तो एग्जिट पोल में साउथ इंडिया में इसलिए पिछड़ रही है BJP

नई दिल्ली- अगर एग्जिट पोल (Exit Polls) पर यकीन करें, तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस लोकसभा चुनाव में हिंदी हार्टलैंड और पश्चिम भारत से निकलकर पूर्वी और पूर्वोत्तर (North-East) भारत में भी धमाकेदार दस्तक देने जा रही है। भाजपा (BJP)को ये बढ़त पश्चिम बंगाल (West Bengal), ओडिशा (Odisha) और पूर्वोत्तर ( North-East) के उन राज्यों में मिल रही है, जहां कुछ साल पहले तक उसका कोई खास वजूद नहीं था। लेकिन, सवाल उठता है कि कर्नाटक (Karnataka) को छोड़ दें, तो पूरे साउथ इंडिया (South India) में वर्षों की मेहनत के बावजूद पार्टी इस बार भी कुछ खास क्यों नहीं कर पा रही है? इसके लिए हमें दक्षिण के हर राज्यों का अलग-अलग राजनीतिक विश्लेषण करना होगा।

कर्नाटक

कर्नाटक

भारतीय जनता पार्टी (BJP) खुद को पैन-इंडिया पार्टी बताने लगी है। लेकिन, दक्षिण में वह कर्नाटक (Karnataka) से आगे इस बार भी ज्यादा बढ़त बनाती नहीं दिख रही है। हां ये हो सकता है कि बाकी दक्षिणी राज्यों में वह इस बार अपने वोट शेयर में कुछ इजाफा जरूर कर ले। दरअसल, भारत की राजनीति काफी हद तक जाति एवं धर्म के आधार पर तय होती है। इस लिहाज से बीजेपी के लिए हिंदी-हार्टलैंड और पश्चिम के राज्य पूरी तरह से फिट बैठते हैं। कर्नाटक की राजनीति में भी जाति एवं धर्म (caste and religion) का दबदबा है और इसलिए यह राज्य भाजपा की सियासत के लिए भी माकूल साबित होता आया है। इस बार भी सारे एग्जिट पोल प्रदेश में बीजेपी (BJP) के लिए बहुत ही अच्छी भविष्यवाणियां कर रहे हैं और कुछ तो वहां से कांग्रेस का सफाया होने तक का अनुमान लगा रहे हैं।

केरल

केरल

केरल (Kerala) की राजनीतिक लड़ाई हमेशा कांग्रेस और लेफ्ट के बीच सिमटी रही है। भारत के दूसरे राज्यों की राजनीति में जिस तरह जाति एवं धर्म (caste and religion) का प्रभाव है, केरल भी उससे अछूता नहीं है। लेकिन, केरल के धार्मिक समीकरण का ताना-बाना कुछ ऐसा है, जो बीजेपी के विस्तार की राह को रोक देता है। केरल (Kerala) की आबादी में मुसलमान- 26.6% और क्रिश्चियन- 18.4% हैं, जो बीजेपी के वोटबैंक नहीं माने जाते। और कांग्रेस एवं लेफ्ट इन्हें अपना समर्थक मानती है। इनकी कुल आबादी 45% हो जाती है और इसी के चलते इस बार भी बीजेपी यहां काफी कोशिशों के बावजूद कोई बहुत बड़ा उलटफेर करती नजर नहीं आ रही है।

तमिलनाडु

तमिलनाडु

तमिलनाडु (Tamilnadu) की सियासत पूरी तरह से द्रविड़ भावनाओं से जुड़ी हुई है। यहां के लोगों को द्रविड़ संस्कृति पर गर्व है। जबकि, बीजेपी की छवि एक हिंदी हार्टलैंड की पार्टी वाली बनी हुई है और इसलिए यहां के लोग उससे आसानी से खुद को कनेक्ट नहीं कर पाते हैं। मोटे तौर पर राज्य में दो बड़ी द्रविड़ पार्टियों एआईएडीएमके (AIADMK)और डीएमके (DMK)का कब्जा है और भाजपा (BJP) अबतक इनके बीच अपनी खास जगह नहीं बना पाई है। अलबत्ता इस बार उसने काफी गुणा-भाग किया है, लेकिन एग्जिट पोल के रिजल्ट उसको लेकर खामोश ही रह गए हैं। इसके अलावा एक कारण ये भी है कि तमिलनाडु में भाजपा के पास यहां कोई बड़ा चेहरा नहीं है।

आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) में भाजपा का अपना मजबूत संगठन अब तक खड़ा नहीं हो पाया है। दूसरी बात ये है कि जब से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का विभाजन हुआ है, केंद्र में बीजेपी की सरकार है। राज्य की दोनों बड़ी पार्टियां सत्ताधारी टीडीपी (TDP) और विपक्षी वाईएसआरपी (YSRCP) राज्य के लोगों के मन में यह बात डालने में कामयाब रही है कि मोदी सरकार उसे विशेष राज्य का दर्जा नहीं दे रही है। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू (Chandrababu Naidu) ने तो इसी मुद्दे पर बीजेपी और पीएम मोदी के खिलाफ मोर्चा ही खोला हुआ है। माना जा सकता है कि इसी के चलते इस बार भी भाजपा का यहां खाता नहीं खुलने जा रहा है।

तेलंगाना

तेलंगाना

जिन परिस्थितियों में आंध्र से अलग होकर तेलंगाना (Telangana) का गठन हुआ, उसने राज्य में टीआरएस (TRS) के चीफ और राज्य के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (K Chandrashekar Rao) का कद बहुत ऊंचा बना दिया है। राज्य की राजनीति में वे इस कदर छाए हुए हैं कि खुद ही मिड-टर्म पोल करा लिया और 119 सीटों वाले विधानसभा में 88 सीटें जीत लीं। 2014 में भी उनकी पार्टी को विधानसभा में 63 और लोकसभा में 17 में से 11 सीटें मिली थीं। एग्जिट पोल में उनकी पार्टी की सीटें और भी बढ़ने का अनुमान जताया गया है। पिछले लोकसभा चुनाव में यहां भाजपा (BJP) ने एक सीट जीती थी और इस बार भी टीआरएस (TRS) और केसीआर (KCR) के बढ़ते प्रभाव के चलते बीजेपी के विस्तार की संभावना तो नहीं के ही बराबर ही नजर आ रही है।

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