नेपालः प्रचंड के नेतृत्व वाली नई सरकार के सामने पांच चुनौतियां क्या हैं?
चुनावपूर्व साझादीरी वाले गठबंधन को छोड़ यूएमएल से हाथ मिलाने के बाद संसद में तीसरी सबसे पार्टी सीपीएन माओवादी सेंटर के मुखिया पुष्प कमल दाहाल 'प्रचंड' नेपाल के प्रधानमंत्री बन गए हैं.
संसद में सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस के साथ पूर्व के गठबंधन में प्रचंड ने सत्ता साझीदारी में पहले प्रधानमंत्री बनने का दावा किया था.
लेकिन नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा ने उनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, तब प्रचंड ने सीपीएन यूएमएल अध्यक्ष केपी ओली के साथ गठबंधन कर लिया.
बीते रविवार को राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी, आरपीपी, जेएसपी, जनमत पार्टी, सिविल लिबर्टीज़ पार्टी और यूएमएल के साथ कुछ निर्दलीय सांसदों के समर्थन से उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया गया.
लेकिन सरकार बनाने के लिए जितनी जोड़-तोड़ और मुश्किलों का सामना करना पड़ा, नई सरकार के सामने चुनौतियां भी उतनी ही हैं.
बीबीसी से बात करते हुए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने पांच ऐसी चुनौतियों की बात की जो प्रधानमंत्री प्रचंड के सामने मुंह बाए खड़ी हैं.
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1. राजनीतिक अस्थिरता
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नई सरकार के सामने शुरू से राजनीतिक अस्थिरता का डर है और ये आशंका बनी रहेगी कि सरकार कभी भी गिर सकती है.
राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर लोकराज बाराल ने कहा, "मौजूदा संविधान के अनुसार, यह केवल एक संयोग है कि एक पार्टी बहुमत की सरकार बनाती है. इसलिए, सरकार गठबंधन के आधार पर चले, इसके पूरे हालात मौजूद हैं."
"नेपाल में, संयुक्त सरकार बनाने की कोई परंपरा नहीं है. जैसे ही छोटी-सी बात पर कोई पार्टी असंतुष्ट होगी, सरकार गिर जाएगी या अस्थिरता के हालात पैदा होंगे."
उनके मुताबिक़, ऐसे हालात से बचने के लिए नई सरकार को अपने सहयोगियों के साथ गठबंधन करने के बाद गठबंधन की सियासी संस्कृति पर अधिक काम करना होगा.
हालांकि, नेपाल के संविधान में प्रावधान है कि दो साल तक प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है.
लेकिन उनका तर्क है कि अगर गठबंधन के भीतर मतभेद हों, तो अस्थिरता का ख़तरा हमेशा बना रहेगा.
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2. संघीय ढांचे को लागू करना
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि प्रचंड सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है संघीय ढांचे को संस्थागत बनाना और उसे लागू करना.
उनका मानना है कि संसद में संघीय ढांचे का विरोध करनेवाली ताक़तों का उभार हुआ है.
पिछले चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी एक राष्ट्रीय पार्टी बन गई है, जबकि संसद में आरपीपी पहले से और मज़बूत हुई है.
जिन पार्टियों के सहयोग से प्रचंड सत्ता में लौटे हैं, उनमें इन दो पार्टियों की भी अहम भूमिका रही है.
यूएमएल के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली पर भी संघीय ढांचे के प्रति अलग नीति अपनाने का आरोप है.
विश्लेषक सुरेंद्र लाब का कहना है, "इसलिए, संघीय ढांचे को और मज़बूत करने के लिए क़ानून पारित करने में अगली सरकार को दिक़्क़तें आ सकती हैं."
वो कहते हैं, "हालांकि इसमें सीपीएन-यूएमएल और केपी शर्मा ओली की अहम भूमिका है."
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3. आर्थिक संकट
कई अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि नेपाल की अर्थव्यवस्था पिछले साल से गंभीर संकट का सामना कर रही है.
ऐसे कई लोग हैं जो मानते हैं कि सुधार के कुछ संकेत हैं, लेकिन कुछ आर्थिक क्षेत्रों में जटिल समस्याएं अभी भी मौजूद हैं.
अर्थशास्त्री चंद्रमणि अधिकारी के अनुसार, कई 'संकेत' हैं कि नेपाल की अर्थव्यवस्था की 'सेहत बहुत अच्छी नहीं' है.
उनका कहना है कि अगर उन संकेतों के कारणों का पता लगाकर आर्थिक संकट को कम नहीं किया जाता है तो इससे हालात जटिल हो जाएंगे.
उनके मुताबिक़, ये सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
चंद्रमणि अधिकारी का कहना है कि 'अगर उच्च महंगाई दर, उच्च ब्याज दर, बेरोज़गारी और अनावश्यक प्रशासनिक खर्चों जैसे मुद्दे पर सरकार तत्काल ध्यान नहीं देती है तो ये सब मिलकर एक बड़ा संकट बन जाएंगे.'
उनके अनुसार, नेपाली अर्थव्यवस्था की जो मुश्किलें हैं, उनके कुछ कारण अंदरूनी और कुछ बाहरी हैं.
उन्होंने कहा, 'डॉलर की मज़बूती और पेट्रोलियम की क़ीमतों में बढ़ोतरी के लिए बाहरी कारण ज़िम्मेदार हैं. इन्हें कम तो किया जा सकता है, लेकिन नियंत्रित नहीं किया जा सकता, जबकि अंदरूनी कारणों को नियंत्रित किया जा सकता है."
उनके अनुसार, बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता और संकट को कम करना तभी संभव होगा जब विदेशी मुद्रा आय के मुख्य स्रोत यानी निर्यात, पर्यटन, विदेशी निवेश, विदेशी सहायता और आने वाली विदेशी मुद्रा को और प्रोत्साहित किया जाए.
उन्होंने सुझाव दिया, "सरकार को सोचना चाहिए कि इन क्षेत्रों में क्या करना है और अनावश्यक निकायों को ख़त्म करना चाहिए और केंद्र से लेकर राज्य और स्थानीय स्तर पर ग़ैरज़रूरी ख़र्चों के बोझ को कम करना चाहिए."
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4. विदेश नीति में संतुलन
हाल के सालों में, विदेश संबंधी मामलों में नेपाल की कमज़ोर मौजूदगी देखी गई है और कुछ लोगों का कहना है कि नेपाल ताक़तवर देशों के बीच संघर्ष का केंद्र बन जाएगा.
कुछ लोगों का ये भी मानना है कि विदेश नीति में संतुलन साधना नई सरकार की एक बड़ी चुनौती है.
हालांकि, प्रोफ़ेसर बराल कहते हैं कि नेपाल के सामने इस तरह की चुनौती हमेशा ही रही है.
उन्होंने कहा, "अगर नेपाल अपनी पुरानी नीति जारी रखता है और विदेश नीति में संतुलन बनाए रखता है तो कोई समस्या नहीं होगी."
वो कहते हैं, "विदेश नीति में संतुलन हमेशा नेपाल के लिए एक चुनौती है और यह नई सरकार के सामने भी बनी रहेगी."
कुछ लोगों की ये भी चिंता है कि अमेरिकी सहायता परियोजना, एमसीसी के पास होने के बाद नेपाल को लेकर चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ जाएगा.
इन हालात में कई लोगों का मानना है कि नेपाल को अपने पड़ोसी देशों और अन्य देशों के साथ सहज संबंध बनाए रखने के लिए संतुलित नीति अपनाने की चुनौती है.
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5. पार्टी और सरकार की साख़ बचाने की चुनौती
ऐसे कई लोग हैं जो मानते हैं कि नई सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती जनता के भरोसे को बहाल करना है, ख़ासकर राजनीतिक दलों और सरकार में.
प्रोफ़ेसर बराल कहते हैं, "अब निर्दलीय पार्टी को जो वोट मिल रहे हैं, वो लोगों के गुस्से और निराशा के वोट हैं. ऐसा लगता है कि सरकार को इसे दूर करने के लिए काम करना होगा."
हालांकि, वो इसे लेकर बहुत आशावादी नहीं हैं.
उन्होंने कहा, "लेकिन मुझे नहीं लगता कि नेताओं के मौजूदा तौर तरीक़े में कोई ख़ास बदलाव आएगा."
सुरेंद्र लाब का कहना है कि भरोसा पैदा करने की चुनौती सिर्फ़ पुराने दलों में ही नहीं बल्कि नए दलों के सामने भी वैसी ही है.
इसके अलावा, उनका मानना है कि सरकार में शामिल होने के बाद लोगों की उम्मीदें अधिक होंगी और यदि वे पूरी नहीं होती हैं, तो लोग जल्दी निराश हो जाएंगे.
खुद जनमत पार्टी के अध्यक्ष सीके राउत, जिन्होंने प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने का फ़ैसला किया है, उन्होंने भी सोशल मीडिया पर सत्ता के जोड़-तोड़ के खेल के प्रति अपनी निराशा व्यक्त की.
ऐसे में पुरानी ही नहीं नई पार्टियों के सामने भी जनता के घटते भरोसे को बचाने की चुनौती है.
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