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'मंटो को युवा पसंद करते हैं क्योंकि वो सेक्स की बातें करते थे'

By Bbc Hindi
मंटो
BBC
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1948 के जनवरी महीने में मशहूर उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो बम्बई (आज का मुम्बई) छोड़कर लाहौर चले गए.

क़रीब 12 साल बम्बई में रहे मंटो ने अपनी कहानियों में 1930-1940 के बम्बई को शब्दों के ज़रिये बयान किया. वो कहते थे ''मैं चलता फिरता बम्बई हूँ.''

वरिष्ठ पत्रकार, सिनेमा के जानकार और बम्बई शहर के प्रेमी रफ़ीक बग़दादी ने एक ख़ास पदयात्रा रखी जिसमें उन्होंने 1940 के मंटो के बम्बई की झलकियां आज की पीढ़ी से साझा की.

बग़दादी कहते हैं, "मंटो की कहानी गुरु दत्त की 'प्यासा' फ़िल्म की तरह है. जब ज़िंदा थे तब किसी ने पूछा नहीं और जब दुनिया में नहीं रहे तब सब उनका बख़ान कर रहे हैं."

रफ़ीक बग़दादी की पदयात्रा मुंबई के ग्रांट रोड स्टेशन के बाहर स्थित मरवान एंड कंपनी होटल से शुरू होती हुई केनवे हाउस, जिन्ना हॉल, केनेडी ब्रिज, ज्योति स्टूडियो, अल्फ़्रे़ड टॉकीज़, कमाठीपुरा और अंत में अरब गली में ख़त्म हुई.

इन सब जगहों की मंटो की ज़िंदगी और उनकी कहानी में गहरी छाप है. क़रीब दो ढाई घंटे की इस पदयात्रा में 30 लोग शामिल थे, जिसमें नई पीढ़ी के अधिक थे.

मंटो
Supriya Sogle/BBC
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मंटो की बातें

नई पीढ़ी में मंटो के लिए जिज्ञासा पर टिप्पणी करते हुए रफ़ीक बग़दादी कहते हैं, "पुरानी पीढ़ी मंटो को नहीं पढ़ा करती थी. एक टैबू था. उस दौर में बहुत पाबंदियां थीं जो आज नहीं हैं. आज शिक्षा प्रणाली बदल गई है. आज की पीढ़ी को दिक़्क़त नहीं होती समझने के लिए कि मंटो ने ऐसा क्यों लिखा."

मंटो की बम्बई की पदयात्रा के पीछे का मक़सद बयान करते हुए रफ़ीक बग़दादी कहते हैं, "हम चाहते हैं कि लोग इस शहर को और इसके इतिहास के बारे में जानकारी रखें."

बम्बई शहर के इतिहास की जानकारी रखने वाले रफ़ीक बग़दादी ने मंटो और उनके बम्बई शहर से जुड़ी काफ़ी दिलचस्प बातें साझा कीं.

मंटो
Supriya Sogle/BBC
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बग़दादी बताते हैं कि ''भारत की आज़ादी से पहले केनेडी ब्रिज के पास का इलाक़ा सेक्स वर्कर्स के लिए मशहूर था. यहाँ दुनियाभर से, जैसे चीन, जापान, रूस, यूक्रेन से सेक्स वर्कर्स आया करती थीं. ये यौनकर्मी रात को केनेडी ब्रिज पर खड़ी होकर अपने ग्राहक का इंतज़ार किया करती थीं.''

मंटो की पहली फ़िल्म

जब मंटो 1934-1935 में बम्बई आए थे तो सबसे पहले उन्होंने अल्फ़्रेड टॉकीज़ के सामने अरब गली के छोटे-से घर में 8 महीने गुज़ारे थे, जहां खटमल ही खटमल थे और जब इसका पता उनकी माँ को चला तो वो रो पड़ी थीं. अरब गली के बाद मंटो भायखला में रहने लगे.

केनेडी ब्रिज के पास ही ज्योति स्टूडियो हुआ करता था जहाँ सआदत हसन मंटो का दफ़्तर था. यहीं उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म 'किसान कन्या' लिखी थी.

ज्योति स्टूडियो में ही भारत की पहली साउंड फ़िल्म 'आलम आरा' की शूटिंग हुई थी. दिन में ट्रेन की आवाज़ के कारण फ़िल्म की शूटिंग रात को 2 बजे से 4 बजे के बीच हुआ करती थी.

मंटो
Supriya Sogle/BBC
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1931 में जब फ़िल्म बम्बई के बड़े थिएटर 'मैजेस्टिक सिनेमा' में रिलीज़ हुई तो क़रीब 8 हफ़्ते चली. फ़िल्म ने उस दौरान बयालीस हज़ार की कमाई की जिसे थैले में भरा गया क्योंकि कमाई सिर्फ़ सिक्कों में हुआ करती थी.

मंटो की कहानियों में जिन्ना हॉल, कांग्रेस हॉल, बॉम्बे संगीत कलाकार मंडल (जहाँ तवायफ़ें नाच-गाना किया करती थीं) का ज़िक्र आता है. आज ये एक धुंधली याद बन गई है. जिन्ना हॉल में अब छोटे-मोटे कार्यक्रम होते हैं.

मंटो
Supriya Sogle/BBC
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युवा पीढ़ी को क्यों दिलचस्पी?

कांग्रेस हॉल में अब एक रेस्तरां खुल गया है. बग़दादी का कहना है कि एक ज़माने में ये सब जगह बहुत अलग दिखा करती थी और यहाँ बड़े ख़ानदानी लोग तवायफ़ों का मुजरा देखने आया करते थे. इस इलाके में कई टॉकीज़ भी हुआ करती थी.

कामठीपुरा इलाक़े में एक टॉकीज़ हुआ करता था जहां सेक्स वर्कर्स सिर्फ़ गुरुवार को फ़िल्म देख सकती थीं. उनकी टिकटें आम जनता से ज़्यादा महंगी हुआ करती थीं.

मंटो के बम्बई की पदयात्रा पर एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ मुंबई ने विचार विमर्श आयोजित किया जिसमें कई वक्ता शामिल हुए और मंटो और उनकी कहानियों पर उन्होंने अपने विचार सामने रखे. इन वक्ताओं में फ़िल्मकार नंदिता दास, पारोमिता चक्रवर्ती, अभिनेता राजेंद्र गुप्ता और कथा-कथन के जमील गुलरेज़ शामिल थे.

कथा-कथन के जमील गुलरेज़ ने मंटो की दो कहानियां 'सोने की अंगूठी' और 'लाइसेंस' पढ़ी.

जमील गुलरेज़ का कहना है कि ''मंटो के बार में ये ग़लतफ़हमी है कि वो सिर्फ़ तवायफ़ों के बारे में लिखते थे जबकि उन्होंने हर चीज़ पर लिखा है.'' उनका ये भी कहना है कि ''मंटो में युवा पीढ़ी की दिलचस्पी है क्योंकि उनकी कुछ कहानियां सेक्स की बात करती हैं जो उत्तेजित करती हैं. पर असली मंटो को कोई नहीं जानता."

मंटो
Supriya Sogle/BBC
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नंदिता दास की फ़िल्म है 'मंटो'

फ़िल्मकार नंदिता दास की आगामी फ़िल्म 'मंटो' में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी सआदत हसन मंटो का किरदार निभाते नज़र आएंगे. 2012 में नंदिता दास ने मंटो की सदी पर उनके बारे में पढ़ना शुरू किया और उनकी दिलचस्पी मंटो की ज़िन्दगी में बढ़ी. नंदिता का कहना है कि मंटो की कहानियाँ आज के दौर में भी उतनी प्रासंगिक हैं जितनी उस दौर में थीं.

वो कहती हैं, "हम सब में मंटोइयत है. 'मंटो' फ़िल्म का मक़सद लोगों को समाज की कुछ चीज़ों पर सोच-विचार करने के लिए मजबूर करना है जिससे लोग अक्सर दूर भागते हैं. जो आज के दौर में हो रहा है उसका जवाब है ये फ़िल्म. क्या सही है, क्या ग़लत है, महिलाओं पर समाज का नज़रिया, सेंसरशिप इत्यादि सब कुछ है इसमें."

मंटो की कहानियों की दिलचस्प बात जो नंदिता को पसंद आई वो थी कि उनके देशप्रेम पर भी सवाल उठते थे, जिसे उनकी कहानी 'टोबाटेक सिंह' में बख़ूबी बयान किया गया है.

आर्किटेक्ट छात्रा भाग्यश्री जो इस मंटो पदयात्रा में शामिल हुईं वो कहती हैं, "मुझे सिनेमा और शहर के बारे में पढ़ना पसंद है. मंटो कला और सिनेमा का बहुत बड़ा हिस्सा रहे हैं. मैंने उनकी कहानियां नहीं पढ़ी पर उनके बारे में बहुत कुछ जानने को मिला. अब मेरी दिलचस्पी उनमें बढ़ गई है."

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Supriya Sogle/BBC
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वही विल्सन कॉलेज में भौतिक की अध्यापिक उर्वशी ने मंटो से जुडी फ़िल्मी क्लिप देखी. पुरानी फ़िल्मों को पसंद करने वाली उर्वशी को मंटो के प्रति जिज्ञासा इसलिए जगी क्योंकि मंटो ने पुराने फ़िल्मी कलाकारों के बारे में ख़ूबसूरत लेख लिखे हैं.

अंग्रेज़ी साहित्य की छात्रा प्रकृति ने मंटो में अपनी दिलचस्पी जताते हुए कहा, "मैंने हिंदी या उर्दू में मंटो को नहीं पढ़ा है पर उनकी 'मेरा नाम राधा है', 'मोज़ेल', 'टोबाटेक सिंह' कहानियों का अंग्रेज़ी रूपांतरण पढ़ा है. उनकी कहानियों में बहुत गहराई है. उनकी कहानियां इंसानियत और राष्ट्रीयता पर सोचने को मज़बूर कर देती हैं."

वही एजुकेशन कंसल्टिंग कंपनी में काम कर रहे अभिषेक ने मंटो की कहानियाँ एक साल पहले ही पढ़नी शुरू की हैं. वो मंटो की कहानियों का अंग्रेज़ी रूपांतरण पसंद कर रहे हैं पर वो कहते हैं कि मंटो की कहानियों की गहराई समझने के लिए उन्हें वक़्त लगेगा.

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English summary
Manto likes young because he used to talk about sex

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