मुलायम सिंह यादव के लिए आजमगढ़ की राह आसान नहीं

सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव वैसे तो दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन आजमगढ़ उनके लिए एक सिरदर्द बन गया है। सपा के वरिष्ठ सूत्रों ने तो यहां तक खुलासा कर दिया है कि मुलायम आजमगढ़ की सीट से बहुत बुरी तरह हारने वाले हैं। वैसे हार-जीत तो 16 मई को नतीजे आने के बाद ही पता चल पाएगी लेकिन कुछ ऐसे आंकड़े हैं जिन्होंने मुलायम की हार पर कहीं न कहीं पक्की मुहर ठोंक दी है।
चुनावी विशेषज्ञों का कहना है कि मुलायम ने आजमगढ़ क्षेत्र सिर्फ इसलिए चुना है कि क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां से मुस्लिम समुदाय उन्हें ही वोट देंगे जबकि सपा के चारों पहिए में तीन पहिए तो अयादव-अहिर के ही हैं। ऐसे में उन्हें मुस्लिम समुदाय से यहां एक तगड़ा झटका लग सकता है। भाजपा के रमाकांत यादव भी किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं हैं। रमाकांत ने वर्ष 2009 में लोक सभा का चुनाव आजमगढ़ से सिर्फ इसलिए जीता था क्योंकि उन्होंने यादवों-अहिरों को आपस में ही बांट दिया था।
आजमगढ़ की फिजाओं में ये हवा फैली हुई है कि मौलाना रशादी मुलायम सिंह के साथ सौदा करके चुनाव से हट सकते हैं. रिहाई मंच के एक नेता के मुताबिक रशादी ने मुलायम सिंह के सामने महासचिव पद की मांग रखी है। स्वयं मौलाना इस बात की तस्दीक करते हैं कि सपा और बसपा के लोग उनके संपर्क में हैं, साथ ही वे किसी भी तरह की सौदेबाजी से इनकार करते हैं, ‘हम टिकाऊ हैं, बिकाऊ नहीं है। मुलायम सिंह को आजमगढ़ से बैरंग वापस भेजना हमारा मकसद है।' एक बात तय दिख रही है कि अगर मौलाना दम भरकर आजमगढ़ का चुनाव लड़ जाते हैं तो जो मुसलमान वोट 2009 में दो हिस्सों में बंटा था वह इस बार तीन हिस्सों में बंट जाएगा। भाजपा को इसी बंटवारे और मोदी लहर का भरोसा है।












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