क्या ममता, राहुल, पवार और नीतीश PM इन वेटिंग है ?
क्या राहुल गांधी, ममता बनर्जी, शरद पवार और नीतीश कुमार पीएम इन वेटिंग है ? कांग्रेस तो बहुत पहले से राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री मानती रही है। लेकिन अब ममता बनर्जी, शरद पवार और नीतीश कुमार को भावी पीएम के रूप में प्रोजेकट करने की कोशिश हो रही है। क्या ये नेता नरेन्द्र मोदी को सत्ता से बेदखल करने की क्षमता रखते हैं ? हालांकि इन नेताओं के कभी खुद को इस होड़ में शामिल नहीं बताया है। लेकिन उनकी पार्टी कुछ बड़े सिपहसलार इस चर्चा को हवा देते रहते हैं।

क्या राहुल, पवार, नीतीश नेता मानेंगे ममता को?
लगातार तीसरा विधानसभा चुनाव जीत कर ममता बनर्जी विपक्ष की सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में स्थापित हो चुकी हैं। उन्होंने हाल में कहा कि अब हर दो महीने पर दिल्ली आती रहेंगी। जाहिर है वे मोदी विरोधी मुहिम का स्तंभ बनना चाहती हैं। शरद पवार दिल्ली में थे लेकिन उनकी ममता बनर्जी से मुलाकात नहीं हो पायी। ममता बनर्जी के चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने शरद पवार से मिल कर मोदी विरोधी मोर्चा तैयार करने की कोशिश की थी। लेकिन यह कोशिश परवान न चढ़ी। सबकी अपनी-अपनी महत्वाकांक्षा है। एंटी मोदी फ्रंट का लीडर कौन होगा ? लोकप्रियता के हिसाब ममता बनर्जी विपक्ष के अन्य नेताओं से बहुत आगे हैं। लेकिन क्या शरद पवार, राहुल गांधी और नीतीश कुमार ममता बनर्जी को अपना नेता मानेंगे ? राहुल गांधी और नीतीश कुमार तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि विपक्ष का कोई एक दल अकेले भाजपा को चुनौती देने में सक्षम नहीं है।

नीतीश और पवार की चर्चा क्यों ?
नीतीश कुमार बार-बार कहते रहे हैं कि वे बिहार की सेवा कर के ही खुश हैं। इससे अधिक वे कुछ और नहीं सोचते। इसके बाद भी उनके दल के वरिष्ठ नेता रह-रह कर ये जुमला क्यों उछाल देते हैं कि नीतीश पीएम मटेरियल हैं ? यह बयान जेडीयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने दिया था। संगठन में कुशवाहा का पद बहुत ही शक्तिशाली है। इस बयान से जब भाजपा असहज हो गयी तो कुशवाहा सफाई देने पर मजबूर हो गये। नीतीश कुमार ने भी ऐसी किसी चाहत से इंकार कर दिया। ऐसा कई बार हो चुका है जदयू का कोई नेता नीतीश कुमार को पीएम मटेरियल बताता है और फिर बाद में इस बयान पर लीपापोती होने लगती है। ऐसा होता क्यों है ? राजनीति, हाथी के दांत की तरह है। खाने के लिए और, दिखाने के लिए और। शरद पवार भारतीय राजनीति के सबसे अनुभवी नेतओं में एक हैं। उनकी राजनीति सूझबूझ भी काबिलेतारीफ है। लेकिन उनके पास ऐसा संख्याबल (सांसद) नहीं है कि वे राष्ट्रीय राजनीति में केन्द्रीय भूमिका निभा सकें। उनकी उम्मीद बस इतनी है कि अगर चुनाव के बाद विपक्ष के किसी सर्वमान्य नेता का प्रश्न आये तो वे खुद को आगे कर सकें। नीतीश कुमार के साथ भी यही स्थिति है।

क्या प्रशांत किशोर कायाकल्प करेंगे कांग्रेस की ?
राहुल गांधी कांग्रेस की उम्मीद हैं। कांग्रेस 2004 से 2014 तक सत्ता में रही थी। लेकिन पिछले सात साल में कांग्रेस की पारी इतनी बुरी तरह लड़खड़ गयी है कि उसे संभलाना मुश्किल हो गया है। क्या इस स्थिति में राहुल गांधी उस नरेन्द्र मोदी को चुनौती दे पाएंगे जो लगातार सात साल से प्रधानमंत्री के पद पर बने हुए हैं ? कहा जा रहा है कि राहुल गांधी की किस्मत संवारने के लिए अब प्रशांत किशोर आने वाले हैं। चर्चा के मुताबिक प्रशांत किशोर कांग्रेस में कोई बड़ा पद लेकर राहुल गांधी का कायाकल्प करेंगे। क्या राहुल गांधी इस रामवाण से नरेन्द्र मोदी का मुकाबला कर पाएंगे ? कुछ समय पहले प्रशांत किशोर से एक सवाल पूछा गया था कि वे राहुल गांधी के बारे में क्या सोचते हैं ? नरेन्द्र मोदी के साथ उनकी तुलना कैसे करेंगे ? तब प्रशांत किशोर ने इस सवाल का बेबाकी से जवाब दिया था।

राहुल गांधी कितने मजबूत ?
प्रशांत किशोर ने कहा था, राहुल गांधी से मेरी दो मुद्दों पर असहमति है। पहला, राहुल गांधी यह सोचते हैं कांग्रेस का पुनर्जीवन केवल परम्परागत उपायों से ही संभव है। जब कि मेरा मानना है कि कांग्रेस को चुनाव जीतने के लिए आधुनिक तरीकों पर अमल करना चाहिए। दूसरा, राहुल गांधी का मानना है कि केवल नरेन्द्र मोदी को टारगेट करने से भाजपा कमजोर हो जाएगी। फिर कांग्रेस खुदबखुद मजबूत हो जाएगी। जब कि मेरा मानना है कि कांग्रेस को फिर खड़ा करने के लिए लॉन्ग टर्म प्लान बनाने की जरूरत है। इसके लिए ग्रासरुट पोलिटिक्स जरूरी है। हो सकता है कि इसमें कुछ समय लगे लेकिन ऐस करना मेरी नजर में ठीक रहेगा। उन्होंने राहुल गांधी और नरेन्द्र के बीच तुलना करते हुए कहा था, नरेन्द्र मोदी बहुत साहसी हैं और बेहिचक जोखिम उठाते हैं। वे तुरंत रिस्की फैसले लेने की क्षमता रखते हैं। वे अपने सलहाकारों की बात बड़े गौर से सुनते हैं। विभिन्न माध्यम से मिलने वाली सूचनाओं का सुक्ष्म विश्लेषण करते हैं। फिर अपनी राय कायम करते हैं। जब कि राहुल गांधी यथास्थितिवादी हैं। वे बहुत बड़े बदलाव से हिचकते हैं। हो सकता है कि वर्षों पुरानी पार्टी में ऐसा करना आसन न हो। लेकिन राजनीति में साहसिक फैसले लेने पड़ते हैं। यानी अभी जितने भी पीएम इन वेटिंग हैं उनके भविष्य को लेकर राजनीतिक तस्वीर साफ नहीं है।












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