'हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व' पर आपस में घिरी कांग्रेस, सांसद मनीष तिवारी बोले- 'कंफ्यूज हूं, पार्टी पर फोकस हो'

'हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व' पर आपस में घिरी कांग्रेस, अब सांसद मनीष तिवारी बोले- 'कंफ्यूज हूं, पार्टी पर फोकस हो'

नई दिल्ली, 18 नवंबर: कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में कहा था कि 'हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व' में क्या अंतर है, ऐसे विषयों पर पार्टी में चर्चा होनी चाहिए। राहुल गांधी के अलावा कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इन दिनों 'हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व' को लेकर बहस कर रहे हैं। इन सब के बीच कांग्रेस के लोकसभा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने इस बहस के वक्त पर सवाल उठाया है। मनीष तिवारी ने बुधवार (17 नवंबर) को कहा है कि धर्म के बारे में छोड़कर हमें कांग्रेस पार्टी के विचारों और मूल्यों को मजबूत करने के बारे में सोचना चाहिए। मनीष तिवारी ने बुधवार को कहा कि यह एक अकादमिक बहस है इसके बजाय कांग्रेस को अपने समकालीन विषयों पर चर्चा करनी चाहिए।

'कांग्रेस में हूं...क्योंकि नेहरूवादी में विश्वास करता हूं...'

'कांग्रेस में हूं...क्योंकि नेहरूवादी में विश्वास करता हूं...'

कांग्रेस के हिन्दूवाद वाले मुद्दे पर मनीष तिवारी ने कहा, यह सब बहुत कंफ्यूजिंग है, मैं कंफ्यूज हो रहा हूं...इनसब के बीच हम बहुत अहम चीजों को भूल रहे हैं। अगर मुझे लगता है कि मेरी धार्मिक पहचान ही, मेरी राजनीति का आधार है, तो मैं फिर किसी बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक राजनीतिक पार्टी में होता। लेकिन मैं कांग्रेस में हूं...क्योंकि मैं नेहरूवादी में विश्वास करता हूं।''

'बहस इस बात पर होनी चाहिए कि कांग्रेस को कैसे मजबूत करें'

'बहस इस बात पर होनी चाहिए कि कांग्रेस को कैसे मजबूत करें'

द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए मनीष तिवारी ने कहा कि हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व एक अकादमिक बहस है और "जब आप अकादमिक उद्देश्य के अलावा राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस अंतर को आजमाते हैं और बहस करते हैं तो इसका एक साफ मतलब है कि आप किसी और के मैदान पर खेल रहे हैं।''

मनीष तिवारी ने कहा, ''अगर बहस होनी ही चाहिए, तो बहस इस बात पर होनी चाहिए कि आप कांग्रेस पार्टी की मूल विचारधारा और मूल मूल्यों को कैसे मजबूत करते हैं।''

'खून से सने विभाजन में भी कांग्रेस अपने विश्वास में अडिग थी'

'खून से सने विभाजन में भी कांग्रेस अपने विश्वास में अडिग थी'

मनीष तिवारी ने कहा, ''खून से सने विभाजन के बावजूद, महान तबाही और बड़ी त्रासदी के दिनों में भी, कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता में अपने विश्वास में अडिग थी। और इसलिए, कांग्रेस का मूल तत्व उदारवाद, बहुलवाद और प्रगतिवाद के मूल्यों के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। इसलिए, किसी भी अन्य बहुसंख्यकवादी या अल्पसंख्यक विचारधारा पर कोई भी बहस कांग्रेस के लोकाचार के लिए अच्छा नहीं है।''

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