लोकसभा चुनाव के लिए ममता का प्लान 'ए', प्लान 'बी'

प्लान ए 'अकेले लड़ेंगी चुनाव'
सितंबर 2012 में कथित तौर पर आम जनता के खिलाफ एफडीआई नीतियां होने के कारण यूपीए से अलग होने वाली ममता ने खुद को जनता का मसीहा घोषित कर दिया, साथ ही बंगाली राष्ट्रवाद को भी नई पहचान दी। वहीं उत्तर प्रदेश मे सर्वाधिक लोकसभा सीटें होने पर भी सपा को बेहतर सफलता नहीं मिलती हुई दिख रही है, अत: वह खुद को तीसरे मोर्चे की संभावना पर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर भी देख रही हैं। आम चुनाव के बाद 2016 में बंगाल में विधानसभा चुनाव हैं, वह इन्हें जीतकर बिहार, उड़ीसा और तमिलनाडु की सरकार की तरह राज्य में भी सत्ता बरकरार रखना चाहती हैं।
पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा सीटें हैं, ममता बंगाल के बाहर भी कई सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार रही हैं, हालांकि कहा यह भी जा रहा है कि भाजपा को हराना बनर्जी के लिए आसान नहीं होगा, लेकिन अगर वह बंगाल और इसके बाहर 42 सीटें जीतने में भी कामयाब हो जाती हैं तो तीसरे मोर्चे के लिए आवश्यक 230 प्रत्याशियों को एक साथ ला सकती हैं।
प्लान बी 'मोदी के साथ भी आ सकती हैं'
जैसा सर्वे दिखा रहे हैं अगर वैसा ही परिणाम एनडीए को मिला और एनडीए 210-230 सीटें जीतने में कामयाब रहा तो ममता मोदी के साथ भी आ सकती हैं। वहीं अगर भाजपा को मुस्लिमों का बेहतर समर्थन मिलता है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो ममता के पास एनडीए के साथ आने के अलावा और कोई विकल्प ही न रहेगा। अत: उन्होने दोनों विकल्प खुले रखे हैं।
राज्य के विकास के लिए केंद्र की सहायता जरूरी
ममता को राज्य के विकास के लिए केंद्र सरकार की मदद की आवश्यकता है, वह यूपीए से तो अलग हो गयी थी लेकिन एनडीए को दरकिनार करना उनके लिए आसान नहीं होगा। उन्होने अपने भाषण में कहा था कि मैं दंगा करने वालों का समर्थन नहीं करूंगी, लेकिन उन्होने यह साफ नहीं किया कि वह 1984 दंगों की बात कर रही हैं या फिर 2002 के गुजरात दंगो की। यह ध्यान देने योग्य है कि राहुल गांधी द्वारा दिये गये एक इंटरव्यू में 1984 में हुए दंगो का जिक्र होने पर यह मुद्दा आजकल चर्चा में है।












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