भाजपा से हाथ मिलाने के बाद नीतीश को सताने लगा यह डर
नीतीश कुमार को सता रहा है मुस्लिम वोट बैंक गंवाने का डर, 2019 के लोकसभा चुनावों में खोना नहीं चाहते हैं मुसलमानों का समर्थन
नई दिल्ली। नीतीश कुमार ने बिहार की महागठबंधन सरकार को तोड़कर बीजेपी से हाथ तो मिला लिया लेकिन इस कदम से राज्य और देश के तमाम अल्पसंख्यकों को नाराज करके वह मन ही मन द्वंद की स्थिति में चल रहे हैं। उन्होंने महागठबंधन सरकार से इस्तीफा देने के तुरंत बाद ही अपनी पार्टी की माइनॉरिटी सेल की एक मीटिंग बुलाकर इस मसले पर चर्चा की थी। इसके अलावा नई सरकार बनाते ही अपनी पहले ही भाषण में उन्होंने अल्पसंख्यकों को खुश करने के मकसद से उनके लिए किए गए अपने पुराने कार्यों को गिना डाला था।

भाजपा के साथ मिलकर समर्थन बनाने की कोशिश
नीतीश के पास मुसलमानों को बताने के लिए पहले से ही अपने कई काम मौजूद हैं। उन्होंने ही बीजेपी के साथ अपनी पुरानी सरकार में बिहार में अलीगढ मुस्लिम विश्विद्यालय बनाने की पेशकश की थी। मगर यह सिर्फ वक्त ही बताएगा की मौजूदा समय में वे बीजेपी को इस तरह के कामों के लिए कितना मना पाते हैं। जेडीयू के एक सूत्र ने बताया की 19 अगस्त को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में इस मसले का हल निकाल लिया जाएगा। उन्होंने बताया की नीतीश यह बिल्कुल नहीं चाहेंगे की आने वाले 2019 के आम चुनावों में देश के मुसलमान पूरी तरह से जेडीयू-बीजेपी गठबंधन के खिलाफ वोट करें।
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विरोध के बीच बड़ी चुनौती
लेकिन बीजेपी से हाथ मिलाने के बाद जेडीयू की इस मसले पर मुसीबतें बढ़ गईं हैं क्योकि पार्टी के बड़े मुस्लिम चेहरे और राज्य सभा सांसद अली अनवर ने शरद यादव के साथ मिलकर अपना विरोध खुलकर जाहिर कर दिया है। इसके अलावा जेडीयू यह भी कतई नहीं चाहती की उसकी मुसलमानों को खुश करने की इस नीति में बीजेपी अड़ंगा डाले क्योंकि पार्टी का मानना है कि जिस तरह बिहार में बीजेपी को नीतीश की जरूरत है उतनी ही बीजेपी को पूरे देश में ओबीसी नेता के रूप में नीतीश की जरूरत है। इसके अलावा गुजरात में जिस तरह पाटीदार आंदोलन हो रहे हैं उसके बाद बीजेपी को इस साल दिसंबर में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव में एक ओबीसी चेहरे के तलाश भी थी जो उनको नीतीश कुमार के रूप में मिल गया है।

भाजपा के साथ मिलकर समर्थन बनाने की कोशिश
नीतीश के पास मुसलमानों को बताने के लिए पहले से ही अपने कई काम मौजूद हैं। उन्होंने ही बीजेपी के साथ अपनी पुरानी सरकार में बिहार में अलीगढ मुस्लिम विश्विद्यालय बनाने की पेशकश की थी। मगर यह सिर्फ वक्त ही बताएगा की मौजूदा समय में वे बीजेपी को इस तरह के कामों के लिए कितना मना पाते हैं। जेडीयू के एक सूत्र ने बताया की 19 अगस्त को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में इस मसले का हल निकाल लिया जाएगा। उन्होंने बताया की नीतीश यह बिल्कुल नहीं चाहेंगे की आने वाले 2019 के आम चुनावों में देश के मुसलमान पूरी तरह से जेडीयू-बीजेपी गठबंधन के खिलाफ वोट करें।

विरोध के बीच बड़ी चुनौती
लेकिन बीजेपी से हाथ मिलाने के बाद जेडीयू की इस मसले पर मुसीबतें बढ़ गईं हैं क्योकि पार्टी के बड़े मुस्लिम चेहरे और राज्य सभा सांसद अली अनवर ने शरद यादव के साथ मिलकर अपना विरोध खुलकर जाहिर कर दिया है। इसके अलावा जेडीयू यह भी कतई नहीं चाहती की उसकी मुसलमानों को खुश करने की इस नीति में बीजेपी अड़ंगा डाले क्योंकि पार्टी का मानना है कि जिस तरह बिहार में बीजेपी को नीतीश की जरूरत है उतनी ही बीजेपी को पूरे देश में ओबीसी नेता के रूप में नीतीश की जरूरत है। इसके अलावा गुजरात में जिस तरह पाटीदार आंदोलन हो रहे हैं उसके बाद बीजेपी को इस साल दिसंबर में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव में एक ओबीसी चेहरे के तलाश भी थी जो उनको नीतीश कुमार के रूप में मिल गया है।












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