#NidarLeader : सियासत की फिसलती ज़मीन, मज़बूती से खड़ी महिलाएं..

कॉलेज की लड़कियां
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कॉलेज की लड़कियां

घर हो या दफ़्तर, राजनीति हो या देश, जब कभी और जहां भी महिलाओं को सशक्त बनाने, उनके हाथ मज़बूत करने पर चर्चा होती है, तो ज़्यादातर बात ही होती है, कोई ख़ास कोशिश नहीं होती.लेकिन ऐसा नहीं कि करने वाले, अपने स्तर पर कोशिश नहीं कर रहे या कामयाब नहीं हो रहे. जिस देश की संसद में महिलाएं अब तक 33 फ़ीसदी आरक्षण के लिए संघर्ष कर रही हैं, उसी देश के दूसरे कोनों में ऐसी भी महिलाएं हैं, जो अपने हिस्से का संघर्ष कर छोटी-बड़ी राजनीतिक कामयाबी तक पहुंच रही हैं.कहानी अब गांव का सरपंच या किसी कस्बे का विधायक बनने तक सीमित नहीं रही बल्कि लोकसभा क्षेत्र का सांसद, मंत्री और सूबे का मुख्यमंत्री बनने तक पहुंच गई है. और बीबीसी हिन्दी इस कामयाबी का जश्न मनाने के साथ-साथ राजनीति में महिलाओं की चुनौतियों पर चर्चा के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है.

'लीडर भी, निडर भी...' छोटा लेकिन असरदार शीर्षक अंदाज़ा देता है कि महिला नेताएं अब पहले की तरह पुरुषों की परछाई में दुबकी नहीं रही, बल्कि उससे बाहर नुमाइंदगी कर रही हैं, दिशा दिखा रही हैं. वो भी बिना डरे, बिना घबराए.

इस कार्यक्रम में ना सिर्फ़ राष्ट्रीय राजनीति में मौजूदगी रखने वाली महिला नेताओं से बातचीत होगी, बल्कि उन औरतों से भी संघर्ष और सफ़लता पर चर्चा होगी, जो गांव से शहर तक, राजनीति की कठिन डगर का फ़ासला हौसले से पार कर रही हैं.

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता कुमारी सैलजा
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कांग्रेस की वरिष्ठ नेता कुमारी सैलजा

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता कुमारी सैलजा के साथ इस सवाल के जवाब तलाशने की कोशिश होगी कि जो महिलाएं बड़े दलों में जगह बनाने में कामयाब रहती हैं, उनके लिए पार्टी में शीर्ष तक पहुंचने का रास्ता कितना मुश्किल होता है?कार्यक्रम में नई पीढ़ी के लोग भी शामिल होंगे जो अंदाज़ा देंगे कि ये पीढ़ी देश की राजनीति और नेताओं से क्या चाहते हैं, क्या उम्मीद करते हैं.फिर बात होगी नई पीढ़ी की औरतों की और उनके राजनीतिक सफ़र में पेश आने दिक्कतों और चुनौतियों की. इस पर चर्चा करने के लिए बीबीसी के साथ होंगी आम आदमी पार्टी की वरिष्ठ नेता आतिशी और हाल में महिला कांग्रेस की महासचिव बनाई गई अप्सरा रेड्डी.

लीडर भी निडर भी
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मुद्दों, मुश्किलों और हासिल पर होगी बात

हमारा ध्यान अक्सर उन महिला नेताओं पर जाता है, जो आम तौर पर मीडिया की निगाहों में रहती हैं. लेकिन कई महिला नेता ऐसी हैं, जो ज़मीनी स्तर पर संघर्ष कर रही हैं. उनके क्या मुद्दे हैं, उनका सफ़र कितना मुश्किल है, वो कितना आगे बढ़ पा रही हैं, इस पर विचार होगा माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य कविता कृष्णन, आम आदमी पार्टी की नेता सोनी सोरी, हरियाणा और राजस्थान के गांवों में सरपंच बनीं सीमा देवी और शहनाज़ ख़ान के साथ.समय जिस तेज़ी से बदल रहा है, उतनी ही रफ़्तार से देश की सियासत बदल रही है. बड़े चेहरों के इर्द-गिर्द घूमने वाली मौजूदा दौर की राजनीति के तौर-तरीकों और तेवर में महिला नेता किस हद तक फ़िट बैठती हैं और क्या वो इसे बदल सकती हैं, इस सवाल का जवाब देने के लिए मौजूद रहेंगी भाजपा की पूर्व नेता और सांसद सावित्रीबाई फुले और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री स्वाति सिंह.

ऐसी महिलाओं की कमी नहीं जो दूसरे किसी क्षेत्र से आने के बाद राजनीति में अपनी तरफ़ से कोशिश करती हैं, लेकिन क्या उन्हें भी उतनी ही संजीदगी से लिया जाता है, जितना दूसरे नेताओं को? तृणमूल कांग्रेस की नेता मुनमुन सेन इस सवाल का जवाब देने की कोशिश होगी. इन नेताओं के अलावा बातचीत होगी उन नौजवान महिलाओं से, जो राजनीति और नेताओं पर अलग-अलग राय रखती हैं. उनसे पूछेंगे कि इंजीनियर और डॉक्टर की तरह, वो राजनीति को विकल्प के रूप में क्यों नहीं देख पातीं.जो तबका वोट देने का हक़ रखता है, वो राजनीति को गंभीरता से क्यों नहीं लेता. उनके आकांक्षाएं भी जानेंगे और मन के सवाल भी टटोलेंगे.

राजनीति में महिलाएं कितनी भी हों, लेकिन महिलाओं की ज़िंदगी में राजनीति और चुनौतियां कदम-कदम पर हैं. फिर चाहें वो रसोई हो या फिर ऑफ़िस का कैबिन. और इस बार बात राजनीतिक महिलाओं की हैं. और होनी भी चाहिए क्योंकि कहीं पढ़ा था, 'कई दर्द के पहाड़ तुझ पर टूटते देखे, पर तुझे कभी टूटते नहीं देखा.'

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