Supreme Court ने NCERT से मांगी विवादित चैप्टर लिखने वालों की लिस्ट, अफसरों को थमाया अवमानना का नोटिस
NCERT Book Row: सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान (Social Science) की विवादित किताब को लेकर कड़े निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने इस मामले में न केवल किताब को तुरंत हटाने, बल्कि इसकी छपाई, वितरण और इसे पढ़ाने पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
कोर्ट ने इस मामले में जवाबदेही तय करते हुए NCERT और शिक्षा विभाग से उन नामों की सूची भी मांगी है जिन्होंने इस विवादित चैप्टर को तैयार किया था। आइए जानतें हैं सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या सख्त कदम उठाए हैं।

देशभर में तत्काल जब्ती और वितरण पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि कक्षा 8 की इस सामाजिक विज्ञान की किताब को हर प्लेटफॉर्म से तुरंत हटाया जाए। इसमें हार्ड कॉपी और डिजिटल दोनों संस्करण शामिल हैं। अदालत ने NCERT के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी को जिम्मेदारी सौंपी है कि वे स्कूलों और रिटेल काउंटरों से इन किताबों की जब्ती सुनिश्चित करें। साथ ही, सभी राज्यों के शिक्षा मुख्य सचिवों को दो सप्ताह के भीतर इस आदेश के पालन की रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने साफ किया कि इस मामले में किसी भी तरह की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
शिक्षण कार्य और भविष्य की छपाई पर पूर्ण प्रतिबंध
अदालत ने 'अत्यधिक सावधानी' बरतते हुए इस किताब के उत्पादन और वितरण पर 'ब्लैंकेट बैन' लगा दिया है। अब इस किताब के किसी भी हिस्से को न तो स्कूल में पढ़ाया जा सकता है और न ही इसे किसी भी डिजिटल माध्यम पर उपलब्ध रखा जा सकता है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि कोई भी व्यक्ति या संस्थान इस आदेश के बाद भी किताब का वितरण करता है, तो उसे अदालत की अवमानना (Contempt of Court) माना जाएगा। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि विवादित सामग्री किसी भी अप्रत्यक्ष तरीके से छात्रों तक न पहुंच सके।
अफसरों को थमाया अवमानना का नोटिस
इस विवाद की जड़ तक पहुंचने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने NCERT से उन लेखकों और नेशनल सिलेबस बोर्ड के सदस्यों के नाम और उनकी योग्यता (Credentials) की जानकारी मांगी है जिन्होंने इस चैप्टर को तैयार किया था। इसके अलावा, उन बैठकों के मूल मिनट्स (Meeting Minutes) भी पेश करने को कहा गया है जिनमें इस कंटेंट को हरी झंडी दी गई थी। कोर्ट ने शिक्षा विभाग के सचिव और NCERT निदेशक को 'कारण बताओ नोटिस' जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।












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