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M K Stalin: करुणानिधि की विरासत संभालने की चुनौती

By शिवकुमार उलगनाथन

एम के स्टालिन
M. K. Stalin @Facebook
एम के स्टालिन

पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके के अध्यक्ष करुणानिधि के अगस्त, 2018 में हुए निधन के बाद से तमिलनाडु की राजनीतिक पटल पर बहुत बदलाव देखने को मिला है.

हालांकि कहा जा सकता है कि इस बदलाव की शुरुआत एडीएमके सुप्रीमो और तत्कालीन मुख्यमंत्री रहीं जयललिता के दिसंबर, 2016 में हुए निधन से ही हो गई थी. लेकिन तमिलनाडु की राजनीति में करुणानिधि वह एक शख्स रहे, जिनके बिना यहां की राजनीति की बात संभव नहीं है.

डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) पार्टी ने 1967 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को राज्य की सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया था.

उस वक्त सीएन अन्नदुरै ने सत्ता संभाली और प्रदेश के मुख्यमंत्री बने लेकिन साल 1967 में उनकी मौत हो गई.

इसके बाद 1969 में यानी से आज से पचास साल पहले, करुणानिधि ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, साथ ही वे डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) के अध्यक्ष भी बने.

करुणानिधि के निधन के बाद उनकी जगह लेना या फिर पार्टी की कमान संभालना, किसी भी नेता के लिए बहुत बड़ी जिम्मेदारी है.

एम करुणनिधि के तीसरे बेटे, एमके स्टालिन (मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन) के लिए यह जिम्मेदारी कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि उनकी पार्टी बीते आठ साल से सत्ता में नहीं है.

एम के स्टालिन
Getty Images
एम के स्टालिन

स्टालिन में ना तो जयललिता जैसा करिश्मा है और ना ही अपने पिता करुणानिधि की तरह वे भाषण देने निपुण हैं. लेकिन काम करने का उनका अपना अंदाज है. इसकी झलक उन्होंने करुणानिधि के निधन के तुरंत बाद दिखाई थी.

07 अगस्त, 2018 को करुणानिधि का निधन हुआ था, इसके बाद जब राज्य सरकार ने करुणानिधि के अंतिम संस्कार के लिए मरीना बीच पर जगह नहीं दी तो डीएमके कैडर-समर्थक उपद्रव पर उतर आए थे.

डीएमके इस मामले को कोर्ट में ले गई. चेन्नई हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि करुणानिधि का अंतिम संस्कार मरीना बीच पर हो सकता है, जब यह फैसला आया उस वक्त लोग राजाजी हाल में अपने नेता को श्रदांजलि दे रहे थे, हाईकोर्ट का फैसला आते ही समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई.

लेकिन तब लोगों ने देखा कि करुणानिधि के बेटे और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन दोनों हाथ जोड़े, अपने कैडरों से शांति बनाए रखने की अपील कर रहे थे. करुणानिधि के अंतिम संस्कार के दौरान वे पूरी तरह से संयत नजर आए, अपनी भावनाओं पर काबू रखे हुए.

इसी स्टालिन ने अपने पिता के निधन के दिन एक बेहद भावनात्मक खत लिखा था. उस खत में उन्होंने लिखा था, "अपने पूरे जीवन में मैं आपको अप्पा (पिता) से ज्यादा थलेइवा (नेता) कह कर पुकारता रहा. अब क्या एक बार आपको अप्पा बुला सकता हूं, थलेइवा?"

इन पूरे घटना ने स्टालिन की छवि के पॉजिटिव रुख को लोगों के सामने रखा, हालांकि अभी कोई ये भी कह सकता है कि अभी ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी.

लेकिन स्टालिन के राजनीतिक करियर में सबसे बड़ा मुकाम आना अभी बाकी था. ये मुकाम 28 अगस्त, 2018 को तब आया जब वे डीएमके काउंसिल की बैठक में निर्विरोध पार्टी अध्यक्ष चुन लिए गए. वे अब उस शख्स की जगह ले चुके थे, जो ना केवल उनके पिता थे बल्कि ऐसे नेता थे जिन्होंने अपनी पार्टी का तमाम उतार चढ़ाव के बीच 50 सालों तक नेतृत्व किया था.

एम के स्टालिन
M. K. Stalin @Facebook
एम के स्टालिन

स्टालिन की शुरुआत

1970 के दशक के शुरुआती सालों में स्टालिन ने पार्टी में अपनी शुरुआत की. लेकिन तब उनकी पहचान मुख्यमंत्री करुणानिधि के बेटे भर की थी.

मीसा (एमआईएसए) आंदोलन के 1975 में वे गिरफ्तार भी हुए और जेल के अंदर उनको प्रताड़ित किए जाने की ख़बरें भी आईं. इनसे पार्टी कैडरों में उनका सम्मान बढ़ा, लोगों की संवेदना भी उनसे जुड़ीं.

इसके बाद स्टालिन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. स्टालिन अगस्त, 2018 में पार्टी के अध्यक्ष बने. लेकिन यहां तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं रहा. उन्हें तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

उन्होंने अपने स्कूली दिनों से ही राजनीति शुरू कर दी थी. उन्होंने चेन्नई के गोपालापुरम में पार्टी के यूथ विंग का निर्माण किया और पार्टी के सिद्धांतों से उन्हें जोड़ा.

1970 के शुरुआती सालों में स्टालिन युवाओं को अपनी पार्टी की बैठकों में आने के लिए प्रोत्साहित करते और अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार भी करते.

1980 में करुणानिधि ने पार्टी के यूथ विंग की शुरुआत मदुरै में की थी. स्टालिन इसके शुरुआती संयोजक थे. 1984 में उन्हें यूथ विंग का सचिव बनाया गया. स्टालिन लंबे समय तक इस पद पर बने रहे.

थोड़े समय तक के लिए वे पार्टी के उप महासचिव भी बनाए गए, 2008 में वे पार्टी के कोषाध्यक्ष बने.

जनवरी, 2017 में वे पार्टी के पहले कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए.

एम के स्टालिन
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स्टालिन का चुनावी प्रदर्शन

1984 में पहली बार स्टालिन विधानसभा का चुनाव लड़े, हालांकि थाउजेंड लाइट्स क्षेत्र से वे एडीएमके के एक वरिष्ठ नेता के हाथों मामूली अंतर से चुनाव हार गए थे. हालांकि बाद में वे उसी विधानसभा क्षेत्र से 1989, 1996, 2001 और 2006 का चुनाव जीतने में कामयाब रहे. इस बीच 1991 का चुनाव वे हार भी गए थे.

2011 और 2016 में वे कोलाथुर विधानसभा से चुनाव मैदान में उतरे और दोनों बार जीतने में कामयाब रहे.

फिलहाल राज्य विधानसभा उनकी मौजूदा भूमिका प्रतिपक्ष के नेता की है.

एम के स्टालिन
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स्टालिन की प्रशासनिक क्षमता

2006 में जब डीएमके सत्ता में आई तो स्टालिन को राज्य के स्थानीय प्रशासनिक मामलों का मंत्री बनाया गया. वे पांच साल तक इस महकमे के मंत्री रहे और इस दौरान उनकी प्रशासनिक क्षमता की काफी तारीफें हुईं.

इससे पहले 1996 से 2000 के बीच वे चेन्नई के मेयर भी रहे और इस दौरान उनके किए कामों के चलते उन्हें प्रशंसा भी मिली. उन्होंने न केवल शहर के सड़कों की स्थिति में सुधार किया बल्कि आधारभूत ढांचों को भी बढ़ाया जिसके चलते पार्टी के कैडर और आम लोग उन्हें आज भी याद करते हैं.

2001 में स्टालिन, करुणानिधि और कुछ अन्य लोगों को चेन्नई में ओवरपुल निर्माण में हुई धांधली के चलते गिरफ्तार होना पड़ा था. लेकिन बाद में सरकार ने इस बात पर कोई चार्जशीट दाखिल नहीं है.

एम के स्टालिन
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राज्य के पहले उप-मुख्यमंत्री

2009 में स्टालिन ने राज्य के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर इतिहास बना दिया.

कुछ रिपोर्टों में ये भी दावा किया गया कि स्टालिन ही 2014 के लोकसभा चुनाव और 2016 के राज्य विधानसभा चुनाव के मुख्य रणनीतिकार थे. उम्मीदवारों के चयन से लेकर सहयोगियों पर फैसला लेने में उनकी अहम भूमिका रही थी.

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आमलोगों से संपर्क

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले, जनवरी महीने में स्टालिन ने राज्य भर के लोगों से संपर्क करने के लिए 'ओरातची साबाई' कार्यक्रम की शुरुआत की, ऐसा ही कार्यक्रम में वे 2015 में 'नामाकुनामे' के तौर पर कर चुके हैं.

अपने इस कार्यक्रम के दौरान स्टालिन नारियल के पेड़ों के झुंड के नीचे या फिर कामचलाऊ टेंटों में बैठ कर आम लोगों से बात करते खूब नजर आए हैं. उनकी इस यात्रा को लोगों ने गंभीरता से लिया और स्टालिन की काफी तारीफ हुई.

इस संपर्क अभियान के दौरान स्टालिन आम लोगों से उनके कामकाज और आजीविका के साधनों की मुश्किलों के बारे में पूछ रहे हैं. वे कोई भाषण नहीं देते बल्कि लोगों की समस्याओं को गंभीरता से सुनते हैं.

पिछले कुछ चुनावी अभियान के दौरान स्टालिन अपने मार्निंग वॉक में लोगों, महिलाओं और युवाओं से हाथ मिलाकर मिलते दिखे हैं.

सार्वजनिक तौर पर भाषण देने के बदले आम लोगों से उनके दोस्तान व्यवहार का काफी असर हुआ है.

एम के स्टालिन
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किस बात के लिए होती है आलोचना

स्टालिन की तुलना अमूमन उनके अपने ही पिता से होती है. करुणानिधि ना केवल एक शानदार लेखक थे बल्कि उनमें भाषण देने की अद्भुत काबिलियत भी थी.

जब भी कभी स्टालिन से कोई मुहावरा या फिर नाम गलत निकलता है तो लोग पकड़ लेते हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल करते हैं.

हर नेता का लीडरशिप और भाषण देने की कला जैसे विभिन्न पहलुओं को लेकर एक अपना खास अप्रोच होता है. इसको लेकर स्टालिन को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि उनसे पहले डीएमके को हमेशा ऐसी पार्टी माना जाता रहा जो अपने नेता के भाषण देने की क्षमता और शानदार लेखन के चलते सत्ता में लौटती रही.

2015 में स्टालिन ने पूरे राज्य में नामाकुनामे से कैंपेन यात्रा निकाली थी, जिसमें वे समाज के सभी वर्ग के लोगों से मिल थे. इस अभियान की जितनी तारीफ हुई थी उतनी ही आलोचना भी हुई थी.

स्टालिन जिस तरह से सड़क के किनारे चाय वालों के पास रुक रहे थे, अपने पार्टी समर्थकों के साथ मोटरसाइकिल चला रहे थे, इन सबको उनके विरोधियों और आलोचकों ने स्टंट शो करार दिया था.

एम करुणानिधि अपने पार्टी के बड़े नेताओं मसलन अनबालागन, एरकॉट वीरासामी और दुरईमुरुगन के बेहद करीब थे. इन नेताओं को भी अपने पार्टी नेता को किसी भी मामले में सलाह देने की आजादी थी. लेकिन स्टालिन के इर्द-गिर्द गाइड करने वाले नेताओं का अभाव दिखता है.

एमके स्टालिन की इस बात के लिए भी आलोचना होने लगी है कि इन दिनों पार्टी में उनके बेटे उदयनिती स्टालिन की अहमयित बढ़ती जा रही है. उदयनिती तमिल सिनेमा के अभिनेता हैं और 2019 के चुनाव में डीएमके प्रत्याशियों के लिए प्रचार करेंगे.

उदयनिती पार्टी में किसी वरिष्ठ पद पर नहीं हैं लेकिन डीएमके के पोस्टर, बैनर और होर्डिंग में उनकी तस्वीर धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रही है.

विपक्षी पार्टी और मीडिया का एक तबका स्टालिन के बेटे को मिल रही अहमियत पर सवाल पूछती रही है लेकिन स्टालिन ने इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

यह भी पढ़ें | करुणानिधि: तमिलनाडु के सबसे बड़े सियासी स्क्रिप्टराइटर

एम के स्टालिन
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एम के स्टालिन

स्टालिन की अगली चुनौती

करुणानिधि के निधन के साथ ही, स्टालिन को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं. डीएमके पार्टी और राजनीतिक परिदृश्य पर उनके पास समय भी काफी है.

2016 में जब जयललिता का निधन हुआ था तो एआईडीमके में असंतोष देखने को मिला और पार्टी दो गुटों में बंट भी गई थी. ऐसे में स्टालिन के लिए सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि वे किस तरह से अपनी पार्टी को एकजुट रखते हैं.

स्टालिन और उनके भाई एमके अलागिरी के बीच के मतभेद को राजनीतिक विश्लेषक गंभीरता से देख रहे हैं. अलगिरी को पार्टी से हटाए जाने के बाद दोनों के समर्थकों के बीच खाई के बढ़ने की आशंका भी है.

बहरहाल ये भी माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पार्टी के अंदर या बाहर में सहयोगी पार्टियों के साथ मित्रवत व्यवहार के साथ स्टालिन अपने डायनामिक अप्रोच के साथ काम करते नजर आएंगे.

BBC Hindi
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English summary
M K Stalin The challenge to take over the legacy of Karunanidhi
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