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यहां 70% प्रवासी मजूदर कर्ज में डूबे हैं और 50% से अधिक दिन में एक बार कर पा रहे हैं भोजनः सर्वे

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नई दिल्ली। बिहार में अपने घरों को लौट चुके प्रवासी मजदूरों किए गए एक सर्वेक्षण में राज्य के प्रवासी मजदूरों की स्थिति के बारे में बेहद चिंताजनक आंकड़े उभरकर सामने आए हैं। सर्वेक्षण के मुताबिक उत्तरदाताओं में शामिल लोगों में से 50 फीसदी से अधिक केवल एक दिन भोजन कर रहे हैं, करीब 70 फीसदी मजदूरों के कर्ज में डूबने के कारण उनकी हालत खराब है और 1 फीसदी से भी कम मजदूरों को लगता है कि उनके पास पर्याप्त बचत है।

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सर्वे में सबसे महत्वपूर्ण बात जो निकलकर सामने आई है, वह यह है कि लॉकडाउन के दौरान जब वो शहरों फंसे हुए थे, तो किसी भी मजदूर ने किसी भी प्रकार की नकद सहायता प्राप्त करने की सूचना नहीं दी। यह सर्वेक्षण देश के विभिन्न शहरों से बिहार के 15 जिलों में लौटे कुल 177 बिहारी प्रवासियों के जवाबों पर आधिरत हैं।

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एनजीओ एक्शनएड इंडिया द्वारा किया गया यह सर्वेक्षण बिहार के निवासियों पर केंद्रित था, जो काम की तलाश मे दूसरे राज्यों में गए थे। यह सर्वे एक बड़े अखिल भारतीय अध्ययन का हिस्सा है, जो अनौपचारिक श्रमिकों और शहरी बेघरों के मुद्दे पर काम करता है। सर्वे में शामिल प्रवासी मजदूरों ने बताया कि घर वापसी की यात्रा शुरू करने से पूर्व लॉकडाउन के दौरान वो औसतन 18 दिन शहरों में बुरी तरह से फंसे हुए थे।

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एक तिहाई ने मजूदरों ने कहा उन्हें मकान मालिकों द्वारा निकाल दिया गया

एक तिहाई ने मजूदरों ने कहा उन्हें मकान मालिकों द्वारा निकाल दिया गया

सर्वेक्षण की शुरूआत में प्रवासी मजदूरों से उन शहरों के नाम और लॉकडाउन ने बाद किराए पर लिए कमरों को खाली करने का कारण पूछा गया अधिकांश उत्तरदाताओं यानी लगभग एक तिहाई ने बताया कि उन्हें उनके मकान मालिकों द्वारा निकाल दिया गया था। प्रवासी मजदूरों द्वारा कार्यक्षेत्र में लिए किराएं के कमरों को खाली करने का अगला बड़ा कारण यह था कि उनमें से 26 फीसदी के पास जीवित रहने के लिए कोई रोजगार नहीं था।

लगभग 82 फीसदी प्रवासी मजदूरों ने लॉकडाउन में अपनी नौकरी खो दी

लगभग 82 फीसदी प्रवासी मजदूरों ने लॉकडाउन में अपनी नौकरी खो दी

बिहार राज्य में किए गए रैपिड सर्वे के आकलन से पता चलता है कि लगभग 82 फीसदी उत्तरदाताओं ने अपनी नौकरी खो दी थी, इसलिए अपने गृह जिलों में लौट आए, जबकि 60 फीसदी से अधिक लोग अपने गंतव्य शहरों में अपने अंतिम नियोक्ता से कोई मजदूरी प्राप्त किए बिना घर लौट आए थे।

लॉकडाउन में छूट नहीं मिलती तो प्रवासी मजदूर भुखमरी के शिकार हो जाते

लॉकडाउन में छूट नहीं मिलती तो प्रवासी मजदूर भुखमरी के शिकार हो जाते

उत्तरदाताओं द्वारा दिए गए जवाबों के अनुसार उनकी आय और पहुंच में अचानक आई भारी कमी के कारण उनकी भोजन ग्रहणता का स्तर 72 फीसदी से 8 फीसदी तक गिर गया। माना जाता है कि लॉकडाउन से पहले 71 फीसदी उत्तरदाताओं के पास पर्याप्त पानी तक पहुंच थी, लेकिन लॉकडाउन के दौरान उसमें भी 38 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। सर्वे में पाया गया कि अगर ऐसी स्थिति कुछ और हफ्तों तक बनी रहती है, तो प्रवासी मजदूरों में भुखमरी व अन्य कमजोरियां उजागर हो सकती थीं।

लगभग 66 फीसदी प्रवासियों ने बिना किसी मजदूरी के घर लौटे

लगभग 66 फीसदी प्रवासियों ने बिना किसी मजदूरी के घर लौटे

सर्वेक्षण में शोध टीम में शामिल एक अकादमिक राहुल सुरेश सपकाल कहते हैं कि महामा़री संकट के दौरान लगभग 16.1 करोड़ मजदूरों को नौकरी के नुकसान का खतरा अधिक है। लगभग 66 फीसदी प्रवासियों ने बिना किसी मजदूरी के घर लौटे, केवल 14 फीसदी मजदूरों ने पूर्ण मजदूरी प्राप्त की और 21 फीसदीत को लॉकडाउन की घोषणा के बाद आंशिक मजदूरी मिली। सर्वे रिपोर्ट कहती है कि मजदूरी नहीं मिलने के नुकसान ने प्रवासियों को अनचाहे कर्ज में धकेल दिया है।

प्रति व्यक्ति 40 फीसदी मजदूरों 53,000 रुपए कर्ज में होने की सूचना दी

प्रति व्यक्ति 40 फीसदी मजदूरों 53,000 रुपए कर्ज में होने की सूचना दी

लॉकडाउन से पहले लगभग 40 फीसदी उत्तरदाताओं ने औसतन प्रति व्यक्ति 53,000 रुपए का कर्ज होने की सूचना दी थी। हालांकि लॉकडाउन अवधि में ऋणग्रस्तता की तीव्रता में दो-तिहाई (68 फीसदी) वृद्धि हुई है। उत्तरदाताओं की ऋण राशि की रेंज 40,000 रुपए से 2,80,000 रुपए तक है। मजूदरों की ऋणग्रस्तता में वृद्धि का प्रमुख कारण घरेलू खर्च, स्वास्थ्य आपात स्थितियां और आगामी खरीफ मौसम के लिए कृषि से संबंधित खर्च शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासियों से ट्रेन या बस का किराया वसूलने से मना किया

सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासियों से ट्रेन या बस का किराया वसूलने से मना किया

गुरूवार को सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे और राज्य सरकारों को लॉकडाउन के दौरान घर लौटने का इंतजार कर रहे प्रवासी कामगारों से ट्रेन या बस का किराया वसूलने से मना कर दिया है। अदालत ने कहा कि पैदल चलने वालों को निकटतम शिविरों में ले जाया जाना चाहिए, जहां उनकी देखभाल की जानी चाहिए। साथ ही, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि राज्यों को प्रवासी श्रमिकों के पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल और तेज करना चाहिए।

सैकड़ों मजदूरों की लॉकडाउन के दौरान घऱ जाने की कोशिश में मौत हुई

सैकड़ों मजदूरों की लॉकडाउन के दौरान घऱ जाने की कोशिश में मौत हुई

श्रमिक ट्रेनों में नौ मजदूरों की मौत होने की पुष्टि हुई है, इसके अलावा करीब सैकड़ों अन्य मजदूर की लॉकडाउन के दौरान घऱ जाने की कोशिश में मौत हुई, जिसमें सड़क दुर्घटना , थकावट और विभिन्न बीमारियों से मौत शामिल है।

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English summary
The survey, conducted by NGO ActionAid India, focused on the residents of Bihar, who went to other states in search of work. The survey is part of a larger all-India study, which works on the issue of informal workers and the urban homeless. The migrant laborers involved in the survey said that they were badly trapped in cities on average for 18 days during lockdown before starting the return journey home.
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