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महाराष्ट्र और झारखंड में भी BJP अपनाएगी यही रणनीति? हरियाणा की जीत से बढ़ा मनोबल

Maharashtra and Jharkhand Election: हरियाणा में भाजपा की लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से चुनाव जीतने की उसकी सोशल इंजीनियरिंग वाली रणनीति पर मुहर लग गई है। हरियाणा में बीजेपी के अबतक की सबसे बड़ी बहुमत से सत्ता में बरकरार रहना इस मायने में और भी ज्यादा खास है, क्योंकि अगले हफ्ते महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा के चुनाव घोषित होने की भी संभावना है। लोकसभा चुनावों में रणनीतिक झटके के बाद हरियाणा की सफलता ने बीजेपी का मनोबल बहुत बढ़ा दिया है।

हरियाणा चुनाव के दौरान जिस तरह से सबसे ज्यादा आबादी वाली जाति जाटों को कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद बताया जा रहा था, बीजेपी ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग से उन आशंकाओं की हवा निकाल दी है। इससे भाजपा का महाराष्ट्र और झारखंड चुनाव के लिए काफी हौसला काफी बढ़ गया है।

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हरियाणा की जीत ने बीजेपी को दे दी अपनी रणनीति मजबूत करने की वजह
अगर इस साल के लोकसभा के चुनाव नतीजों पर गौर करें तो महाराष्ट्र में सबसे प्रभावशाली मराठा और झारखंड में आदिवासी वोटर बीजेपी के खिलाफ नजर आए थे। कुछ यही हाल हरियाणा में जाटों का भी रहा, लेकिन बीजेपी की गैर-जाट मतदाताओं को एकजुट करने वाली रणनीति वहां काम कर गई है।

बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग का आधार छोटी-छोटी ओबीसी जातियां
बीते एक दशक से या यूं कहें कि जब से भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेताओं का सिक्का चल रहा है, पार्टी ने छोटी-छोटी जातियों और अति-पिछड़ों को गोलबंद करने पर काफी काम किया है। पार्टी लगातार इस सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रही है।

हरियाणा की जीत के बाद रणनीति को और ठोस कर सकती है पार्टी
इस बार हरियाणा विधानसभा चुनाव में यह देखा गया है कि सैनी, कुम्हार, खाती (बढ़ई) और नाई (हज्जाम) जैसी जातियों ने बड़े पैमाने पर बीजेपी को वोट दिया है। जाट बिरादरी के दबदबे वाले राज्य में यह जातियां एक मजबूत वोट बैंक बनकर उभरी हैं। अलग-अलग जातिगत व्यवसायों से जुड़ी ये जातियां राज्य में बीजेपी का नया जनाधार बनी हैं।

महाराष्ट्र और हरियाणा चुनावों के लिए मिली ताकत
बीजेपी महाराष्ट्र और झारखंड में भी अपनी इस तरह की सोशल इंजीनियरिंग पर काम करती आ रही है, लेकिन हरियाणा की कामयाबी ने उसे अपनी रणनीति पर और भी ज्यादा फोकस करने की ताकत दे दी है। इन दोनों राज्यों में भी आने वाले चुनावों में पार्टी गैर-प्रभावशाली जातियों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपना सकती है।

इसके तहत भाजपा महाराष्ट्र में गैर-मराठा+ऊंची जातियों के वोटरों पर ज्यादा जोर लगाने की रणनीति अपना सकती है तो झारखंड में गैर-आदिवासी जातियों और अगड़े वोटरों को एकजुट करने की रणनीति पर चल सकती है।

महाराष्ट्र और झारखंड में सीट बंटवारे पर भी पड़ सकता असर
हरियाणा के परिणाम ने महाराष्ट्र और झारखंड में पार्टी को अपने सहयोगियों से भी सीटों की डील करने के लिए एक बड़ी ताकत दी है। लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र में पार्टी सिर्फ 9 ही सीटें जीती थी और शिवसेना को 7 सीटें मिलीं। बदले माहौल में बीजेपी का कद फिर से बढ़ चुका है और उसके सहयोगियों को उसकी बातों पर गौर करना पड़ सकता है।

महाराष्ट्र भाजपा सूत्रों का भी यही कहना है कि पार्टी अपने सहयोगियों के साथ तालमेल को लेकर बहुत ही लचीली है, लेकिन वह राज्य के सभी इलाकों में चुनाव लड़ेगी, क्योंकि इसमें अपने सहयोगियों के लिए भी वोट खींचने की क्षमता है।

रही बात झारखंड की तो वहां ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (AJSU) बीजेपी की सबसे भरोसेमंद और बड़ी सहयोगी है। वहां सीटों के तालमेल को लेकर इसके नेता सुदेश महतो भाजपा के केंद्रीय नेताओं से दो बार मुलाकात भी कर चुके हैं। आजसू राज्य में इस बार 13 सीटें मांग रही है। लेकिन, बीजेपी उसे 8 सीटों का ऑफर दे रही है, जितने पर 2014 में वह लड़ी थी और उनमें से 5 जीती थी।

लेकिन, 2019 में दोनों के बीच गठबंधन नहीं हुआ था और आजसू 53 सीटों पर लड़ गई थी, लेकिन सिर्फ दो ही सीटें जीत सकी थी। अब जब हरियाणा में भाजपा की अप्रत्याशित जीत हुई है, वह सुदेश महतो को हर हाल में 10 से कम सीटों पर मनाने की कोशिश करेगी। क्योंकि, इस बार वह जेडीयू और एलजेपी (रामविलास) को भी 1 से 2 सीटों का ऑफर दे सकती है।

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