Muslim Reservation Bill: 'मुस्लिम आरक्षण' पर फिर छिड़ी रार, जानिए धार्मिक रिजर्वेशन पर क्या कहता है संविधान?
Muslim Reservation Bill: देश की सियासत में एक बार फिर से मुस्लिम आरक्षण पर बहस छिड़ गई है। दरअसल, बीते हफ्ते कर्नाटक विधानसभा में सरकारी ठेकों में अल्पसंख्यकों को चार प्रतिशत आरक्षण देने संबंधी विधेयक पारित हुआ था। इसके बाद एक इंटरव्यू में जब डीके शिवकुमार ने मुस्लिम आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन की ओर इशारा किया तो राजनीति और गरमा गई।
शिवकुमार का यह बयान ऐसे समय में आया जब कर्नाटक में कांग्रेस सरकार अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधने में जुटी हुई है। देखिए राज्य में मुस्लिम समुदाय की कुल आबादी करीब 13% है और यह वोट बैंक विधानसभा और लोकसभा चुनावों में शानदार खेल खेलता है।

Muslim Reservation Bill: मुस्लिम आरक्षण पर क्या कहता है संविधान?
पीछले साल जब बीजेपी ने मुस्लिम आरक्षण को खत्म किया तब कांग्रेस ने इसे फिर से लागू करने का वादा किया था। डीके शिवकुमार का बयान इस वादे को मजबूती देने का काम करता है। हालांकि इस पूरे विवाद के बीच एक सवाल यह उठ रहा है कि क्या हमारे संविधान में धार्मिक आधार पर आरक्षण को लेकर कोई प्रावधान है?
मुस्लिम आरक्षण पर छिड़ी इस जंग पर क्या कहता है हमारा संविधान? आइए विस्तार से जानते हैं...
भारतीय के संविधान में जातिगत आरक्षण के लिए व्यवस्था की गई और अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) को इसका लाभ दिया गया। इसकी परिभाषा अनुच्छेद 341 और 342 में दी गई है और अनुच्छेद 16 (4) पिछड़े वर्ग के लिए भी आरक्षण देता है। वहीं संविधान के अनुच्छेद 15 (4) व 15 (5) में शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों या फिर एससी-एसटी के लिए विशेष उपबंध की व्यवस्था है।
Muslim Reservation Bill: 10 साल के लिए था आरक्षण का प्रावधान
भारतीय संविधान में जातिगत आरक्षण को संविधान सभा ने 10 साल के लिए लागू किया था और इसके बाद इसकी समीक्षा करने का जिक्र किया था। हालांकि, किसी सरकार ने इसकी समीक्षा नहीं कि और राजनीतिक लाभ के लिए इसका दायरा आज तक बढ़ता ही चला गया।
बता दें कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों और सरकारी शिक्षण संस्थानों में एससी के लिए 15 फीसदी और एसटी के लिए 7.5 फीसदी आरक्षण तय किया था।
Muslim Reservation Bill News: धार्मिक आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं
भारतीय संविधान में धार्मिक आधार पर आरक्षण देने का कहीं कोई प्रावधान पर कोई टिप्पणी नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत केवल धर्म के आधार पर किसी को कोई आरक्षण नहीं दिया जा सकता है।
हालांकि, यहां इस बात को समझना जरुरी है कि अल्पसंख्यकों और पिछड़े समुदाय के लोगों को संविधान में अलग-अलग अधिकार जरूर दिए गए हैं लेकिन इसमें किसी तरह के धार्मिक आधार को दायरा नहीं बनाया गया है। यदि किसी धर्म के लोग इसके दायरे में आते हैं तो उनको अल्पसंख्यक होने या पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का लाभ मिल सकता है।
Muslim Reservation Bill Row: क्या कहती है मंडल आयोग की रिपोर्ट?
बी.पी मंडल की अध्यक्षता में बने मंडल आयोग ने साल 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत किया जिसके बाद आरक्षण का कोटा बढ़ा कर 49.5 फीसदी करने की सिफारिश कर दी गई। बाद में वीपी सिंह की सरकार ने साल 1990 में इस कमिशन को लागू कर दिया। 3,743 जातियों को ओबीसी में शामिल कर 27 फीसदी आरक्षण दे दिया गया और 22.5% का आरक्षण पहले से ही एससी-एसटी के लिए था। इस तरह से आरक्षण बढ़ कर 49.5 प्रतिशत तक पहुंच गया।
इसी मंडल आयोग ने मुस्लिम समुदाय की कुछ जातियों को भी ओबीसी में शामिल किया था और OBC आरक्षण का हकदार बनाया। बता दें कि, साल 1992 में ओबीसी आरक्षण को सही बताया गया और इसके बाद केंद्र सरकार के शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण लागू हुआ। संविधान सभा में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का भी मुद्दा उठा लेकिन उस पर सहमति नहीं बन पाई थी। हालांकि, अब गरीब सवर्णों के लिए भी 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया जा चुका है।












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