अपर कास्ट के लोगों के बाद मुसलमानों का सोशल मीडिया में दबदबा - सर्वे
नई दिल्ली: सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर एक सर्वे सामने आया है। इस सर्वे में सामने आया है कि मुसलमान उच्च जाति के लोगों के बाद सबसे ज्यादा सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता है। वो इस मामले में दलितों और अनुसूचित जनजाति के लोगों से काफी आगे है और उनकी अपेक्षा ज्यादा मुखर है। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के सर्वे नें ये आंकड़े मिले हैं। विश्लेषण में ये बात भी सामने आई है कि सोशल मीडिया में अभी भी अपर कास्ट के लोगों का दबदबा बना हुआ है। इस सर्व में सामने आया कि दलितों और आदिवासियों की अपेक्षा अपर कास्ट यहां दोगुना प्रभाव रखता है।

सोशल मीडिया में उच्च जातियों का दबदबा
सीएसडीए-लोकनीति के एक अध्ययन के अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप, यूट्यूब, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर पिछले पांच सालों में उच्च जातियों का दबजबा बरकरार है। मुसलमानों ने अन्य जातियों की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन किया। जबकि दलित, आदिवासी जाती के लोगों इस मामले में काफी पीछे रहे। लोकनीति 2019 के सर्वे के मुताबिक अपर कास्टे के 15 फीसदी लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। जबकि 8 फीसदी दलित और 7 फीसदी आदिवासी लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। ओबीसी के 9 फीसदी लोग सोशस मीडिया का इस्तेमाल करते हैं।

कौन जाति सोशल मीडिया से कितनी दूर?
वहीं जातियों के बीच सोशल मीडिया की पहुंच से दूर होने पर भी भारी अंतर है। 73 फीसदी आदिवासी सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करते हैं। वहीं दलितों में ये आंकड़ा 71 फीसदी है। लेकिन अपर कास्ट में ये अपेक्षाकृत 54 फीसदी है। इस सर्वे में पाया गया कि दो सबसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और व्हाट्सऐप इस्तेमाल करने में उच्च जाति के लोग काफी आगे हैं। इन दो जगहों पर इनकी हिस्सेदारी 20 से 22 फीसदी है।

फेसबुक और ट्विटर इस्तेमाल करने वालों का आंकड़ा
साल 2017 में फेसबुक और व्हाट्सऐप इस्तेमाल करने में उच्च जाति के लोगों की हिस्सेदारी 30 फीसदी थी। जो 2019 में सिर्फ एक फीसदी कम होकर 29 फीसदी पर आई। वहीं दलितों में मात्र दो फीसदी की बढोतरी देखने को मिली। वहीं ट्विटर में ये आंकड़ा थोड़ा बेहतर दिखा। यहां दलितों में पिछले दो सालों में चार फीसदी की बढोतरी हुई। ट्विवटर इस्तेमाल करने में दलितों की हिस्सेदारी साल 2019 में 12 फीसदी हो गई है। वहीं आदिवासी लोगों की हिस्सेदारी दो सालों में घटकर 6 फीसदी हो गई है।












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