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लोकसभा चुनाव 2019: निर्भया के माता-पिता पूछ रहे हैं, 'क्यों वोट दें? किसके लिए वोट दें?'

By सिन्धुवासिनी

निर्भया की मां आशा देवी और पिता बद्रीनाथ सिंह
BBC
निर्भया की मां आशा देवी और पिता बद्रीनाथ सिंह

'सामूहिक' शब्द के साथ

'बलात्कार' शब्द का जुड़ना

'समूह' और 'बलात्कार' का एकाकार होना है

यानी 'समूह' जैसी महान संज्ञा से जन्मे

'सामूहिक' जैसे विशेषण का

एक जघन्य क्रिया से किसी रूप में जुड़ना

पूरे समूह का गुनहगार होना है...

कुंवर नारायण की लिखी कविता की ये पंक्तियां तीन-चार बार पढ़िए और सामूहिक बलात्कार से जूझने वाली किसी महिला का रेखाचित्र ख़ुद-ब-ख़ुद आपकी आंखों के सामने आ जाएगा.

यहां कुंवर नारायण सामूहिक बालात्कार के होने को 'पूरे समाज का गुनहगार होना' बता रहे हैं और उनकी इसी बात को दुहरा रहे हैं 'निर्भया' के माता-पिता.

निर्भया. हां, वही निर्भया. 23 साल की वो लड़की जिसके साथ 16 दिसंबर, 2012 की रात को भारत की राजधानी दिल्ली में एक चलती बस में छह पुरुषों ने सामूहिक बलात्कार किया था.

किसी एक बलात्कार की दूसरे बलात्कार से तुलना नहीं की जा सकती. सभी बलात्कार अपने आप में बर्बर और जघन्य होते हैं लेकिन कई बलात्कार ऐसे होते हैं जिनकी बर्बरता को भारतीय क़ानून की जटिल भाषा में 'रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर' यानी 'जघन्यतम अपराध' कहा जाता है.

बलात्कार के ऐसे मामलों में अपराधियों के लिए फांसी की सज़ा का प्रावधान भी है. बलात्कार के मामलों में फांसी की सज़ा कितनी कारगर है, ये एक अलग बहस का मुद्दा है. वैसे भी जब मैं निर्भया के माता-पिता से मिलने उनके दो कमरों के फ़्लैट में घुसी तो ये बहस और तकनीकी सवाल मेरे ज़हन से लगभग ग़ायब हो चुके थे.

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आशा देवी
Getty Images
आशा देवी

मेरा ध्यान बस उन कमरों के पर्दों, कमरों में लगी ट्यूबलाइट की मद्धिम और फीकी रोशनी सी मुस्कान लिए निर्भया की मां आशा देवी के चेहरे पर था. शाम के तक़रीबन पांच बजे होंगे और वो किचन में थीं.

दीवार पर शीशे की एक बड़ी शेल्फ़ लगी थी. शेल्फ़ में ढेरों ट्रॉफ़ियां, मोमेंटो और तस्वीरें थीं. एक तस्वीर निर्भया की मां और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात की भी थी. एक बोर्ड पर निर्भया मामले से जुड़ी ख़बरों वाले अख़बारों की कतरनों को सलीक़े से लगाया गया था.

निर्भया से जुड़ी इतनी चीज़ें घर में रखकर भला उसे भूल पाना कैसे मुमकिन होगा? मैंने ये बेवक़ूफ़ी भरा सवाल ख़ुद से पूछा और जवाब भी ख़ुद को ही दिया-ये चीज़ें घर में न होती तो क्या मां-बाप का दिल उसे भूला देता?

भावनाओं के इस समंदर से किसी तरह पार होते हुए मैंने आशा देवी और बद्रीनाथ से वो सवाल किया जिसका जवाब जानने के मक़सद से मैं उनके घर तक गई थी.

आशा देवी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
Badrinath Singh/BBC
आशा देवी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

'अब भी हमलोग 2012 में ही खड़े हैं'

पहला सवाल यही किया, "आप दोनों ने वोट न देने का फ़ैसला क्यों किया?"

सवाल सुनकर आशा देवी ने रुंधी हुई आवाज़ में बोलना शुरू किया, "उस बच्ची को हमने अपने सामने एक-एक सांस छोड़ते देखा है. मरने से पहले उसे एक बूंद पानी तक नसीब नहीं हुआ. मांगती भी थी पानी, कहती थी प्यास लगी है...लेकिन नहीं दिया जाता था...सरकारें बदल गईं लेकिन हम उसी एक इंसाफ़ के लिए दौड़ रहे हैं. हमने परेशान होकर ये फ़ैसला लिया. कहा जाता है कि वोट देना हमारा अधिकार है...तो हमारा भी तो अधिकार है कि हमें इंसाफ़ मिले. हमने पांच साल तक बड़े धैर्य से इंतज़ार किया. हमें भरोसा था कि हमें इंसाफ़ मिलेगा लेकिन अगर महिलाओं की दुर्गति देखें तो आज भी हम 2012 में खड़े हैं."

निर्भया के पिता बद्रीनाथ अपनी पत्नी की बात आगे बढ़ाते हैं, "उस समय कहा जा रहा था कि अच्छे दिन आने वाले हैं, लेकिन हमारे लिए तो वही दिन और वही रात रह गए, अच्छे दिन तो आए ही नहीं. किसी ने हमसे कहा भी था कि ईवीएम में जगह होती है बटन दबाने के लिए, नोटा की, कि हम इन उम्मीदवारों का बहिष्कार करते हैं लेकिन हमने कहा कि हमें वहां जाने की ज़रूरत ही क्या है? हम धूप में क्यों जाएं वोट देने? हम अपने घर में रहेंगे. वोट नहीं देना है तो नहीं देना है."

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आशा देवी
BBC
आशा देवी

'किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता'

उनके वोट न देने से किसी पार्टी या नेता को कोई फ़र्क़ पड़ेगा? इस बारे में बद्रीनाथ और आशा देवी दोनों की राय अलग है.

आशा देवी निराशा भरे स्वर में कहती हैं, "इतनी बच्चियां मर रही हैं, इतने क्राइम हो रहे हैं. किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तो हमारे एक वोट न देने से उनको क्या फ़र्क़ पड़ेगा?"

अपनी पत्नी के उलट बद्रीनाथ के मन में अब भी थोड़ी सी उम्मीद बाक़ी है. उन्होंने कहा, "मेरी बेटी के बारे में दुनिया जानती है. मीडिया वाले हमारे पास आ रहे हैं, हमसे बात कर रहे हैं तो धीरे-धीरे बात उन तक भी पहुंचेगी. इसका कुछ न कुछ असर तो ज़रूर होना चाहिए."

दोनों की बात सुनते-सुनते मैंने दिल कड़ा करके उनसे एक और सवाल पूछा, "सुप्रीम कोर्ट ने तो सभी अपराधियों को फांसी की सज़ा सुना दी है. ऐसे में आपकी शिकायत किससे है? सरकार से? नेताओं से? राजनीतिक पार्टियों से या फिर न्याय व्यवस्था से?"

जवाब निर्भया के पिता देते हैं.

बड़े ही साफ़ लहजे में वो कहते हैं, "मेरी शिकायत किसी से नहीं है और शिकायत सबसे है. शिकायत सबसे इसलिए है क्योंकि किसी पार्टी ने अपने मेनिफ़ेस्टो में नहीं कहा है कि हम लड़कियों की सुरक्षा करेंगे...और वैसे देखेंगे तो पर्सनली हमें किसी से शिकायत नहीं है. रही बात हमारी बेटी की तो इतने बड़े मामले में जब सात साल के बाद अपराधियों को सज़ा नहीं हुई तो बाक़ी मामलों में हम क्या उम्मीद कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आ गया लेकिन अब भी हम अपनी लड़ाई लोवर कोर्ट में ही लड़ रहे हैं. इंसाफ़ मिलने की भी कोई समय सीमा होती है या नहीं?"

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बद्रीनाथ सिंह
BBC
बद्रीनाथ सिंह

'ग़लती की माफ़ी होती है, गुनाह की नहीं'

आशा देवी इस बातचीत में कई बार 'दोषियों को फांसी' जैसे शब्द दुहराती हैं और ये सुनकर मैं उनसे पूछ बैठती हूं कि उन रिपोर्टों और रिसर्च के बारे में उनका क्या कहना है जो बलात्कार के मामलों में फांसी की सज़ा को कारगर नहीं बताते? उन तर्कों और अवधारणाओं के बारे में क्या कहना है जो मानते हैं कि क़ानून का मक़सद अपराधियों की जान लेना नहीं बल्कि उन्हें सुधारना होता है, क़ानून का मक़सद बदला लेना नहीं बल्कि इंसाफ़ दिलाना होता है...?

इस बार आशा देवी के स्वर में मुझे ग़ुस्सा महसूस होता है.

वो मेरे सवाल ख़त्म होने से पहले ही बोल पड़ती हैं, "मैं इन सबको बिल्कुल नहीं मानती. आपको लगता है कि किसी लड़की की अंतड़ियां निकालने वाले सुधरकर अच्छे इंसान बन सकते हैं? मैं पिछले सात साल से अदालत में उनसे मिलती हूं. आज तक मुझे उनके चेहरे पर एक शिकन नहीं दिखाई दी, पछतावे की परछाईं नहीं दिखाई दी. वो कहते हैं कि निर्भया विरोध नहीं करती तो हम उसकी जान नहीं लेते, वो कहते हैं कि उन्होंने उसे सबक़ सिखाया, वो कहते हैं कि ग़लती मेरी बेटी की थी...ऐसे लोग सुधर सकते हैं? वो सीधे-सीधे धमकी देते हैं कि अगर हमें फांसी हुई तो बलात्कार करने के बाद लड़कियों को जान से मार दिया जाएगा...ग़लती माफ़ की जा सकती है, गुनाह नहीं."

इतना कहकर आशा देवी अपनी नीली साड़ी के छोर से आंखें पोंछने लगती हैं और मेरा अगला सवाल मेरे हलक़ में ही सूख जाता है कि क्या 'ग़लती' है और क्या 'गुनाह', ये कैसे तय होगा?

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आशा देवी
BBC
आशा देवी

'चुनाव अपराधी लड़ रहे हैं तो औरतों के बारे में कौन सोचेगा?'

राजनीतिक दल महिलाओं के मुद्दों को गंभीरता से क्यों नहीं लेते? ये सवाल सुनकर आशा देवी थोड़ी देर ठहरती हैं और कहती हैं, "पता नहीं ऐसा क्यों हैं...ये तो वही लोग जानते होंगे...शायद हमेशा से पुरुषों का राज चला आ रहा है इसलिए...बाक़ी तो मैं नहीं जानती."

वहीं, निर्भया के पिता बड़ी ही बेबाकी से भारत की चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं, "आप ये देखिए कि चुनाव लड़ कौन रहा है? संसद में बैठा कौन है? कितने लोगों का तो ख़ुद क्रिमिनल रिकॉर्ड है. जो ख़ुद आपराधिक प्रवृत्ति का है वो औरतों के बारे में क्या सोचेगा? और कोई साफ़-सुथरा आदमी चुनाव लड़ेगा तो उसे रास्ते से हटा दिया जाएगा."

अब आते हैं निर्भया के माता-पिता के दावों पर:

ये सच है कि साल 2012 में निर्भया मामले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था, शायद इसलिए भी क्योंकि ये देश की राजधानी दिल्ली के बीचोबीच हुआ था. शायद इसलिए भी क्योंकि जनता इस बलात्कार की बर्बरता देखकर कांप गई थी, शायद इसलिए भी क्योंकि बलात्कार के बाद तक़रीबन 10 दिनों तक ज़िंदगी और मौत से संघर्ष करती रही और शायद इसलिए भी क्योंकि उसके लिए इंसाफ़ की मांग करते हुए भीड़ सड़कों पर आ गई थी. हज़ारों छात्रों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए पुलिस की लाठी, वॉटर कैनन और आंसू गैस की चोट झेली थी और लाखों मोमबत्तियां भारत के अलग-अलग हिस्सों में उसकी सलामती की दुआ में जलते हुए पिघली थीं.

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निर्भया मामले के बाद हुए विरोध प्रदर्शन का एक दृश्य
Getty Images
निर्भया मामले के बाद हुए विरोध प्रदर्शन का एक दृश्य

तब राजनीतिक मुद्दा था महिला सुरक्षा, अब नहीं...

संयुक्त राष्ट्र तक ने इस क्रूरतम अपराध की निंदा की थी. इन सबका असर 2014 में हुए लोकसभा चुनाव से पहले और उसके दौरान दिखा. पिछले लोकसभा चुनाव में महिला सुरक्षा एक मुखर राजनीतिक मुद्दा था.

बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करते हुए 'अच्छे दिन आने वाले हैं' जैसी पंचलाइन तो गढ़ी ही, 'बहुत हुआ नारी पर वार, अबकी बार मोदी सरकार' के नारे वाला चुनावी विज्ञापन अख़बारों से लेकर रेडियो, टीवी और इंटरनेट पर छाया रहा.

इस विज्ञापन में एक महिला कहती है कि उनकी पढ़ी-लिखी बेटी जब तक ऑफ़िस से घर नहीं आ जाती, उन्हें डर लगा रहता है. महिला पूछती हैं, "आख़िर कर क्या रही है सरकार? हमारी बेटी को सुरक्षा न दे पाने वालों, जनता माफ़ नहीं करेगी."

अगर भारतीय जनता पार्टी के साल 2014 के घोषणापत्र पर नज़र डालें तो उसमें महिलाओं के लिए सात बिंदुओं में पार्टी की योजनाओं का ज़िक्र किया गया है:

1. बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान

2. परिवारों में लड़कियों के लिए सकारात्मक नज़रिया पैदा करने का अभियान

3. महिला स्वास्थ्य (पोषण और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य पर ख़ास ध्यान देते हुए)

4. महिलाओं के लिए आईटीआई केंद्र बनाने का वादा

5. महिलाओं का ख़याल रखने वाले पुलिस थाने

6. स्कूलों के पाठ्यक्रम में 'सेल्फ़-डिफ़ेंस' शामिल करने का वादा

वहीं, साल 2014 में कांग्रेस का घोषणापत्र में 15 बिंदुओं में महिलाओं से जुड़े मुद्दों का ज़िक्र किया था जिसमें बलात्कार और यौन हिंसा पीड़ित महिलाओं के लिए सभी सरकारी अस्पतालों में 'वन स्टॉप सेंटर' बनाने, महिलाओं के लिए 24 घंटे सुरक्षित यातायात की सुविधा, फ़ास्ट ट्रैक अदालतों और बंद कमरे में सुनवाइयों जैसे ढेरों वादे शामिल थे.

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आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र की एक झलक
AAP
आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र की एक झलक

आम आदमी पार्टी की बात करें तो 'महिला सुरक्षा' कॉलम के तहत सात वादे किए गए थे:

1.पर्याप्त स्ट्रीट लाइट

2.सार्वजनिक जगहों और डीटीसी की बसों में सीसीटीवी कैमरे

3.अच्छी यातायात कनेक्टिविटी

4.सुरक्षा बटन

5.47 फ़ास्ट ट्रैक अदालतें

6.दिल्ली के वकीलों और न्यायपालिका का सशक्तिकरण

7.महिला सुरक्षाबल

अब अगर 2019 के चुनावों पर नज़र डालें तो महिला सुरक्षा के वादे सिकुड़कर नगण्य से होते नज़र आते हैं.

पहले बात सत्ताधारी बीजेपी के घोषणापत्र की

'संकल्प पत्र' नाम के इस घोषणापत्र में 'महिला सशक्तिकरण' को चार बिंदुओं में निबटा दिया है और इसमें महिला सुरक्षा का कहीं ज़िक्र नहीं है.

कांग्रेस के इस साल के घोषणापत्र में महिला मुद्दों को 'स्वाभिमान' नाम के वर्ग में रखा है. इसमें 13 बिंदुओं में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के क़ानून की विस्तृत समीक्षा की बात कही गई है. इसके अलावा महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले जघन्य अपराधों की जांच के लिए एक अलग जांच एजेंसी की वकालत की गई है.

अगर इस बार प्रमुख पार्टियों के नेताओं के चुनावी भाषणों और रैलियों को देखें तो महिलाओं के मुद्दे शायद ही कभी सामने आए होंगे. अब सवाल ये है कि क्या पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के साथ होने वाले अपराध कम हो गए हैं या वो ज़्यादा सुरक्षित हो गई हैं?

बीबीसी की रियलिटी चेक टीम ने अपनी पड़ताल में पाया है कि साल 2012 के बाद से बलात्कार और यौन हमलों के मामले दर्ज होने की संख्या में तेज़ी से बढ़त हुई है लेकिन इन मामलों में 'कन्विक्शन रेट' यानी अपराध साबित होने की दर और तय वक़्त पर फ़ैसला आना अब भी बड़ी चुनौती है.

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आशा देवी
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आशा देवी

क्यों नहीं मिल रहा है वक़्त पर न्याय?

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अनूप सुरेंद्रनाथ के मुताबिक़ कछुए की चाल वाली पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया भी बलात्कार के मामलों में फ़ैसला देर से आने की वजहें हैं.

बाक़ी वजहें हैं आबादी के अनुपात में पुलिस और जजों की संख्या में भारी कमी.

उन्होंने बताया, "संयुक्त राष्ट्र के तय मानक के मुताबिक़ 454 लोगों के लिए एक पुलिस अधिकारी होना चाहिए जबकि गृह मंत्रालय के 2016 के आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में 514 लोगों के लिए सिर्फ़ एक पुलिस अधिकारी ही उपलब्ध है.''

वो कहते हैं कि सरकार अगर वाक़ई महिलाओं को इंसाफ़ दिलाना चाहती है तो नए क़ानून बनाने के बजाय 'क्रिमिनल लॉ सिस्टम' को सुधारे जाने और मौजूदा क़ानूनों को प्रभावी तरीक़े से लागू करें.

जानी-मानी अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर भी अनूप से सहमति जताती हैं. वो पूछती हैं, "फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट तो बन जाएंगे लेकिन उसके लिए जज कहां से आएंगे? ज़ाहिर है, इन अदालतों में भी वही जज जाएंगे जिनके पास पहले से तमाम मुक़दमों का बोझ है. ऐसे में फ़ास्ट ट्रैक अदालतों के प्रभावी साबित होने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती."

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निर्भया मामला
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निर्भया मामला

निर्भया मामले में क्या हुआ?

  • छह अभियुक्तों में से एक ने तिहाड़ जेल में ही फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी.
  • एक नाबालिग़ अभियुक्त को तीन साल जेल की सज़ा सुनाई गई थी.
  • सितंबर 2013 में निचली अदालत ने चारों अभियुक्तों को फांसी की सज़ा सुनाई थी.
  • साल 2014 में दिल्ली हाईकोर्ट ने चारों अभियुक्तों की फांसी की सज़ा बरक़रार रखी.
  • साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने चारों अभियुक्तों की फांसी की सज़ा बरक़रार रखी.
  • 9 जुलाई, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने तीन अभियुक्तों मुकेश, पवन और विनय की फ़ैसले की समीक्षा की मांग ख़ारिज की और मौत की सज़ा बरक़रार रखी.
  • चौथे अभियुक्त अक्षय ने फ़ैसले की समीक्षा की अर्ज़ी नहीं डाली है.
  • इसके बाद निर्भया के माता-पिता ने चारों अभियुक्तों को फांसी की सज़ा की प्रक्रिया फ़ास्ट ट्रैक करने के लिए पटियाला हाउस कोर्ट का रुख़ किया है.
  • फ़िलहाल पटियाला हाउस कोर्ट में सुनवाई की अगली तारीख़ 30 मई, 2019 है.

आशा देवी
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आशा देवी

'सोच-समझकर वोट करें'

बद्रीनाथ और आशा देवी ख़ुद तो वोट नहीं दे रहे हैं लेकिन अपना ये फ़ैसला उन्होंने अपने दोनों बेटों पर नहीं थोपा है.

आशा देवी कहती हैं, "बच्चों का जैसा मन होगा, वो वैसा करेंगे. ये फ़ैसला बस हम दोनों का है."

बद्रीनाथ भी वोट नहीं दे रहे हैं लेकिन वो बाक़ी लोगों से सोच-समझकर वोट देने की अपील ज़रूर करते हैं. वो कहते हैं, "अपने उम्मीदवार और अपनी पार्टी के बारे में ख़ूब जांच-पड़ताल कीजिए और सोच-समझ कर वोट दीजिए."

आख़िर में आशा देवी कहती हैं, "लड़ना बंद नहीं करूंगी, मरूंगी भी तो लड़ते-लड़ते."

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English summary
Lok Sabha Elections 2019 Parents of Nirbhaya are asking Why and for whom to cast vote
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