महाराष्ट्र में गवर्नर कोटे से 12 MLC की नियुक्ति! विधानसभा चुनाव से पहले बड़े दांव की तैयारी में महायुति
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश की महायुति सरकार विधान परिषद में गवर्नर कोटे की खाली पड़ी 12 सीटों को भरने की तैयारी में है। यह सीटें पिछले चार वर्षों से खाली पड़ी हैं।
डेक्कन हेराल्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी गठबंधन की सरकार ने गवर्नर कोटे वाली एमएलसी की 12 खाली सीटों को भरने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। हालांकि, यह राज्य में बड़े राजनीतिक घमासान की वजह बन सकता है।

अगस्त के अंत तक गवर्नर कोटी की सीटें भरने की तैयारी-रिपोर्ट
महाराष्ट्र में अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं, जानकारी के मुताबिक महायुति सरकार इसी वजह से अगस्त महीने तक विधान परिषद की गवर्नर कोटे वाली सभी सीटों पर सदस्यों को मनोनीत करने की प्रक्रिया पूरी कर लेना चाहती है।
मुसलमान को भी प्रतिनिधित्व देने पर विचार- महायुति नेता
एक वरिष्ठ महायुति नेता ने कहा है, 'हम चाहते हैं कि राज्यपाल कोटे से एमएलसी नियुक्त करने की प्रक्रिया अगस्त के अंत तक पूरी कर लें, जबतक कि आदर्श आचार संहिता लागू हो। इसके अलावा परिषद में कोई मुस्लिम सदस्य नहीं है। हम यह भी देखेंगे कि मुसलमानों को प्रतिनिधित्व मिले।'
जानकारी के मुताबिक 12 एमएलसी में से महायुति की तीनों पार्टियों को कितनी-कितनी सीटें मिलेंगी, इसपर भी सहयोगी दलों में चर्चा चल रही है।
उद्धव ठाकरे की सरकार की सिफारिशें लंबित रह गई थी
इससे पहले 6 नवंबर, 2020 को उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार ने तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को राज्यपाल कोटे से विधान परिषद में नियुक्ति के लिए 12 नाम सौंपे थे। लेकिन, उन्होंने इसपर फैसला नहीं लिया था। बाद में उनकी सरकार ही गिर गई और एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली सरकार बन गई।
संविधान के अनुच्छेद 171(5) में है व्यवस्था
महाराष्ट्र में राज्य कैबिनेट की सिफारिश पर राज्यपाल 6 वर्षों के लिए 12 एमएलसी को मनोनीत करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 171(5) के अनुसार इस तरह से मनोनीत होने के लिए आवश्यक है कि वह सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा में से किसी भी क्षेत्र में विशेष ज्ञान रखता हो या उसे इन क्षेत्रों में काम करने का लंबा अनुभव रहा हो।
हालांकि, इस संबंध में बॉम्बे हाई कोर्ट में कुछ याचिकाएं लंबित हैं और राज्य सरकार आगे बढ़ने से पहले उसको लेकर भी कानूनी राय लेने में जुटी है। राज्यपाल इस मामले में कैबिनेट की सिफारिश को मानने के लिए बाध्य है, लेकिन वह कितने समय में फैसला ले, इसकी कोई समय-सीमा निश्चित नहीं है।












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