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नेशनल सैंपल सर्वे: डेटा जुटाने के मामले में कभी ऐसे बना था भारत वर्ल्ड लीडर

भारत में डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. लेकिन एक जमाने में यहां डेटा इकट्ठा करने के लिए शुरू हुए नेशनल सैंपल सर्वे ने दुनिया के कई देशों को राह दिखाई थी.

By BBC News हिन्दी
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पिछले कुछ वक्त से भारत में डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं. देश में कोविड की मौतों से लेकर नौकरियों पर जुटाए गए आंकड़ों की विश्वसनीयता को स्वतंत्र विशेषज्ञों ने चुनौतियां दी हैं. लेकिन एक ज़माना था जब भारत को डेटा कलेक्शन के मामले में वर्ल्ड लीडर माना जाता था.

ब्रिटिश राज से आजाद होने के बाद भारत ने सोवियत संघ से प्रेरणा लेते हुए केंद्रीय पंचवर्षीय योजना के मुताबिक अपनी अर्थव्यवस्था को खड़ा करने का काम शुरू किया.

लिहाजा भारत के नीति निर्माताओं के लिए ये जरूरी हो गया है कि उनके हाथ में अर्थव्यवस्था के बारे में सटीक और बारीक जानकारियाँ आएँ.

लेकिन ये आसान नहीं था. भारत की इस समस्या का जिक्र करते हुए इसके पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था-'' हमारे पास कोई आंकड़ा नहीं है क्योंकि हम अंधेरे में काम करते हैं''.

एक बड़ा डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर ही इस अंधेरे को रोशनी में तब्दील कर सकता था.

कैसे शुरू हुआ नेशनल सैंपल सर्वे

भारत में आंकड़े जुटाने की शुरुआती कमजोरियों के बीच सबसे बड़ा फैसला था- नेशनल सैंपल सर्वे की स्थापना. यह बड़ा बदलाव था.

1950 में नेशनल सैंपल सर्वे की स्थापना की गई. इसका इरादा भारत के नागरिकों की आर्थिक ज़िंदगी के हर पहलू के सिलसिलेवार डेटा जुटाना था.

चूंकि हर घर से आंकड़े जुटाना असंभव होता ( और काफी खर्चीला भी) इसलिए एक मज़बूत और प्रतिनिधि सैंपल विकसित करने का फैसला किया गया ताकि आँकड़ों के एक छोटे हिस्से से पूरी तस्वीर निकाली जा सके.

इस बारे में 1953 में 'हिन्दुस्तान टाइम्स' ने खबर छापी थी- '' इसे दुनिया के किसी भी देश में अब तक की सबसे बड़ी और व्यापक सैंपलिंग इनक्वायरी बताया गया था. ''

नेहरू ने इस सर्वे को चलाने की जिम्मेदारी वैज्ञानिक पी. सी. महालनोबिस की दी थी. उन्हें भारतीय सांख्यिकी का जनक भी कहा जाता है. उन्होंने भारत में इंडियन स्टेटिकल इंस्टीट्यूट की स्थापना की. महालनोबिस और उनके लोगों को इसमें भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

सर्वे को ठीक से पूरा करने के लिए देश के 5,60,000 गांवों में से 1833 सैंपल गांवों के आँकड़े जुटाने थे. लेकिन ये काफी मुश्किल था.

इंस्टीट्यूट के पास कर्मचारियों की कमी थी. संस्थान को ऐसे सर्वेक्षक चाहिए थे, जो देश की कम से कम 15 भाषाओं और माप-तौल के 140 स्थानीय तरीकों के बारे में समझ कर काम कर सकें.

मुश्किल भरी राह

महालनोबिस ने अपनी डायरी में इन दुश्वारियों का जिक्र किया है. उन्होंने लिखा है, '' ओडिशा में जंगल से भरे ऐसे इलाके थे, जहां सर्वे करने वाले को हथियारबंद गार्ड के साथ पहुंचना पड़ता था. दूसरी ओर उन्हें बर्फ में लिपटे हिमालयी दर्रों से भी गुजरना होता था. ''

महालनोबिस आगे लिखते हैं, '' सर्वे करने वालों को 'सबसे सभ्य लोग' असम में मिले. मिले. हालांकि यहां नग्न रहने वाले लोग भी मिले जो अनजान भाषा बोलते थे. आदिवासियों को पता ही नहीं था कि पैसा क्या होता है '' .

उन्होंने लिखा है, '' कई जगह लोग आर्थिक विकास शब्द पर हंसते थे. कई जगह आंकड़े जुटाने निकले लोगों को अपराधियों ने परेशान किया. लोगों के सामने एक दिक्कत लगातार बनी रही और वह थी जंगल से होकर यात्रा .

जंगल बेहद घने होते थे और उनमें सफर के दौरान जंगली जानवरों का डर बना रहता था. साथ ही इन जंगलों में होने वाली बीमारियों का भी खतरा था. सर्वे करने वाले अक्सर इन खतरों की शिकायत करते थे. ''

नेशनल सैंपल सर्वे बना दुनिया के लिए मिसाल

लेकिन सर्वे के नतीजे असाधारण थे. इससे भारतीयों की रोज़मर्रा की जिंदगी की बारीक से बारीक जानकारी मिल रही थी.

जैसे कि नेशनल सैंपल सर्वे के दूसरे सर्वे ने बताया कि तमिलनाडु के एक सुदूर गांव में चिदंबरम मुदाली उनकी पत्नी, तीन बेटियां और सास ने घी, चावल, गेहूं, नमक, चीन, मिर्च और दूसरी जरूरी चीजों पर कितना खर्च किया.

एक परिवार के खर्च के आँकड़े की ज़्यादा अहमियत नहीं है लेकिन जब ऐसे हज़ारों डेटा इकट्ठा किए गए तो आर्थिक नीतियां बनाने और नीतिगत फैसला करने वालों को अर्थव्यवस्था को बुनियादी तौर पर अलग-अलग तरीके से समझने का मौका मिला.

तब से लेकर अब तक भारत का नेशनल सैंपल सर्वे भारत में लोगों की आर्थिक ज़िंदगी की बारीक से बारीक जानकारियां मुहैया कराता आ रहा है. इससे देश में ग़रीबी, रोज़गार, खपत और खर्च के आँकड़े मिलते हैं.

यही नहीं भारत के नेशनल सैंपल सर्वे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर के संगठनों को भी नीतियां बनाने में मदद की है. नेशनल सैंपल सर्वे ने जो तरीके अपनाए वो अब वर्ल्ड बैंक और यूएन में भी इस्तेमाल किए जाते हैं.

नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अर्थशास्त्री एंगस डेटन और उनकी सह-लेखिका ने 2005 में लिखा,'' महालनोबिस और भारत की शुरू की गई इस यात्रा का अनुसरण बाद में पूरी दुनिया ने किया. इसी की बदौलत आज ज्यादातर देशों में घरेलू आय और खर्च के ताजा सर्वे उपलब्ध रहते हैं. सांख्यिकी क्षमता के मामले में पूरी दुनिया के देशों को भारत से ईर्ष्या हो सकती है.''

अर्थशास्त्री टीएन श्रीनिवासन, रोहिनी सोमनाथन, प्रणब बर्द्धन और नोबेल पुरस्कार हासिल कर चुके अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी का कहना है, '' किसी विकासशील देश में अपने ही दम पर किसी संस्थान का इस तरह खड़ा होना और व्यापक हित से जुड़े किसी क्षेत्र में दुनिया का अगुआ बनने का इससे बड़ा और कोई दूसरा उदाहरण नहीं है. ''

इंडियन स्टेटस्टिकल इंस्टीट्यूट का योगदान

आधुनिक भारत की डेटा क्षमता के उदय और महालनोबिस की कहानी आपस में गुंथी हुई है. (महालनोबिस को 'प्रोफेसर' कहा जाता है) .

दरअसल महालनोबिस की सांख्यिकी यात्रा की कहानी पहले विश्वयुद्ध के दौरान कैंब्रिज से कलकत्ता ( अब कोलकाता) लौटने के दौरान हुई थी.

एक जलयान से घर लौटते हुए उनके हाथ सांख्यिकी का एक जर्नल लग गया था. उसी वक्त ये सफर शुरू हो गया था. ये संयोग एक दशक बाद आजाद भारत के डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर को बदल देने वाला साबित हुआ.

बाद में दुनिया कुछ बड़े सांख्यिकीविद और अर्थशास्त्री कोलकाता स्थित इंडियन स्टेटस्टिकल इंस्टीट्यूट की ओर खिंचे चले आए. महालनोबिस की बदौलत ये संस्थान विश्व स्तरीय बन गया. इस संस्थान ने भारत की जीडीपी की गणना में मदद की.

यहीं के लोग निकल कर केंद्रीय सांख्यिकी संगठन में गए. इन्हीं लोगों ने नेशनल सैंपल सर्वे को डिजाइन किया.

इसी संस्थान से जुड़े लोग पहली बार भारत में डिजिटल कंप्यूटर लेकर आए. इस इंस्टीट्यूट का ज्यादातर आर्किटेक्चर आज भी बरकरार है. हर साल 29 जून को सांख्यिकी दिवस मना कर महालनोबिस के योगदान को याद किया जाता है.

पीसी महालनोबिस
Getty Images
पीसी महालनोबिस

भारत का डेटा संकट और भविष्य की चिंता

लेकिन आज भारतीय डेटा संकट का सामना कर रहे हैं. दुनिया 'बिग डेटा' की ओर बढ़ रही है. लेकिन भारत के सामने पिछड़ने का खतरा पैदा हो गया है.

हाल में 'द इकोनॉमिस्ट' ने चेतावनी देते हुए कहा कि भारत में सांख्यिकी का इन्फ्रास्ट्रक्चर चरमराने लगा है.

हाल के दिनों में भारत में कोविड से लेकर गरीबी के जो आंकड़े आए हैं उस पर स्वतंत्र पर्यवेक्षकों और विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं.

सरकार की जिम्मेदारियां पूरी करने की भूमिका और नीति-निर्धारण पर पड़ने वाले इसके असर को नजरअंदाज करना मुश्किल है.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक समय में जिस क्षेत्र में अगुआ था वो अब उसमे अपनी पहचान खोने की स्थिति में पहुंच गया है.

भारत को इसमें अपना पुराना गौरव एक बार फिर हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए. ये भारत के भविष्य के लिए बेहतरीन बात होगी.

(निखिल मेनन पेंग्विन वाइकिंग से प्रकाशित किताब ' प्लानिंग डेमोक्रेसी :हाऊ प्रोफेसर, एन इंस्टीट्यूट एंड एन आइडिया शेप्ड इंडिया' के लेखक हैं. वह नॉट्रेडम यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.)

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