर्ट कार्ड देख रही थी, तभी मां को इसका एहसास हो जाना चाहिए था कि उनकी बेटी के साथ सब कुछ ठीक नहीं है.

    दिल्ली में बच्चों को करियर पर सलाह देने वाली उषा अल्बुकर्क का मानना है कि अक़सर बच्चे ऐसा कदम तब उठाते हैं जब माता-पिता 'सेफ़ करियर' चुनने का दवाब उन पर डालते हैं.

    'सेफ़ करियर' वाली सोच

    उषा बताती हैं कि आज इंजीनियरिंग, मेडिकल, एमबीए, सिविल सर्विस और वकालत- केवल इन पांच करियर को ही अभिभावक 'सेफ़ करियर' मान कर चलते हैं. हमें इसी सोच को बदलना होगा क्योंकि इसी वजह से छात्र दवाब में आ जाते हैं.

    उषा के मुताबिक दूसरी दिक्क़त स्कूल का टारगेट है.

    उनके मुताबिक आज छात्र के साथ साथ स्कूल का भी रिपोर्ट कार्ड होता है. कोई भी स्कूल 60 फ़ीसदी और 70 फ़ीसदी वाले छात्रों को अपने यहां बोर्ड के रिज़ल्ट में दिखाना नहीं चाहता, इसलिए कम नम्बर लाने वाले छात्रों को 9वीं और 11वीं क्लास में ही रोक दिया जाता है.

    उषा इससे निकलने का उपाए भी बताती हैं.

    वो कहतीं है ऐसी सूरत में जितनी जल्दी काउसंलर के पास जाएंगे उतनी जल्दी अच्छे परिणाम देखने को मिल सकते हैं. आज कई ऐसे करियर विकल्प उपलब्ध हैं जो कम नम्बर लाने वाले छात्र अपना सकते हैं और जीवन में सफल भी हो सकते हैं.

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    BBC Hindi
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    English summary
    Noida suicide case Where who made the mistake

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    X